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अभिनंदन पांडे: आज के दौर की शायरी में एक संजीदा, ख़ामोश और असरदार आवाज़

उर्दू शायरी की दुनिया हमेशा से जज़्बात, तजुर्बों और सवालों की ज़मीन रही है। हर दौर में कुछ ऐसे शायर पैदा होते हैं, जो शोर मचा कर नहीं, बल्कि अपनी ख़ामोशी से पहचाने जाते हैं। जिनकी शायरी धीरे-धीरे दिल और ज़ेहन में उतरती है और देर तक साथ रहती है। मौजूदा दौर में अभिनंदन पांडे उन्हीं चुनिंदा आवाज़ों में से एक हैं।

उनकी शायरी पढ़ते हुए ये एहसास बार-बार होता है कि यह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की कारीगरी नहीं, बल्कि ज़िंदगी को बहुत क़रीब से देखने और महसूस करने का नतीजा है। उनकी ग़ज़लों में न कोई बनावटी शोर है, न ज़रूरत से ज़्यादा अलंकार बल्कि एक ठहरी हुई संजीदगी, एक भीतर तक उतर जाने वाला एहसास मौजूद है।

ज़िंदगी से शायरी तक का सफ़र

अभिनंदन पांडे की पैदाइश 29 जून 1988 को बिहार के तारीख़ी और सांस्कृतिक शहर पटना में हुई। ये वही शहर है जिसने सदियों से इल्म, फ़िक्र और सियासत को एक साथ पनपते देखा है। शायद इसी वजह से उनके अंदर शुरू से ही सवाल करने और सोचने की आदत रही।

उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई के बाद भोपाल से इंजीनियरिंग की। पढ़ाई पूरी करने के बाद, आम युवाओं की तरह उन्होंने भी नौकरी का रास्ता चुना। क़रीब सात साल तक हिंदुस्तान के अलग-अलग शहरों में काम किया। ऊपरी तौर पर ज़िंदगी ठीक चल रही थी, मगर अंदर कहीं एक बेचैनी थी एक ऐसा सवाल, जो रोज़ उनसे पूछता था कि क्या यही करना था?

आख़िरकार दिसंबर 2018 में उन्होंने एक बड़ा फ़ैसला लिया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। ये फ़ैसला आसान नहीं था, लेकिन ज़रूरी था। इसके बाद उन्होंने अपनी रुचि और फ़िक्र के मुताबिक़ पढ़ाई का रुख़ किया और 2020 में अंबेडकर यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर्स की डिग्री हासिल की।

आज वे “सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़, कोलकाता” में बतौर रिसर्च ट्रेनी काम कर रहे हैं। इल्म, तारीख़ और समाज को समझने की यह जद्दोजहद उनकी शायरी में भी साफ़ झलकती है।

 शायरी: जहां एहसास सवाल बन जाते हैं

अभिनंदन पांडे की शायरी का सबसे बड़ा ख़ास पहलू ये है कि वह बहुत शोर नहीं मचाती, बल्कि सवाल पैदा करती है। उनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई इंसान ख़ुद से बातें कर रहा हो। धीमी आवाज़ में, मगर पूरे यक़ीन के साथ।

ग़ौर से देखते रहने की सज़ा पाई है
तेरी तस्वीर इन आंखों में उतर आई है

अभिनंदन पांडे

ये सिर्फ़ इश्क़ का शेर नहीं, बल्कि उस क़ैद का बयान है जो किसी को देखने, समझने और याद रखने से पैदा होती है।

सवाल आ गए आंखों से छिन के होटों पर
हमें जवाब न देने का फ़ायदा तो मिला

अभिनंदन पांडे

ये शेर आज के इंसान की उस हालत को बयान करता है, जहां जवाब देने से ज़्यादा चुप रहना एक तरह की हिफ़ाज़त बन गया है।

फ़लसफ़ा, तजुर्बा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी

अभिनंदन की शायरी में फ़लसफ़ा किताबों की भाषा में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के तर्जुबों में मिलता है। ज़िंदगी, मौत, ख़ामोशी, तन्हाई, पहचान। ये सब उनकी शायरी के अहम मौज़ू हैं।

दरमियां जो जिस्म का पर्दा है कैसे होगा चाक
मौत किस तरकीब से हम को मिलाएगी न पूछ

अभिनंदन पांडे

ये शेर मौत को डर के तौर पर नहीं, बल्कि एक सवाल की तरह पेश करता है ऐसा सवाल, जिसका जवाब किसी के पास नहीं।

रौशनी की ये हवस क्या क्या जलाएगी न पूछ
आरज़ू-ए-सुब्ह कितने ज़ुल्म ढाएगी न पूछ

अभिनंदन पांडे

यहां रोशनी और सुबह उम्मीद के प्रतीक हैं, लेकिन शायर यह भी पूछता है कि उम्मीद की चाह में हम क्या-क्या खो देते हैं।

रिवायत से रिश्ता, नयापन के साथ

अभिनंदन पांडे उन शायरों में से हैं, जो उर्दू शायरी की रिवायत से वाक़िफ़ हैं। उनकी ग़ज़लों में मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब की झलक मिलती है, मगर नकल नहीं। वो रिवायत को समझते हैं, उससे सीखते हैं और फिर उसे अपने दौर की ज़बान में पेश करते हैं।

उनकी शायरी में नयापन मज़ामीन से आता है  ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातें, अंदरूनी डर, ख़ुद से भागने की कोशिश, और फिर उसी ख़ुद से सामना।

चलो फ़रार-ए-ख़ुदी का कोई सिला तो मिला
हमीं मिले नहीं उसको हमें ख़ुदा तो मिला

अभिनंदन पांडे

ये शेर आज के इंसान की उस हालत को बयान करता है, जहां वह ख़ुद से भागता है, लेकिन उस भागदौड़ में किसी बड़े सच से रूबरू हो जाता है।

नौजवानों में बढ़ती लोकप्रियता

आज के नौजवान शायरों और पाठकों के बीच अभिनंदन पांडे की शायरी को ख़ास अहमियत से देखा जा रहा है। इसकी वजह ये है कि उनकी शायरी न तो बहुत मुश्किल है, न सतही। वो सीधे दिल और दिमाग दोनों से बात करती है।

उनकी ग़ज़लें सुनने और पढ़ने वाला ख़ुद को उनमें शामिल महसूस करता है जैसे ये अशआर उसी की कहानी कह रहे हों।

उर्दू शायरी में एक नई उम्मीद

अभिनंदन पांडे की शायरी अपनी ताज़गी, सादगी और असर की वजह से उर्दू के शेरी अदब में एक अहम इज़ाफ़ा मानी जा सकती है। वो न तो जल्दबाज़ी में मशहूर होना चाहते हैं, न ही शोर के सहारे पहचान बनाना।

उनकी शायरी का सफ़र अभी जारी है धीमे क़दमों से, मगर पूरे यक़ीन के साथ। और शायद यही वजह है कि उनकी आवाज़ देर तक सुनाई देती है।

अंत में कहा जा सकता है कि अभिनंदन पांडे आज के दौर के उन शायरों में से हैं, जिनकी शायरी पढ़कर यह भरोसा पैदा होता है कि उर्दू शायरी का कल सुरक्षित हाथों में है ऐसे हाथ, जो अल्फ़ाज़ को सिर्फ़ सजाते नहीं, बल्कि उन्हें महसूस भी करते हैं।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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