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देहात से निकली आवाज़ें बनीं किताब, दिल्ली में लॉन्च हुई ‘बड़ी आई पत्रकार’

जब किसी सूखी ज़मीन से कोई आवाज़ उठती है, तो वह सिर्फ़ आवाज़ नहीं रहती — एक लंबी गूंज में बदल जाती है। जैसे तपती धरती से पानी भाप बनकर उड़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है गहरी दरारें… वैसे ही समाज की बंदिशों, तानों और बेड़ियों ने कई महिलाओं के दिलों में भी ऐसी दरारें बना दी थीं, जहाँ कभी सपने, उम्मीद और आत्मविश्वास बसते थे। लेकिन फिर Khabar Lahariya उम्मीद बनकर सामने आया। गांवों और छोटे कस्बों की महिलाओं ने समाज की रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपने हाथों में क़लम थामी और निकल पड़ीं अपनी पहचान बनाने। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की मिट्टी से उठी इन महिलाओं की आवाज़ अब सिर्फ़ गांवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश तक पहुंची। इन्हीं संघर्षों, सपनों और साहस की कहानियों को समेटे हुए ‘बड़ी आई पत्रकार’ किताब का विमोचन दिल्ली के मंडी हाउस स्थित Triveni Kala Sangam में एक ख़ास आयोजन के दौरान किया गया। यह किताब उन महिला पत्रकारों की यात्रा को सामने लाती है, जिन्होंने मुश्किल हालातों के बावजूद पत्रकारिता की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। कार्यक्रम में साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कई लोग मौजूद रहे। Simon & Schuster द्वारा प्रकाशित यह किताब हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। अंग्रेज़ी में इसका नाम The Good Reporter रखा गया है।

खबर लहरिया की महिला पत्रकारों की कहानी

बड़ी आई पत्रकार’ किताब ख़ासतौर पर Khabar Lahariya से जुड़ी महिला पत्रकारों की यात्रा को एक नया रूप देती है। किताब में इन पत्रकारों ने अपने संघर्ष, सामाजिक चुनौतियों और पत्रकारिता के दौरान आए अनुभवों को बेहद खुलकर साझा किया है। किताब में ये भी बताया गया है कि समाज के बने-बनाए नियमों को तोड़ने और अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा। ग्रामीण परिवेश से आने वाली इन महिलाओं ने न सिर्फ़ पत्रकारिता में अपनी जगह बनाई, बल्कि समाज की कई रूढ़ियों को भी चुनौती दी।

बेबाक अंदाज़ में रखी अपनी बातें

इस किताब की सबसे खास बात इसकी बेबाकी है। महिला पत्रकारों ने अपने जीवन के उन पहलुओं पर भी खुलकर बात की है, जिन पर अक्सर सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं होती। उन्होंने अपनी कमियों, डर, संघर्ष और मजबूती — सभी पहलुओं को ईमानदारी से सामने रखा है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने किताब को महिलाओं की आवाज़ और ग्रामीण पत्रकारिता का एक मज़बूत दस्तावेज़ बताया।

इन लेखिकाओं ने साझा किए अपने अनुभव

इस किताब में कई महिला पत्रकारों ने अपने अनुभवों और संघर्ष की कहानियों को लिखा है। इनमें दिशा मलिक, गीता देवी, हर्षिता वर्मा, कविता बुंदेलखंडी, लक्ष्मी शर्मा, ललिता, मीरा देवी, नाज़नी रिज़वी, श्यामकली और सुनीता प्रजापति शामिल हैं। ये किताब सिर्फ पत्रकारिता की कहानी नहीं, बल्कि उन महिलाओं की यात्रा है जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी आवाज़ को देशभर तक पहुंचाया।  आपको बताता चले कि ये किताब पत्रकारिता के ख़तरे को भी समाज के सामने उजागर करती है।

आईए किताब के कुछ अंश ( अंधविश्वासी मन)

दोस्तों किताब काफी दिलचस्प लगती है। मैं आपको इस किताब के पेज नंबर 27 पर ले चलता हूं वहां लेखिका समाज में व्याप्त अंधविश्वास की बात कर रही हैं।

एक अच्छा पत्रकार बनने के लिए हमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सब तरह की मुश्किलों से गुजरना पड़ा है… ईमानदारी से कहें तो कोई भी पत्रकार, चाहे वह कितना ही अलग और निष्पक्ष क्यों न हो, असल में अपने पूर्वाग्रहों और अंदर चलने वाले संघर्षों को पूरी तरह से ख़त्म नहीं कर पाता है…

दोस्तों आपको इसी विषय से जुड़ी एक और कहानी की ओर ले जाता हूं। इस किताब में लेखिका एक कहानी का ज़िक्र करती हैं कि

मैं इस ख़बर की के लिए उत्साहित थी। एक दिन पहले मैंने अपने कपड़े धो लिए क्योंकि मुझे लगता था कि मुझे देव स्थान पर जाना है, तो धुला हुआ कपड़ा ही पहन कर जाउंगी…  वहां जाकर देखा कि बाबा के पास जाना है, उनके लिए पैसों से पर्चा काट रहे हैं। तब मेरे दिमाग की खिड़की खुल गई कि ये तो कमाई का ज़रिया है… 2017 में इस ख़बर को लिखते समय लेखिका को अपनी आस्था छोड़नी पड़ी थी।

किताब की लेखिकाओं से ख़ास बातचीत

डीएनएन 24 से बातचीत के दौरान Meera Devi ने कहा कि ‘बड़ी आई पत्रकार’ उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में महिलाओं के लिए अक्सर तंज़ के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला एक कमेंट है। उन्होंने बताया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को कई बार इस तरह के ताने सुनने पड़ते हैं। मीरा देवी ने कहा, “लोग हमें सालों तक ‘बड़ी आई पत्रकार’ कहकर कमतर दिखाने की कोशिश करते रहे। उन बातों की टीस हमारे मन में कहीं न कहीं बनी हुई थी। आख़िरकार हमने उसी ताने को अपनी ताक़त बनाया और उसे ही किताब का शीर्षक बना दिया। अपने अनुभवों और संघर्षों को हमने इस किताब में खुलकर लिखा है।”

अब बात करते हैं इस किताब की मुख्य लेखिका Disha Malik की। डीएनएन 24 से बातचीत में दिशा मलिक ने बताया कि यह किताब Khabar Lahariya नाम के ग्रामीण न्यूज़ नेटवर्क की 25 साल की यात्रा को सामने लाती है।

उन्होंने कहा, “ख़बर लहरिया की शुरुआत क़रीब 25 साल पहले उत्तर प्रदेश में हुई थी। यह उन ग्रामीण महिला पत्रकारों की कहानी है जिन्होंने अपने हाथों में क़लम लेकर अपनी पहचान बनाई। हमने इस किताब में सिर्फ़ ख़बरें नहीं लिखीं, बल्कि हर ख़बर के पीछे की कहानी, संघर्ष, भावनाएं और एक ग्रामीण महिला पत्रकार होने के अनुभव को दर्ज करने की कोशिश की है। यह एक सामूहिक जीवनी की तरह है, जिसमें कई महिलाओं की आवाज़ और उनकी यात्रा शामिल है।”

दोस्तों यह किताब दलित नारीवादी नजरिए से लिखी गई यह किताब राजनीतिक रुप से बहुत सटीक है। ये किताब एक दलित महिला के नज़रिए से राजनीति और समाज को देखने का एक  नया तरीका सिखाती है। इस पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों को और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

ये भी पढ़ें: सांची का स्तूप: मूर्तिकला और नक़्क़ाशी का बेमिसाल संगम

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