उर्दू शायरी की तारीख़ में कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी अदबी ख़िदमात ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। उन्हीं अज़ीम शायरों में अल्लामा सीमाब अकबराबादी का नाम बड़ी इज़्ज़त और एहतराम से लिया जाता है। उनका असली नाम सैयद आशिक़ हुसैन सिद्दीकी था। उनके वालिद का नाम मौलवी मोहम्मद हुसैन था। सीमाब की पैदाइश उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर आगरा में हुयी। बचपन से ही उन्हें इल्म, अदब और शायरी का माहौल मिला, जिसने आगे चलकर उन्हें उर्दू अदब की बुलंद शख़्सियत बना दिया।
सीमाब अकबराबादी को मशहूर उस्ताद शायर दाग़ देहलवी की शागिर्दी हासिल हुई। दाग़ की इस्लाह और रहनुमाई ने उनकी शायरी को नई बुलंदी अता की। जल्द ही सीमाब ने अपनी अलग पहचान बना ली और एक ऐसा दौर आया जब उनकी शायरी घर-घर पढ़ी और सुनी जाती थी। उनकी ग़ज़लें और नज़्में अवाम और ख़वास, दोनों में बेहद मक़बूल थीं।
कहा जाता है कि पूरे हिंदुस्तान में उनके हज़ारों शागिर्द थे। उन्होंने न सिर्फ़ ख़ुद शानदार शायरी की, बल्कि नई नस्ल के शायरों की भी भरपूर रहनुमाई की। इसी वजह से उन्हें उर्दू अदब का एक बड़ा उस्ताद माना जाता है। उनकी अदबी विरासत सिर्फ़ उनकी शायरी तक महदूद नहीं रही, बल्कि उनके शागिर्दों के ज़रिये भी आगे बढ़ती रही।
सीमाब अकबराबादी बेहद ज़हीन और मेहनती शख़्सियत थे। उनकी तस्नीफ़ात की तादाद भी हैरतअंगेज़ है। उनकी किताबें गद्य और पद्य, दोनों अंदाज़ में मिलती हैं। मशहूर शोधकर्ता इफ्तिख़ार इमाम सिद्दीकी ने पत्रिका “शायर” के समकालीन उर्दू साहित्य विशेषांक (1997–98) में सीमाब की किताबों की एक विस्तृत फ़ेहरिस्त पेश की है, जिससे उनकी इल्मी और अदबी दौलत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
उनकी ज़िंदगी का एक दिलचस्प वाक़िआ भी मशहूर है। कहा जाता है कि जब वह तालीम हासिल कर रहे थे, उस वक़्त फ़ारसी के पाठ्यक्रम में जितने भी अशआर होते, वह उनका मंज़ूम उर्दू तर्जुमा करके अपने उस्तादों के सामने पेश कर देते थे। उनकी यह सलाहियत बचपन से ही उनके शायराना ज़ेहन और ज़बान पर पकड़ की गवाही देती है।
सीमाब अकबराबादी ने कुछ अरसा रेलवे महकमे में भी नौकरी की, लेकिन उनका असल शौक़ अदब और शायरी था। आख़िरकार उन्होंने अपनी पूरी तवज्जो इसी मैदान को दी। उन्होंने एक साप्ताहिक अख़बार “ताज” और बाद में मशहूर मासिक रिसाला “शायर” जारी किया। यह रिसाला उर्दू अदब की दुनिया में एक अहम मुक़ाम रखता है और आज भी मुंबई से बाक़ायदा प्रकाशित हो रहा है। इस पत्रिका ने कई बड़े शायरों और अदीबों को पहचान दिलाने में अहम किरदार अदा किया।
सीमाब अकबराबादी की शायरी में ग़ज़लें भी मिलती हैं, लेकिन उनकी ख़ास दिलचस्पी नज़्म में थी। उन्होंने नज़्म को नए अंदाज़ और नए मौज़ूआत दिए। उनकी शायरी में इश्क़, इंसानियत, अख़लाक़, रूहानियत और ज़िंदगी के गहरे एहसास बड़ी ख़ूबसूरती से नज़र आते हैं। उन्होंने क़ुरआन-ए-पाक का मंज़ूम उर्दू तर्जुमा भी किया, जो उनकी इल्मी सलाहियत और दीनी लगाव का बेहतरीन नमूना माना जाता है।
उनकी अदबी सफ़र की झलक उनकी मशहूर किताबों में साफ़ दिखाई देती है। “कलीम-ए-अज्म”, “सिदरतुल मुन्तहा” से लेकर “लौह-ए-महफ़ूज़” तक उनका रचनात्मक सफ़र बेहद लंबा और समृद्ध रहा। इसके अलावा मुग़ल शहज़ादी और शायरा ज़ेबुन्निसा बेगम पर लिखी उनकी किताब भी उर्दू अदब में एक अहम मुक़ाम रखती है।
सीमाब अकबराबादी की शायरी का अंदाज़ बेहद दिलनशीं, असरदार और आम फ़हम था।
उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इंतिज़ार में।
रोज़ कहता हूं कि अब उनको न देखूंगा कभी,
रोज़ उस कूचे में इक काम निकल आता है।
और यह शेर आज भी मोहब्बत और एहसास की नुमाइंदगी करता है।
तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है ऐ दोस्त,
अब तो तन्हाई के लम्हे भी हसीं लगते हैं।
सीमाब अकबराबादी की शोहरत सिर्फ़ हिंदुस्तान तक सीमित नहीं रही। पाकिस्तान में भी उनकी अदबी ख़िदमात को ख़ूब सराहा गया और उनके नाम से सीमाब अकादमी की स्थापना की गई। यह उनके इल्मी और अदबी असर का सबूत है।
आज भी सीमाब अकबराबादी का नाम उर्दू अदब के उन बुलंद सितारों में शामिल है, जिन्होंने अपनी शायरी, तस्नीफ़ात, तर्जुमों और अदबी रहनुमाई के ज़रिये उर्दू ज़बान को बेशकीमती ख़ज़ाना दिया। उनकी रचनाएं नई नस्ल के लिए सिर्फ़ अदब नहीं, बल्कि इल्म, फ़िक्र और ज़िंदगी को समझने का एक ख़ूबसूरत ज़रिया भी हैं।
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