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लाजवाब सीक Kabab और कश्मीरी परंपरा: ज़हूर अहमद 30 सालों से कैसे ज़िंदा रखे हुए हैं असली स्वाद?

कश्मीर अपनी ख़ूबसूरत वादियों, रंगीन संस्कृति और लजीज़ खानपान के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहां का खाना सिर्फ़ स्वाद नहीं, बल्कि एक परंपरा भी है जिसे पीढ़ियों से संभालकर रखा गया है। कोयले और लकड़ी पर खाना पकाना कश्मीर का सबसे कदीमी तरीका माना जाता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में से एक है सीक Kabab, जो पूरे भारत में खाया जाता है, लेकिन कश्मीर के सीक Kabab का टेस्ट बिल्कुल मुख़्तलिफ होता है।

इसी ख़ास स्वाद को अपनी पहचान बनाने वालों में एक नाम है नॉर्थ कश्मीर के सोपोर में रहने वाले ज़हूर अहमद का, जो पिछले 30 साल से अपने हाथों के स्वाद से लोगों का दिल जीत रहे हैं। ज़हूर न सिर्फ़ अपने लजीज़ कबाबों के लिए मशहूर हैं, बल्कि उनकी लगन, मेहनत और अपने पेशे से मोहब्बत उन्हें और भी ख़ास बनाती है।

कश्मीर के सीक Kabab की ख़ासियत

कश्मीर में सीक Kabab बनाने का तरीका बाकी सूबों से थोड़ा अलग है। यहां Kabab बनाने के लिए मीट का कीमा पीसा जाता है और फिर उसमें तरह-तरह के पारंपरिक कश्मीरी मसाले मिलाए जाते हैं। मसाला तैयार होने के बाद इसे सीक पर हाथों से चढ़ाया जाता है, और फिर तंदूर या भट्टी में कोयले की हल्की आंच पर धीरे-धीरे पकाया जाता है। कोयले की आंच smoky फ्लेवर देती है, जो इसके स्वाद में चार चांद लगा देती है।

ज़हूर अहमद कश्मीर के मशहूर Kabab कलाकार

ज़हूर अहमद अपने अपने स्वाद के लिए दूर-दूर तक जाने जाते हैं। DNN24 से बातचीत में ज़हूर अहमद बताते हैं कि उनके पिता कश्मीर के जाने-माने वज़ा (Chef) थे, और वही उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बने। पिता से मिली सीख ने ही उन्हें इस प्रोफ़ेशन में लाया।

ज़हूर अहमद पिछले 30 सालों से भी ज़्यादा समय से Kabab बनाने का काम कर रहे हैं। ज़हूर अहमद कहते हैं कि, “ग्राहक बहुत चाव से खाते हैं। एक बार जो यहां का कबाब खा लेता है, वो वापस ज़रूर आता है। मैं हमेशा अच्छी क्वालिटी का सामान इस्तेमाल करता हूं, इसलिए लोग मेरे स्वाद को याद रखते हैं।”

कबाब बनाने की मेहनत सीक पर चढ़ाने से मैरिनेशन तक

ज़हूर अहमद बताते हैं कि असली स्वाद मेहनत में छिपा होता है। रिस्ता या Kabab बनाने के लिए सबसे पहले बोनलेस मीट लिया जाता है। फिर इसे समतल पत्थर पर बड़सी/क्लीवर से बारीक काटकर कीमा बनाया जाता है। उसके बाद इसमें मसाले, नमक और थोड़ी-सी फैट मिलाया जाता है ताकि Kabab मुलायम बने। मैरिनेशन का राज़ ज़हूर अहमद बताते हैं “हम मीट में मसाले मिलाकर उसे पूरी रात मैरिनेशन के लिए रखते हैं। इससे मसाले मीट में अच्छी तरह उतर जाते हैं और बारबेक्यू बहुत सॉफ्ट बनता है।”

Kabab बनाने का काम एक शख्स अकेला नहीं कर सकता। कम से कम दो से चार लोगों की टीम चाहिए होती है, क्योंकि मीट तैयार करने, मसाले मिलाने, सीक पर चढ़ाने और तंदूर संभालने में काफी मेहनत लगती है।

पारंपरिक रोटी और चटनी के साथ परोसे जाते कबाब

ज़हूर अहमद अपने Kabab को रोटी और चटनी के साथ परोसते हैं। रोटी वो कश्मीर की पारंपरिक बेकरी से लेते हैं, जबकि चटनी घर पर ही तैयार की जाती है। एक पीस पीस 50 रुपये में मिलता है, जो स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आए पर्यटकों के बीच भी काफी फेमस है। जम्मू-कश्मीर के खाने में मुग़लों और अरबों का ज़ायका आज भी मौजूद है। यही वजह है कि हमारे व्यंजनों की खुशबू भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों तक भी पहुंच चुकी है। कश्मीर के सीक Kabab सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि मेहनत, परंपरा और स्वाद की विरासत हैं। ज़हूर अहमद जैसे कलाकार ही इस विरासत को ज़िंदा रखते हैं।

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