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Phulkari के ज़रिए मां की यादों, पंजाबी संस्कृति और रोज़गार को आगे बढ़ा रहीं अमनदीप कौर

Phulkari पंजाब की एक ऐसी पारंपरिक कला है, जो पीढ़ियों से मां से बेटी तक चलती आ रही है। ये सिर्फ़ कपड़ों पर की गई कढ़ाई नहीं है, बल्कि पंजाब की संस्कृति, भावनाओं और रिश्तों की पहचान है। ‘फुलकारी’ दो पंजाबी शब्दों से मिलकर बना है फुल यानी फूल और कारी यानी कारीगरी। यानी फूलों जैसी सुंदर कढ़ाई। लेकिन Phulkari की ख़ूबसूरती सिर्फ़ इसके डिज़ाइन में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में छुपी होती है, जो महिलाएं हर टांके के साथ इसमें पिरो देती हैं। पंजाबी महिलाएं फुलकारी के ज़रिए अपने सपने, अपनी मेहनत, अपनी ख़ुशियां और ज़िंदगी के अनुभव धागों में बांध देती हैं। यही वजह है कि हर फुलकारी अपने आप में एक कहानी होती है।

जब हर टांका दिल से जुड़ा होता था

फिरोज़पुर ज़िले के कर्मीती गांव की रहने वाली अमनदीप कौर सीखो बताती हैं कि पहले फुलकारी घरों में दादी-नानी और मांओं के हाथों बनते थे। उस दौर में न मशीनें थीं, न जल्दी। बस धैर्य था, प्यार था और रिश्तों की गर्माहट थी। आज भले ही फुलकारी मशीनों से बनने लगी हो, लेकिन हाथ से बनी फुलकारी की जो आत्मा, अपनापन और एहसास है, वो मशीन की कढ़ाई कभी नहीं दे सकती।

शादी की रस्म और मां का आशीर्वाद

पंजाबी समाज में इस कढ़ाई को बहुत पवित्र और शुभ माना जाता है। ख़ास तौर पर शादी के समय मां अपनी बेटी को फुलकारी कढ़ाई से बना एक दुपट्टा तोहफे में देती है। दुल्हन के सिर पर इसे ओढ़ाया जाता है। ये सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं होता, बल्कि मां का प्यार, उसकी दुआएं और बेटी के आने वाली ज़िंदगी के लिए उसका भरोसा होता है। उस कढ़ाई में मां की ख़ामोश बातें और अनकहे आशीर्वाद छुपे होते हैं।

एक गांव से शुरू हुई पहचान का सफ़र

अमनदीप कौर ने इस कढ़ाई को अपनी पहचान बना लिया है। परिवार की मदद से वो अपनी बहन तरजिंदर कौर के साथ मिलकर इस कला को आगे बढ़ा रही हैं। दोनों बहनें मिलकर पारंपरिक Phulkari को नया रूप दे रही हैं, ताकि ये कला आने वाली पीढ़ियों तक ज़िंदा रह सके। अमनदीप कौर पूरे गर्व से कहती हैं “पंजाबी बोलो, पंजाबी लिखो, पंजाबी पढ़ो, पंजाबी बनो।” उनके लिए ये सिर्फ़ नारा नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी है।

फुलकारी के ज़रिए वो न सिर्फ़ लोगों को रोज़गार दे रही हैं, बल्कि पंजाबी भाषा और संस्कृति को भी संजो रही हैं। उन्होंने बताया कि पहले के पारंपरिक बाग बहुत भारी होते थे, जिन्हें आज की युवा लड़कियां ज़्यादा देर तक नहीं पहन पाती थी। इसी वजह से अब इसे हल्के कपड़ों, जैसे कैम्ब्रिक कॉटन पर बनाई जा रही है। इससे ये कढाई अपनी पहचान बनाए रखते हुए आज की ज़रूरतों के साथ कदम मिला रही है।

मां की फुलकारी, बेटी की यादें

अमनदीप कौर कहती हैं, जब सालों बाद कोई बेटी अपनी संदूक खोलकर मां की दी हुई फुलकारी निकालती है, तो उसे सिर्फ़ कपड़ा नहीं दिखता। उसे मां की मेहनत, उसका प्यार और वो सारी यादें महसूस होती हैं, जो वक़्त के साथ भी फीकी नहीं पड़ती। यही कढ़ाई की असली ताक़त है ये यादों को संभालकर रखती है और दिलों को पीढ़ियों तक जोड़ती है। आज वो पारंपरिक मोर डिज़ाइन वाली शॉल भी बना रही हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो डालने के बाद उनके काम को न सिर्फ़ पंजाब, बल्कि विदेशों से भी पहचान मिलने लगी है।

विरासत को संभालने की अपील

अमनदीप कौर अपने काम को मेलों और अलग-अलग एग्ज़ीबिशन में दिखाती हैं। इससे लोगों में हाथ से बनी कला और पंजाबी संस्कृति के प्रति फिर से दिलचस्पी बढ़ रही है। आख़िर में वो अपील करती हैं कि दादी-नानी और मांओं से मिली फुलकारियां, कपड़े के थैले और हाथ से बनी चीज़ों को संभालकर रखें। ये सिर्फ़ सामान नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी जड़ें और हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना बेहद ज़रूरी है।

इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: ‘Kashmir Ki Kali’: सुजाता की पहल जो कश्मीर की महिलाओं को हुनर, पहचान और रोज़गार से जोड़ रही है

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