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अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

उर्दू शायरी की सरज़मीन हमेशा से नए जज़्बात, नए एहसास और नई आवाज़ों की तलाश में रही है। यही तलाश मीर, ग़ालिब और फ़ैज़ के दौर से होती हुई आज के दौर के उन शायरों तक पहुंचती है जो अदब की इस रिवायत को अपने लफ़्ज़ों के ज़रिए ज़िंदा रखे हुए हैं। इन्हीं उभरते हुए नामों में एक नाम है अब्दुल मन्नान समदी।  एक ऐसा शायर, जिसकी शायरी में इल्म की गहराई, इश्क़ की नर्मी और तसव्वुर की परवाज़ एक साथ नज़र आती है।

इल्मी ख़ानदान से ताल्लुक़

16 अक्तूबर 1988 को अलीगढ़ की अदबी और इल्मी फ़िज़ाओं में पैदाइश अब्दुल मन्नान समदी एक ऐसे ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं जहां इल्म, तालीम और तहज़ीब विरासत का हिस्सा हैं। उनके वालिद-ए-मोहतरम इंजीनियर अब्दुस्समद हैं, जिनके नाम की निस्बत से उन्होंने अपना तख़ल्लुस ‘समदी’ इख़्तियार किया।

ये तख़ल्लुस सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक अदबी पहचान है जो उनके पारिवारिक असलाफ़ से जज़्ब हुए इल्मी नूर की याद दिलाता है।

मदरसे से शुरू हुआ सफ़र

अब्दुल मन्नान का तालीमी सफ़र एक रूहानी मक़ाम से शुरू हुआ। उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम एक मदरसे में हासिल की, जहां उन्होंने मदरसा अरबिया तामीर-ए-मिल्लत से हिफ़्ज़-ए-क़ुरआन मुक़म्मल किया। यही वो दौर था जब उनके दिल में इल्म और अदब दोनों की लौ जल उठी। इसके बाद उन्होंने जामिया दीनियात उर्दू (देवबंद) से फ़ज़ीलत की  सनद हासिल की। जो उनकी मज़हबी और अक़्लानी तालीम का गवाह है।

अब्दुल मन्नान का इल्म सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से क़ुरानिक स्टडीज़ में डिप्लोमा किया और फिर मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (हैदराबाद) से बी.ए. और बी.एड. की डिग्रियां हासिल कीं।

इन तमाम तालीमी मुक़ामात ने उन्हें न सिर्फ़ एक दानिशमंद इंसान बनाया, बल्कि एक ऐसे शायर के तौर पर भी तराशा जो ज़िंदगी और इंसानियत दोनों को गहराई से समझता है।

अदबी रहनुमाई और तर्बियत

हर शायर के सफ़र में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो उसे सही रास्ता दिखाते हैं जो उसके लफ़्ज़ों में रूह भर देते हैं। अब्दुल मन्नान समदी की शायरी पर दो बुज़ुर्गों की रहनुमाई का गहरा असर रहा।

पहले हैं ख़ालिद नदीम फ़ारूकी, जिन्होंने उन्हें शायरी के बुनियादी उसूलों से वाक़िफ़ कराया। उन्होंने समदी को नज़्म और ग़ज़ल के तर्ज़-ओ-शिवा सिखाए, और शायरी की उस नफ़ासत से रूशनास कराया जो उर्दू का असल ज़ेवर है।

दूसरे हैं उनके चचा डॉ. शहराम सरमदी, जो ख़ुद एक उर्दू दानिशवर और शायर हैं। उन्होंने अब्दुल मन्नान की अदबी तरबियत में अहम किरदार अदा किया।

शायद यही वजह है कि समदी की शायरी में एक साथ इल्म की गहराई, सूफ़ियाना लहजा और अदबी शऊर दिखाई देता है।

शायरी का अंदाज़: जज़्बात की तर्ज़, इश्क़ की रूह

अब्दुल मन्नान समदी की शायरी में वो एहसास है जो दिल को छू जाता है। उनके अशआर में तसव्वुर की उड़ान भी है और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें भी।

परिंदे सब नहीं ज़िंदान में मारे गए हैं
क़फ़स में कुछ तो कुछ नक़्ल-ए-मकानी में मरे हैं

अब्दुल मन्नान

यह शेर सिर्फ़ परिंदों की बात नहीं करता, बल्कि इंसानी ज़िंदगी की हक़ीक़त बयान करता है कुछ लोग हालात के कैद में मरते हैं, और कुछ सफ़र में खो जाते हैं।

उलट कर जब भी देखी है किताब-ए-ज़िंदगी
हम ने तो हर इक लफ़्ज़ के पीछे कोई इक हादिसा निकला

अब्दुल मन्नान

यहां समदी ज़िंदगी को एक ऐसी किताब बताते हैं जिसके हर लफ़्ज़ के पीछे दर्द, तजुर्बा और कहानी छिपी है। और फिर इश्क़ का वो हसीन इज़हार, जो नज़ाकत और हया दोनों से लबरेज़ है।

बदन पर इस-क़दर बारिश मिरे होती है बोसों की
कि जब बांहें तिरी मुझ पर खुली हों डालियां बन कर

अब्दुल मन्नान

ये शे’र समदी के रूमानी तसव्वुर और जज़्बाती लहजे की बेहतरीन मिसाल है। उनकी शायरी में दर्द और हकीक़त का संगम भी नज़र आता है। वो मोहब्बत के सफ़र को सिर्फ़ ख़ुशबू नहीं, बल्कि तजुर्बे के रूप में बयान करते हैं।

वही रुस्वाई का मेरी सबब आख़िर बने मौला
वही जो लोग कल शामें सुहानी करने वाले थे

अब्दुल मन्नान

यह शे’र मोहब्बत के उस मोड़ को दिखाता है जहां अपनापन बेगानगी में बदल जाता है। और फिर वो तअल्लुक़ जो तसव्वुर से आगे भी क़ायम रहता है।

तसव्वुर की हदों से दूर जाकर कैसे देखेंगे
अगर तुम से तअ’ल्लुक़ ग़ाएबाना भी नहीं होगा

अब्दुल मन्नान

यहां समदी की शायरी रूह की गहराइयों तक उतरती है जहां इश्क़ महज़ जिस्मानी नहीं, बल्कि एक रूहानी तअल्लुक़ बन जाता है। अब्दुल मन्नान समदी की ग़ज़लें अक्सर दिल की नर्मी और ज़िंदगी की सख़्ती दोनों को साथ लेकर चलती हैं। 

कुछ बदन के थे तक़ाज़े कुछ शरारत दिल की थी
आज लेकिन इश्क़ अपना जावेदां होने को था

अब्दुल मन्नान

इस शे’र में इंसानी कमज़ोरियों के साथ मोहब्बत की सच्चाई का भी बयान है और फिर वो दर्द जो हर इश्क़ के पीछे होता है।

 किसी के छूट जाने का उसे क्यों ग़म नहीं होता
तिरा दिल है कि पत्थर है कभी जो नम नहीं होता

अब्दुल मन्नान

यहां शायर का लहजा शिकायती भी है और मोहब्बत से भरा हुआ भी।

ज़िंदगी और तक़दीर पर यक़ीन

समदी की शायरी में तक़दीर और ख़ुदा पर यक़ीन का एहसास भी नज़र आता है।

ज़िंदगी तुझ से प्यार क्या करते
ख़्वाब का ए’तिबार क्या करते
तुझ को फ़ुर्सत नहीं थी मिलने की
हम तिरा इंतिज़ार क्या करते

अब्दुल मन्नान

यहां ज़िंदगी से शिकवा भी है और तस्लीम भी और फिर तक़दीर का वो एत्मिनान।

ख़बर कुछ नहीं मुझ को मिरा अंजाम क्या होगा
वही होगा जो हाथों की लकीरों में लिखा होगा

अब्दुल मन्नान

ये शेर अब्दुल मन्नान समदी के फ़लसफ़ी तसव्वुर को उजागर करता है। जहां इंसान अपनी कोशिश करता है, मगर आख़िरी फ़ैसला तक़दीर के हवाले छोड़ देता है।

अदबी सफ़र और नई रिवायत

अब्दुल मन्नान समदी उन शायरों में से हैं जो उर्दू अदब की पुरानी रवायतों को नई ज़बान और नए जज़्बात के साथ पेश कर रहे हैं। उनकी शायरी में फ़िक्र भी है, फ़न भी है और फ़लसफ़ा भी। वो ग़ज़ल को सिर्फ़ इश्क़ की ज़ुबान नहीं रहने देते, बल्कि उसे ज़िंदगी, तजुर्बे और समाज की आवाज़ बना देते हैं।

आज जब उर्दू शायरी में ताज़गी की तलाश है, तब समदी जैसे शायर नई पीढ़ी को यह एहसास दिला रहे हैं कि उर्दू ज़िंदा है अपने लफ़्ज़ों, अपनी नज़ाकत और अपने जज़्बात के साथ।

एक रोशन सफ़र की शुरुआत

अब्दुल मन्नान समदी का सफ़र अभी जारी है। उनके लफ़्ज़ों में वो रूहानी नर्मी है जो दिलों को छू जाती है, और वो इल्मी गहराई जो सोचने पर मजबूर करती है। उनकी शायरी इस बात की गवाह है कि उर्दू का आसमान अभी भी नए सितारों से रोशन हो रहा है, और समदी उनमें से एक जगमगाता सितारा हैं।

“कलम जब रूह से निकलता है, तो हर लफ़्ज़ इबादत बन जाता है।”

शायद यही वजह है कि अब्दुल मन्नान समदी की शायरी सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती बल्कि महसूस की जाती है।

ये भी पढ़ें: शकेब जलाली: जिनकी ज़िन्दगी अधूरी ग़ज़ल थी लेकिन लफ़्ज़ एहसास बनकर उतरे 

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