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अनगिनत तबले, एक रिश्ता – ज़ाकिर हुसैन और उनके तबला निर्माता Haridas Ramchandra Vhatkar का सफ़र

महाराष्ट्र के मिराज से मुंबई तक का सफ़र एक ऐसे कारीगर की कहानी है, जिनके हाथों से बने तबलों पर देश और दुनिया के सबसे बड़े कलाकारों ने अपनी ताल सजाई। तीसरी पीढ़ी के तबला निर्माता हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) ने अपनी मेहनत, धैर्य और हुनर से संगीत की दुनिया में एक ख़ास पहचान बनाई। उनके बनाए तबले उस्ताद ज़ाकिर हुसैन जैसे महान कलाकार की पहली पसंद रहे।

15 दिसंबर 2024 को उस्ताद ज़ाकिर हुसैन भले ही इस दुनिया से विदा हो गए हों, लेकिन उनकी ताल, उनका संगीत और उनकी विरासत आज भी ज़िंदा है। हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) ने उनके लिए अनगिनत तबले बनाकर इस विरासत को और मज़बूत किया। आज भी जब हरिदास तबले पर हाथ रखते हैं, तो उसमें ज़ाकिर हुसैन की याद, उनका प्यार और उनकी सीख बस जाती है।

बचपन जो खेल में नहीं, दुकान में बीता

हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) का बचपन आम बच्चों की तरह खेल के मैदानों में नहीं, बल्कि तबले की दुकान में बीता। वो बताते हैं कि जब छोटे थे, तब उनके दादा उन्हें रोज़ अपने साथ दुकान ले जाया करते थे। उनके दादा और पिता दोनों ही तबला बनाने का काम करते थे। “मैं रोज़ 10–12 घंटे उनके साथ रहता था। उस उम्र में मुझे ये एहसास भी नहीं हुआ कि मैं कोई कला सीख रहा हूं।

मैं बस देखता था, सुनता था और धीरे-धीरे सब कुछ अपने आप सीखता चला गया।” उस समय आम धारणा थी कि बच्चों से काम नहीं करवाना चाहिए। लेकिन Haridas मानते हैं कि उनके दादा के मन में कहीं न कहीं ये बात ज़रूर थी कि अगर बच्चे को साथ रखा जाएगा, तो ये कला आगे बढ़ेगी।

विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला

हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) ने बचपन से देखा कि कलाकार उनके दादा और पिता को कितनी इज़्ज़त देते थे। बड़े-बड़े उस्ताद दुकान पर आते, सुर और ताल की बातें करते, और कारीगर के काम की कद्र करते। “मुझे वहीं समझ आ गया था कि ये सिर्फ़ काम नहीं है। ये सम्मान का पेशा है। कभी-कभी इज़्ज़त और प्यार, पैसों से कहीं ज़्यादा कीमती होते हैं।” यही सोच उन्हें इस पेशे की ओर खींच लाई। वहीं उन्होंने तय कर लिया कि आगे चलकर वे भी यही काम करेंगे।

हरिदास मानते हैं कि उनके दादा के मन में एक साफ़ सोच थी ये हुनर कभी खत्म नहीं होना चाहिए। इसलिए वो उन्हें हमेशा अपने साथ रखते थे। “मैंने वहीं तय किया कि मुझे आगे चलकर यही काम करना है। क्योंकि मुझे लगा कि इज़्ज़त और प्यार पैसों से कहीं ज़्यादा कीमती होते हैं।”

मिराज से मुंबई: सपनों के साथ संघर्ष

जब हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) मिराज से मुंबई आए, तब उनके मन में दो बड़े सपने थे। पहला अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठाना, क्योंकि आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। दूसरा और सबसे बड़ा सपना उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के लिए तबला बनाना। साल 1994 में वो मुंबई पहुंचे। शुरुआत बेहद मुश्किल थी।

मुंबई आने के बाद हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) के पास रहने की भी कोई जगह नहीं थी। उन्हें बस इतना पता था कि लालबाग इलाक़े में तबले की कई दुकानें हैं। वो वहीं पहुंचे और काम ढूंढा। एक दुकान में काम मिला। कुछ दिनों बाद उन्होंने दुकानदार से कहा कि अगर रहने की थोड़ी-सी जगह मिल जाए, तो वो दिन-रात मेहनत करेंगे। दुकानदार ने न सिर्फ़ रहने की जगह दी, बल्कि खाना भी खिलाया। हरिदास कहते हैं, “ऐसे ही लोगों की मदद से मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ पाया।”

संघर्ष और पहला सहारा

इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हरिभाऊ विश्वनाथ म्यूज़िकल्स के मालिक दिलीप जी से हुई, जिन्हें लोग नाना सेठ के नाम से जानते हैं। हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) के लिए वो सिर्फ़ व्यापारी नहीं, बल्कि गुरु और पिता जैसे बने।“नाना सेठ को सुर और ताल की बहुत गहरी समझ थी। उन्होंने मुझे बताया कि तबला की किनारी की आवाज़ कैसी होनी चाहिए और थाप में कितनी मिठास होनी चाहिए।” हरिदास मानते हैं कि आज जो भी पहचान है, उसमें नाना सेठ की सीख और भरोसे का बड़ा योगदान है।

उस्ताद अल्ला रक्ख़ा साहब की सीख

ज़ाकिर हुसैन तक पहुंचना आसान नहीं था। हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) को इसके लिए करीब चार साल तक संघर्ष करना पड़ा। 1998 में जाकर उन्हें पहली बार ज़ाकिर साहब के लिए तबले बनाने का मौक़ा मिला। हरिदास ने उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के पिता, उस्ताद अल्ला रक्ख़ा साहब के लिए भी कुछ तबले बनाए। अल्ला रक्ख़ा साहब ने उनसे कहा “तुम्हारा काम बहुत अच्छा है, लेकिन इसे संभालकर रखना। घमंड मत करना।” ये सलाह हरिदास की ज़िदगी का मूल मंत्र बन गई।

परिवार और चौथी पीढ़ी

आज हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) के दोनों बेटे उनके साथ काम कर रहे हैं। बड़े बेटे को भारत सरकार ने यंग जनरेशन बेस्ट तबला मेकर का सम्मान दिया है। छोटा बेटा मनोज भी एक कुशल तबला कारीगर है। हरिदास कहते हैं, “मैंने कभी बच्चों पर ज़ोर नहीं डाला। मैंने उन्हें पढ़ाया और आगे का रास्ता उन्होंने खुद चुना।” उनके लिए ये गर्व की बात है कि उनके परिवार में चौथी पीढ़ी भी इस कला को आगे बढ़ा रही है।

ज़ाकिर हुसैन से पहली मुलाक़ात

साल 1998 वो साल था, जब हरिदास ने पहली बार उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के लिए तबला बनाया। उससे पहले उन्होंने मुंबई में पं. अरविंद मुर्गांव जी के लिए तबले तैयार किए थे। उसी दौरान महाराष्ट्र में पं. सूर्य तलवलकर जी ने एक सेमिनार आयोजित हुआ, जिसमें देशभर से बड़े कलाकार और स्टूडेंट शामिल हुए। उस सेमिनार में पं. अरविंद मुर्गांव जी हरिदास के बनाए तबला लेकर पहुंचे। जैसे ही कलाकारों ने उन तबलों को देखा और सुना, उनकी चर्चा होने लगी।

वही तबले हरिदास की पहचान बन गए। धीरे-धीरे ये बात फैल गई कि मुंबई में एक बेहतरीन तबला निर्माता आया है। ये चर्चा ज़ाकिर हुसैन तक भी पहुंची। उनके गुरु-भाई योगेश शम्सी सबसे पहले हरिदास के पास आए। हरिदास ने उनके लिए तबले बनाए, जिन्हें देखकर योगेश शम्सी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ज़ाकिर हुसैन को संदेश भेजा कि मुंबई में एक कारीगर है, जो बहुत अच्छे तबले बनाता है।

ज़ाकिर हुसैन ने कहा – “मेरे लिए भी तबले ऑर्डर करो।” इसके बाद हरिदास ने छह से आठ तबले बनाए। कुछ ही समय बाद ज़ाकिर हुसैन का संदेश आया- “हरिदास को बुला लो।” हरिदास बताते हैं कि उनका सपना था ज़ाकिर हुसैन से मिलने जाना, लेकिन उन्हें खुद अपने पास बुलाया गया। उनके तबले पहले पहुंच चुके थे, और बाद में ज़ाकिर हुसैन ने अपना ड्राइवर भेजकर हरिदास को दुकान से अपने घर बुलवाया। वो पहली मुलाक़ात आज भी हरिदास के दिल में उतनी ही ताज़ा है। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ज़ाकिर हुसैन के लिए कितने तबले बनाए, तो हरिदास मुस्कराकर कहते हैं “अनगिनत। जैसे कोई पूछे कि एक हफ़्ते में आपने कितने निवाले खाए।”

नाराज़गी में छुपा प्यार

हरिदास बताते हैं कि उन्होंने ज़ाकिर हुसैन के साथ बहुत समय बिताया है। एक किस्सा याद करते हुए वो कहते हैं कि एक बार उन्हें मलेरिया हो गया था और वो मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती थे। भर्ती हुए अभी एक ही दिन हुआ था कि अगले दिन ज़ाकिर हुसैन के घर से फोन आया उन्हें शाम सात बजे आने के लिए कहा गया था।

हरिदास बताते हैं कि वो अपनी खराब तबीयत के बारे में ज़ाकिर भाई को बता नहीं पाए। उन्होंने डॉक्टर से कहा कि उन्हें हर हाल में ज़ाकिर भाई के पास जाना है। बहुत ज़िद के बाद वो अस्पताल से निकलकर सीधे ज़ाकिर हुसैन के घर पहुंचे। कुछ देर बाद ज़ाकिर हुसैन को पता चला कि हरिदास बीमार होने के बावजूद उनसे मिलने आए हैं। ये जानकर वो भावुक हो गए और बोले – “आज के बाद मैं आपसे काम नहीं करवाऊंगा। आपने जो किया, बहुत किया।”

हरिदास कहते हैं कि ये सुनकर वो रो पड़े और पूछा कि उनसे क्या गलती हो गई। तब ज़ाकिर हुसैन ने कहा, “मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी। आपने ये सोचकर नहीं बताया कि आप बीमार हैं। अगर बताते, तो हम खुद आपसे मिलने आ जाते। आगे कभी ऐसा मत करना।” इसके बाद ज़ाकिर हुसैन ने उन्हें एक प्रशंसा पत्र दिया, जिसमें लिखा था कि वो सालों से हरिदास को जानते हैं, वो एक उत्कृष्ट तबला निर्माता हैं और उनकी ट्यूनिंग संतुलित और शुद्ध होती है। उन्होंने उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।

जब रिकॉर्डिंग के बाद ज़ाकिर हुसैन ने हरिदास का दिया परिचय

हरिदास एक किस्सा बताते हैं कि एक बार ज़ाकिर भाई की रिकॉर्डिंग थी और वो हरिदास को अपने साथ ले गए। हरिदास बाहर खड़े थे, तभी ज़ाकिर हुसैन बाहर आए। थोड़ी देर में कैमरामैन हरिदास के सामने आकर खड़ा हो गया। तभी ज़ाकिर हुसैन मुस्कराए और बोले, “आप कुछ बोलिए।” फिर ज़ाकिर भाई ने कैमरे के सामने मेरा परिचय देते हुए कहा, “ये हरिदास जी हैं, जो मेरे लिए तबला बनाते हैं।” ये मेरे लिए बहुत सम्मान का पल था।

जब हरिदास के बनाए तबले देश-विदेश के कलाकारों तक पहुंचे

हरिदास के पास भारत और विदेश से भी कलाकार तबला बनवाने आते हैं। उन्होंने प. आनंद चटर्जी, प. नयन घोष, शुभकंर बैनर्जी, विजय घाटी , प. सुरेश तलवरकर अनगिनत लोग हैं जिनके लिए मैंने काम किया है। हरिदास कहते हैं कि “मुझे तबला बजाना नहीं आता हैं लेकिन मैं अक्सर प्रोग्राम में जाता हूं क्योंकि मैं वहां से मुझे से सीखने के लिए मिलता है।” फिर घर वापस आकर कुछ नई चीजे ईजाद करते हैं। हरिदास से तबला के अलावा कई रिदम वाद्य बनाते हैं जैसे ढोलक, ढोलकी, पखावज, ढोल जितने भी परंपारिक वाद्य है।

ज़ाकिर हुसैन से आख़िरी मुलाक़ात

आज हरिदास रामचंद्र व्हटकर (Haridas Ramchandra Vhatkar) कहते हैं, “मैं उन्हें हर पल याद करता हूं। जब वो थे, तो मैं पूरे जोश से काम करता था। अब लगता है जैसे कुछ खाली हो गया है।” हरिदास बताते हैं कि ज़ाकिर हुसैन ने उन्हें एक कार तोहफ़े में दी थी। हरिदास जब आख़िरी बार मिले, तो वो उसी कार में ज़ाकिर हुसैन से मिलने पहुंचे थे। तब ज़ाकिर हुसैन ने उनसे पूछा था कि “ क्या आप खुद गाड़ी चलाकर आए हो?”

तो हरिदास ने जवाब दिया कि “ड्राइवर साहब चलाकर आए है।” हरिदास का जवाब सुनकर ज़ाकिर हुसैन बहुत खुश हुए। हरिदास कहते हैं कि अगर उन्हें भगवान उनसे पूछे कि आपको क्या चाहिए तो कहेंगे कि अगले जन्म में भी ज़ाकिर भाई के लिए तबला बनाना चाहते हैं।

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