1927 की ठंडी नवंबर की रात… अमेरिका के बैटल क्रीक कॉलेज (Battle Creek College) में एक भारतीय महिला मंच पर खड़ी थीं। उनके सामने विदेशी छात्र और प्रोफेसर बैठे थे। वो महिला थीं लेडी मेहरबाई टाटा (Lady Meherbai Tata) सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस दौर की वो आवाज़ जिसने भारतीय महिलाओं के लिए नए इतिहास की नींव रखी।
Child Marriage के ख़िलाफ जंग
लेडी मेहरबाई (Lady Meherbai Tata) ने उस शाम अमेरिकी जनता को बताया कि कैसे भारत में 12 साल से कम उम्र की बच्चियों की शादी को रोकने के लिए कानून लाया जा रहा है। उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि बड़ौदा, मैसूर और भरतपुर जैसे राज्य पहले ही बाल विवाह के खिलाफ कानून बना चुके हैं। उनका कहना था कि अब British Government को भी ये कानून बनाना चाहिए।
उन्होंने वहां मौजूद लोगों से कहा, ‘मैं आपको वह पर्चा दिखाना चाहती हूं जो एक भारतीय विधायक ने भेजा है। वह सरकार में एक बिल लाना चाहते हैं, जिसमें लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय की जाए।’
कानून पास होने का सफ़र
लेडी टाटा का यह भाषण सुनकर लगा कि शायद जल्द ही यह बिल पास हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस कानून को पास होने में दो साल और लग गए। इसमें सबसे बड़ी कमी थी विधानसभा में महिलाओं का न होना।

ये वही संघर्ष था जिसके चलते 1929 में ‘Sharda Act’ (बाल विवाह निरोधक कानून) पास हुआ। लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था। लेडी मेहरबाई ने न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी इसके लिए अभियान चलाया। वो जानती थीं कि दुनिया की राय बदलने से भारत में भी बदलाव आएगा।
1930 में आल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस में लेडी टाटा ने कहा, ‘शारदा बिल (Sharda bill) के वक्त समर्थकों को सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की हुई कि विधानसभा में कोई महिला सदस्य नहीं थी। अगर महिलाएं होतीं, तो वे अपनी बहनों की पीड़ा को और जोरदार तरीके से रख पातीं।‘
Women Empowerment की Pioneer
लेडी मेहरबाई सिर्फ एक कानून के लिए नहीं लड़ रही थीं। वह चाहती थीं कि भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ें। उन्होंने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए आवाज़ उठाई। 1921 में बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल में महिलाओं को वोट का अधिकार दिलाने में उनकी अहम भूमिका थी।
दुनिया में Voice of Indian Women
लेडी टाटा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थीं। वो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय महिलाओं की आवाज बनीं। 1921 में लंदन की एक पत्रिका ने लिखा कि बॉम्बे (अब मुंबई) में लेडी टाटा की अध्यक्षता में एक विशाल सभा हुई, जिसने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलाने की मांग की।
1924 में लंदन के वेम्बली में आयोजित Women’s Week’ में उन्होंने भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया। वो International Council of Women में भारत को लेकर गईं और National Council of Women in India की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।

Sports में भी आगे
लेडी मेहरबाई सिर्फ समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन खिलाड़ी भी थीं। वो अक्सर अपनी पारंपरिक ‘गारा’ साड़ी पहनकर टेनिस खेलती थीं। जर्मनी के Kissingen और Baden-Baden में हुए अंतर्राष्ट्रीय टेनिस मुकाबलों में उन्होंने पुरस्कार जीते। साड़ी पहनकर टेनिस कोर्ट पर छाए रहना उनके आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की मिसाल थी।

Foreign Trips में बनाई पहचान
लेडी मेहरबाई ने अपने पति सर दोराबजी टाटा के साथ दुनिया भर की यात्राएं कीं। 29 नवंबर, 1927 को मिशिगन में भाषण देने से सिर्फ दो दिन पहले वो अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज से व्हाइट हाउस में मिल चुकी थीं। वो ब्रिटेन के राजा और रानी से भी मिलीं। लेकिन इन शाही मुलाकातों में भी उन्होंने भारतीय महिलाओं की पीड़ा को उठाया।

अपनी Identity पर अडिग
लेडी मेहरबाई की सबसे ख़ास बात थी उनका स्वाभिमान। जब उनके पिता ने उनका नाम बदलकर ‘मैरी’ (अंग्रेजी नाम) रखना चाहा, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। वो चाहती थीं कि उनका फारसी नाम ‘मेहरबाई’ ही बना रहे। ये छोटी सी घटना बताती है कि वो वेस्टर्न चकाचौंध में भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहीं।
आख़िरी सलाम
1931 में जब मात्र 52 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, तो लंदन के अखबार ‘The Common Cause’ ने लिखा, “लेडी टाटा की मौत भारत की महिला आंदोलन के लिए बहुत बड़ा झटका है। वो न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में आधुनिक भारतीय महिला की मिसाल थीं।”

लेडी मेहरबाई टाटा ने साबित किया कि एक महिला एक साथ समाज सुधारक, खिलाड़ी, यात्री और अपनी संस्कृति की रक्षक हो सकती है। उनकी कहानी आज भी हर उस लड़की को प्रेरणा देती है जो सीमाएं तोड़ना चाहती है।
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