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हथकरघे की खड़खड़ाहट में बसी है भारत की सांस्कृतिक विरासत और शान-ओ-शौकत

भारत की मिट्टी में करघों की खड़खड़ाहट, रंग-बिरंगे धागों की महक, और बुनकरों की उंगलियों का जादू सदियों से बसा हुआ है। ये हथकरघा सिर्फ कपड़ा बुनने का ज़रिया नहीं,बल्कि हमारी तहज़ीब, हमारी पहचान, और हमारे एतबार का अहम हिस्सा है। ये वो विरासत है, जिसने ग़ुलामी की बेड़ियों में भी जज़्बातों को रेशमी धागों में पिरोना सिखाया।

7 अगस्त, जब पूरा देश राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (National Handloom Day) मनाता है, वो सिर्फ एक तारीख़ नहीं, बल्कि उस जज़्बे की याद है, जब 1905 में स्वदेशी आंदोलन (Swadeshi Movement) ने हमें बताया कि अपनी चीज़ों में ही ताक़त है, अपनी धरोहर में ही रूह है।

आज हम उसी परंपरा के सफ़र पर चलेंगे, जो सिंधु घाटी की गलियों से निकलकर आज गूगल के सर्च इंजन और मेटावर्स तक पहुंच गई है। ये लफ्ज़ हर उस शख़्स को सलाम हैं, जिसने अपनी कला को बचाने के लिए जद्दोजहद की है। चलिए, जानते हैं कि कैसे हथकरघा आज भी करोड़ों भारतीयों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया है, और कैसे ये उद्योग औरतों को इज़्ज़त और ताक़त देने का सबसे बड़ा हथियार बना है।

हथकरघा (pexels.com) 

अतीत का आईना : जब हथकरघा था ज़िंदगी

सिंधु से लेकर वेदों तक की दास्तान

हथकरघे की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इनके निशान सिंधु घाटी सभ्यता में मिलते हैं। ऋग्वेद, रामायण, और महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथों में भारतीय कपास और रेशम की उम्दा क़ाबिलियत की तारीफ़ मिलती है। यहां तक कि आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी बुनाई की कला का ज़िक्र किया है।

उस ज़माने में बुनाई सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक इबादत थी। उमराव (Julahas) अपनी रूह झोंक देते थे धागों में। पौधों, फूलों और फलों से निकाले गए रंग (Natural Dyes) उन कपड़ों को जादुई बनाते थे। हर रंग, हर डिज़ाइन में कोई न कोई अफ़साना छिपा होता था।

मुग़लों से लेकर अंग्रेज़ों तक : उतार-चढ़ाव का दौर

भारतीय बुनकरों के हुनर की धाक पूरी दुनिया में थी। मुग़ल दरबारों की शान-ओ-शौकत इन्हीं हथकरघों की देन थी। लेकिन जब अंग्रेज़ों की नज़र भारत की इस समृद्धि पर पड़ी, तो उन्होंने चाल चली। उन्होंने भारत को बाज़ार और कच्चे माल का सोर्स बनाना चाहा।

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के बाद मशीनों से बने अंग्रेज़ी कपड़ों ने हाथ से बुने कपड़ों की जगह लेनी शुरू कर दी। ये सिर्फ बिज़नेस की हार नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास की हार थी, जो हमारी रूह को लहू कर गई।

हथकरघा (pexels.com) 

स्वदेशी आंदोलन : जब धागे ने बदली इतिहास की दिशा

7 अगस्त, 1905 वो तारीख़ी दिन था, जब अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे दिग्गज नेताओं ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया।

इस आंदोलन ने हथकरघा को सिर्फ एक वस्त्र उद्योग नहीं, बल्कि मुक़ाबले का प्रतीक बना दिया। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना स्वाभिमान का सवाल बन गया। ये वही भावना थी, जिसने 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दिन को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित करने के लिए प्रेरित किया।

हथकरघा (pexels.com) 

महात्मा गांधी और खादी का मंत्र

जब महात्मा गांधी ने खादी को आंदोलन का हथियार बनाया, तो हथकरघा ने एक नई ताक़त पाई। उनके लिए खादी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि आत्म-निर्भरता और ग़रीबी ख़त्म करने का ज़रिया थी। उन्होंने चरखे़ को भारत के अफ़साने से जोड़ दिया।

‘खादी का संदेश है-ग़रीब को उसकी इज़्ज़त वापस दो, और उसे उसकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया दो।’-महात्मा गांधी

हथकरघा का वैभव : कला, किस्म, और कारीगरी

क्या है हथकरघा?

हथकरघा एक ऐसा उपकरण है, जो बिना बिजली के, पूरी तरह इंसानी मेहनत से कपड़ा बुनता है। इसमें दो सेटों-ताना (Warp) और बाना (Weft) को आपस में इंटरलॉक करके कपड़ा तैयार किया जाता है।

बुनाई की वो कारीगरी, जो है कमाल

हथकरघे की सबसे ख़ास बात इसकी फ्लेक्सिबिलिटी है। एक ही करघे पर बुनकर ज़रूरत और फैशन के हिसाब से कितने ही डिज़ाइन बदल सकता है। आइए, भारत की मशहूर बुनावट टेक्निक  पर एक नज़र डालते हैं-:

  • प्लेन वीव (Plain Weave) : ये सबसे साधारण बुनावट है, जिसका इस्तेमाल आम कपड़े, मलमल, और साड़ियां बनाने में होता है।इसकी सतह चिकनी होती है।
  • ट्विल वीव (Twill Weave) : इस बुनावट में कपड़े पर Diagonal लाइन्स बनती हैं। डेनिम (जींस) इसी तकनीक का जादू है।
  • साटन वीव (Satin Weave) : ये तकनीक कपड़े को चमकदार और मुलायम बनाती है। महंगे कपड़े और टेपेस्ट्री बनाने में इसका इस्तेमाल होता है।
  • जैक्वार्ड वीव (Jacquard Weave) : ये बुनावट का ‘कंप्यूटर’ है। इस तकनीक से बहुत ही बारीक और जटिल डिज़ाइन बनाए जाते हैं। बनारसी साड़ियों में ऐसी बुनावट देखने को मिलती है।
  • बास्केट वीव (Basket Weave) : इसका इस्तेमाल आमतौर पर टोकरियां, चटाइयां, और गर्म कपड़े (जैसे स्वेटर) बनाने में होता है।
Image-pexels.com

भारत का हर राज्य अपने हथकरघे के लिए मशहूर है। यहां का हर धागा, हर रंग किसी न किसी क्षेत्र की संस्कृति को दिखाता है-:

 तमिलनाडु – कांजीवरम साड़ी

  • ख़ासियत : मोटे रेशम और सोने-चांदी की ज़री से बनी
  • पहचान : दक्षिण भारतीय दुल्हनों की पहली पसंद
  • समय : एक साड़ी बनने में एक महीना लगता है
  • अहमियत : शादी के मौक़े पर पहनी जाने वाली सबसे इज़्ज़तदार साड़ी

उत्तर प्रदेश – बनारसी रेशम साड़ी

  • ख़ासियत : बारीक बुनावट, ज़री का शानदार काम
  • डिज़ाइन : मुग़लई अंदाज़ और पुरानी तहज़ीब की झलक
  • पहचान : भारत की सबसे पसंदीदा शादी वाली साड़ी
  • ख़ास बात : हर साड़ी में छिपी है बुनकर की कला और मेहनत

महाराष्ट्र-पैठणी साड़ी

  • ख़ासियत : तिरछी चौकोर बॉर्डर (भूगोल)
  • पल्लू पर : मोर-तोते और फूलों के ख़ूबसूरत डिज़ाइन
  • रंग : गहरे और चमकीले रंगों का जादू
  • पहचान : महाराष्ट्र की शान मानी जाती है

मध्य प्रदेश-चंदेरी साड़ी

  • ख़ासियत : हल्की, चमकदार, और ट्रांसपेरेंट
  • प्रिंट : सिक्के, मोर, और फूलों के ज्यामितीय (Geometric) नमूने
  • मशहूर : अपनी मुलायम बुनावट के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है
  • ख़ास बात : गर्मी के मौसम में पहनने के लिए बेहद पसंदीदा

पश्चिम बंगाल – शांतिपुरी / बालुचरी साड़ी

  • ख़ासियत : बांस के करघे पर हाथ से बुनी जाती है
  • बुनावट : मुलायम और हल्की जो पहनने में आराम दे
  • पल्लू पर : ताना-बाना (Scenes of Life) बनाए जाते हैं
  • पहचान : बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा

असम-मेखला चादर

  • ख़ासियत : पारंपरिक असमिया पोशाक
  • सामग्री : रेसम (रेशम) से बनी
  • ख़ास बुनावट : अपनी अलग शिनाख़्त रखती है
  • पहचान : असम की तहज़ीब और खूबसूरती का प्रतीक

पंजाब-फ़ुलकारी दुपट्टा

  • ख़ासियत : हालांकि ये कढ़ाई है, मगर पंजाब का हर हाथ से बना कपड़ा अनोखा है
  • रंग : जीवंत और ख़ुशनुमा रंगों से सजा
  • पहचान : पंजाब की मेहनतकश औरतों का हुनर
  • ख़ास बात : हर त्योहार और शादी का अहम हिस्सा

रोज़गार के मामले में दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र

हथकरघा क्षेत्र, कृषि के बाद भारत का सबसे बड़ा रोज़गार पैदा करने वाला क्षेत्र है। ये लगभग 31.45 लाख परिवारों को आजीविका देता है। चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019-20) के अनुसार, देश में 35.22 लाख बुनकर और संबंधित मज़दूर हैं।

औरतें हैं इसका आधार

हथकरघा भारत में औरतों को ताक़त देने का सबसे बड़ा उदाहरण है। कुल वर्कफोर्स में 72 फीसदी से ज़्यादा औरतें हैं, यानी लगभग 25.46 लाख ख़ातून इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। ये तादाद बताती है कि कैसे गांव की औरतें इस उद्योग की रीढ़ हैं।

गांवों की अर्थव्यवस्था का आधार

देश में चल रहे कुल 28.20 लाख हथकरघों में से 25.30 लाख (Approximately 90 percent) ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं। इससे अंदाज़ा लगता है कि कैसे हथकरघा देहाती अर्थव्यवस्था को मज़बूती देता है और गांवों से पलायन को रोकता है।

निर्यात और बाज़ार की ताक़त

भारत से निर्यात होने वाले कपड़ों में हथकरघा का बड़ा हिस्सा है। वित्त वर्ष 2025-26 में हथकरघा उत्पादों का निर्यात मूल्य 1,359 करोड़ रुपये रहा। साल 2025 में भारत के हथकरघा उत्पादों का बाज़ार 470.58 मिलियन डॉलर था, जो 2034 तक 953.59 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अंदाज़ा है।

सम्मान और पुरस्कार

सरकार बुनकरों के  बेहतरीन काम को प्रोत्साहित करने के लिए संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार (Sant Kabir Handloom Award and National Handloom Award) प्रदान करती है। 2026 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 22 पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित किया।

Image- NIFT  

ग्लोबल स्टेज पर भारतीय हथकरघा

सरकार हथकरघा को ग्लोबल पहचान दिलाने के लिए भी कोशिशें कर रही है। हाल ही में DC Handlooms और NIFT ने ‘विश्व सूत्र’ नाम के कलेक्शन को पेश किया, जिसमें 30 भारतीय हथकरघों को इंटरनेशनल सिल्हूट के साथ पेश किया गया।

डिजिटल ज़माना और सोशल मीडिया का जादू

‘Vocal for Local’ की नई ऊंचाई

इंटरनेट ने हथकरघा को एक नया बाज़ार दिया है। iTokri.com जैसे प्लेटफॉर्म लाखों बुनकरों और कारीगरों को सीधे कस्टमर्स से जोड़ रहे हैं। iTokri 10,000 से ज़्यादा कारीगरों और 100,000 से ज़्यादा उत्पादों के साथ देश का सबसे बड़ा हथकरघा पोर्टल बन गया है।

Image-PIB

‘Get Ready With Me’ : PM मोदी की अपील

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2026 के राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर नौजवानों से GRWM (Get Ready With Me) वीडियो बनाने की अपील की है। उन्होंने फ़रमाया कि सोशल मीडिया पर अपने पसंदीदा हथकरघा परिधानों के वीडियो शेयर करने से भारतीय बुनकरों के हुनर को दुनिया भर में पहचान मिलेगी।

 नौजवानों की वापसी का चलन

एक दिलचस्प बात ये सामने आई है कि कोरोना के बाद, कई नौजवान जो इस कला को अपने माता-पिता की ज़िंदगी का बोझ समझते थे, अब वापस गांवों की ओर लौट रहे हैं। मोबाइल और ऑनलाइन ट्रेनिंग ने उन्हें नई तकनीकें सीखने और सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी कला को बेचने के मौके दिए हैं।

Image-NIFT

आगे की राह : संभावनाएं और चुनौतियां

बढ़ता ग्लोबल मार्केट : दुनिया भर में इको-फ्रेंडली और हैंडमेड प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ रही है।
डिज़ाइन इनोवेशन : पारंपरिक कला में आधुनिक डिज़ाइन को जोड़ना, जैसा कि ‘विश्व सूत्र’ में दिखा, एक बड़ा मौक़ा है।
ई-कॉमर्स का विस्तार : डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे बुनकरों को दुनिया की सबसे बड़ी मंडी से जोड़ सकते हैं।
औरतों को ताक़त : क्योंकि 72 फीसदी औरतें इस क्षेत्र में हैं, इसलिए इसे मज़बूत करना ‘औरतों को ताक़त’ की नींव को मज़बूत करेगा।

अपनी विरासत को संजोए रखने की ज़िम्मेदारी

हथकरघा सिर्फ एक उद्योग नहीं है, ये भारत की ‘जीती-जागती तहज़ीब’ है। ये हमारी पहचान है, हमारी परंपरा है, और हमारे बुज़ुर्गों की मेहनत की दास्तान है।

ये भी पढ़ें- चिड़िया टापू: प्रकृति का वो हसीन ख्वाब जहां परिंदे बयां करते हैं यहां के राज़

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