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फ़िल्म ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya): कुमाऊं के न्याय देवता गोल्ज्यू महाराज की अनकही लोककथा का सफ़र

देवभूमि उत्तराखंड जहां सुबह की शुरुआत मंदिरों की घंटियों से होती है, जहां पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नहीं बल्कि आस्था के प्रतीक हैं, और जहां हर घाटी में भक्ति की गूंज बसती है। ये धरती केवल देखने की नहीं, ईश्वर को महसूस करने की जगह है। यहां हर रास्ता किसी कथा से जुड़ा है और हर मंदिर किसी विश्वास का साक्षी है। इन्हीं पहाड़ों की गोद में विराजमान हैं कुमाऊं के न्याय देवता ‘गोल्ज्यू महाराज’, जिनके नाम से ही लोगों के दिलों में उम्मीद जाग उठती है। उनकी कथाएं सिर्फ़ सुनी नहीं जाती, बल्कि पीढ़ियों से जी जाती रही हैं। इसी आस्था, इसी विश्वास और इसी लोक चेतना को बड़े पर्दे पर ज़िंदा करने की कोशिश है फ़िल्म ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya)।

‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) एक फ़िल्म नहीं, लोक आत्मा का बयान

‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) को सिर्फ़ एक फ़िल्म कहना इसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। ये फ़िल्म कुमाऊं की लोक संस्कृति, कुमाऊंनी बोली, पहाड़ी जीवन और उस विश्वास की कहानी है जो समय के साथ और गहरा होता गया है। ये फ़िल्म ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) बताती है कि आस्था कैसे इंसान को टूटने से बचाती है और न्याय की उम्मीद कैसे देवता से जुड़ जाती है। ये फ़िल्म अप्रैल 2026 में रिलीज़ होने जा रही है और इसे कुमाऊं ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के तौर पर देखा जा रहा है।

Source: DNN24

कुमाऊं में न्याय का देवता: गोल्ज्यू महाराज

कुमाऊं क्षेत्र में गोल्ज्यू महाराज को न्याय का देवता माना जाता है। यहां के लोग मानते हैं कि जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो जाएं, तब गोल्ज्यू महाराज की चौखट खुली रहती है। मंदिरों में आज भी लोग घंटियां बांधते हैं, अर्जि़यां लिखते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ न्याय की गुहार लगाते हैं। ये विश्वास सिर्फ़ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। गोल्ज्यू महाराज के मंदिर सिर्फ़ पूजा स्थल नहीं, बल्कि इंसाफ़ की उम्मीद के केंद्र हैं। ‘बाला गोरिया’ इसी विश्वास को कहानी का आधार बनाती है।

Himadri Productions और एक सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी

इस फ़िल्म को बनाया है Himadri Productions ने, जो लंबे समय से थिएटर और लोक संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहा है। फ़िल्म के प्रोड्यूसर मनोज चंदोला थिएटर से जुड़े रहे हैं और उत्तराखंड और हिंदी रंगमंच में कई सालों का एक्सपीरियंस है। मनोज मानते हैं कि लोक संस्कृति सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि मंच और सिनेमा के ज़रिए ज़िंदा रहती है। उन्होंने हमेशा कोशिश की है कि वो उत्तराखंड की कहानियां उसकी मिट्टी की ख़ुशबू के साथ सामने आएं।

Source: Himadri Productions

‘राजुला’ से मिली पहचान, ‘बाला गोरिया’ से नई शुरुआत

मनोज चंदोला इससे पहले Rajula: A Tale from Himalayas जैसी फ़िल्म बना चुके हैं, जो लोगों ने काफी पसंद की। मनोज का मानना है कि उत्तराखंड की लोक कथाएं इतनी समृद्ध हैं कि उन पर लगातार काम होना चाहिए। लेकिन आज सबसे बड़ा खतरा ये है कि हम अपने लोक देवताओं और परंपराओं को धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं।

मनोज कहते हैं, “हमारे लोक देवता हमारी ज़िंदगी का आधार हैं। शायद हम उन्हीं की मन्नतों के बाद पैदा हुए होंगे। हमारे घर, हमारी परंपराएं, हमारी सोच सब कुछ उन्हीं विश्वासों से जुड़ा है।” लेकिन आज की सच्चाई ये है कि पहाड़ खाली हो रहे हैं। लोग रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी की तलाश में दूर शहरों की ओर जा रहे हैं। साल में बस एक बार पूजा कर लेना ही अब परंपरा रह गई है। बाला गोरिया इसी टूटते रिश्ते को फिर से जोड़ने की कोशिश है ताकि लोग चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने लोक देवताओं के बहाने ही सही, अपनी जड़ों की ओर लौटें।

फ़िल्म बनाने का विचार: एक योजना नहीं, एक सफ़र

मनोज पिछले दो सालों से गोल्ज्यू महाराज पर एक वेब सीरीज़ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उनका उद्देश्य था कि छोटे-छोटे हिस्सों में गोल्ज्यू महाराज की कथाओं को लोगों तक पहुंचाया जाए। लेकिन ये विचार कब एक बड़ी फ़िल्म में बदल गया, ये उन्हें खुद भी नहीं पता चला। ये बदलाव तब आया, जब वो शूट से पहले लोकेशन रेकी के लिए निकले।

रेकी के दौरान मनोज चंपावली पहुंचे वही स्थान, जहां मान्यता है कि गोल्ज्यू महाराज प्रकट हुए थे। जब वो मंदिर पहुंचे, तो अचानक ढोल-नगाड़ों की आवाज़ गूंज उठी। आसपास के लोगों ने बताया कि गोल्ज्यू महाराज की यात्रा शुरू हो रही है। उसी दिन मनोज की मुलाकात उस लेखक से हो गई, जिनकी किताब ‘सन्यासी योद्धा’ (The Monk Warrior) वो 2015 में पढ़ चुके थे। एक रात पहले ही मनोज मन ही मन लेखक से मिलने की इच्छा कर रहे थे। अगले ही दिन मंदिर में उनका मिल जाना, मनोज के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

Source: Himadri Productions

लोक देवताओं की परंपरा का विस्तार

इस अनुभव ने मनोज की सोच बदल दी। उन्हें एहसास हुआ कि गोल्ज्यू महाराज की कथा अकेली नहीं है। ये एक बड़ी परंपरा का हिस्सा है, जो गोरखनाथ तक जाती है। उत्तराखंड में ऐसे कई लोक देवता हैं, जिनकी कहानियों पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए। यहीं से ये तय हुआ कि गोल्ज्यू महाराज पर सिर्फ़ एक वेब सीरीज़ नहीं, बल्कि एक फ़िल्म बनाई जाएगी।

गोल्ज्यू महाराज का बाल रूप: अनकही कहानी

मनोज बताते हैं कि लोक कथाओं में गोल्ज्यू महाराज के बचपन का ज़िक्र बहुत कम मिलता है। ये एक ऐसा पहलू है, जिस पर अब तक बहुत कम काम हुआ है। इसी बाल रूप को केंद्र में रखकर ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) की कहानी रची गई। ये अहसास हुआ कि ये विषय इतना बड़ा है कि सिर्फ़ एक फ़िल्म में इसे समेटना संभव नहीं। इसी वजह से करीब सात फ़िल्मों की योजना बनी, जिनमें ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) पहली फ़िल्म है।

शूटिंग के दौरान आई चुनौतियां

‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) की शूटिंग आसान नहीं रही। मनोज बताते हैं कि जब भी गोल्ज्यू महाराज से जुड़े सीन शूट होते कभी तेज़ आंधी, कभी तूफान आता। एक बार फ़िल्म के मुख्य कलाकार की तबीयत इतनी बिगड़ी कि हार्ट अटैक का शक हुआ। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन जांच में सब सामान्य निकला। हैरानी की बात ये थी कि शूटिंग के दौरान तबीयत बिगड़ती और शूट रुकते ही सब ठीक हो जाता। इन घटनाओं के कारण करीब चार दिनों तक शूटिंग रोकनी पड़ी और कई सीन क्रोमा तकनीक से पूरे करने पड़े।

Source: Himadri Productions

फ़िल्म में काम कर रहे बच्चों के साथ भी एक अजीब घटना घटी। जंगल में शूटिंग के दौरान अचानक बच्चे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, कोई बेहोश हो गया। माहौल डर और घबराहट से भर गया। तभी एक व्यक्ति देवता के रूप में आया और कुछ ही देर में बच्चे पूरी तरह ठीक हो गए।

सिर्फ़ एक देवता की नहीं, बालक की कहानी है

मनोज मानते हैं कि बाला ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) देवता की कहानी नहीं है। ये उस बालक की कहानी है, जो हर बच्चे के भीतर होना चाहिए। एक ऐसा बालक, जो सच्चाई, न्याय और करुणा के साथ बड़ा हो। फ़िल्म के ज़रिए यही भावना आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। आज जब नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है, ‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) उन्हें उनकी लोक संस्कृति से जोड़ने की कोशिश है। देवभूमि कहलाने वाले उत्तराखंड की पहचान तभी सार्थक होगी, जब उसकी परंपराएं ज़िंदा रहेंगी।

‘बाला गोरिया’(Bala Goriya) सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि कुमाऊं की आत्मा का सिनेमाई दस्तावेज़ है। ये आस्था, न्याय और संस्कृति का ऐसा सफ़र है, जो दर्शकों को भीतर तक छू जाएगा। अप्रैल 2026 में जब ये फ़िल्म रिलीज़ होगी, तब ये सिर्फ़ परदे पर नहीं चलेगी ये लोगों के दिलों में उतरेगी और उन्हें उनकी जड़ों की याद दिलाएगी।

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