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शैख़ अब्दुल क़ादिर: तसव्वुफ़, इल्म और इश्क़-ए-हक़ीक़ी के अज़ीम रहबर

इस्लामी तारीख़ और तसव्वुफ़ की दुनिया में शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी का नाम बेहद एहतराम के साथ लिया जाता है। उन्हें “ग़ौस-ए-आज़म”, “पीरान-ए-पीर” और “मुहियुद्दीन” जैसे अलक़ाब से याद किया जाता है। आप सिलसिला-ए-क़ादरिया के बानी और हंबली फ़िक़्ह के बड़े आलिम थे। आपकी ज़िंदगी इल्म, इबादत, तसव्वुफ़ और इंसानियत की ख़िदमत का ऐसा रोशन नमूना है, जो आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए रहनुमाई का ज़रिया बना हुआ है।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी की पैदाइश 17 मार्च 1078 ईस्वी को ईरान के सूबा किर्मानशाह के शहर गीलान में हुई। इसी वजह से उन्हें जिलानी या जीलानी कहा जाता है। आपके वालिद की नस्ल हज़रत इमाम हसन और वालिदा की नस्ल हज़रत इमाम हुसैन से जाकर मिलती है। इस तरह आपका शजरा-ए-नसब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा से जुड़ता है।

बचपन से ही आप बेहद परहेज़गार, संजीदा और इबादत-गुज़ार थे। खेल-कूद और दुनियावी मशग़लों की बजाय आपका दिल इल्म और इबादत में लगता था। यही वजह थी कि कम उम्र में ही लोगों ने आपकी रूहानी कैफ़ियत को महसूस करना शुरू कर दिया।

जब आपकी उम्र 18 साल हुई तो आप बग़दाद तशरीफ़ ले गए, जो उस दौर में इल्म का सबसे बड़ा मरकज़ माना जाता था। वहां आपने फ़िक़्ह, हदीस, तफ़्सीर और दूसरे उलूम की तालीम बड़े-बड़े उस्तादों से हासिल की। शैख़ अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी, शैख़ अबू बक्र बिन मुज़फ़्फ़र और इब्न-ए-अक़ील जैसे नामवर असातिज़ा से आपने इल्म की दौलत पाई। बाद में शैख़ अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी से ही आपको बैअत और ख़िलाफ़त भी हासिल हुई।

इल्म की तकमील के बाद शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी ने दुनियावी आराम छोड़कर इराक़ के जंगलों और सहराओं में करीब 25 साल तक सख़्त मुजाहदा, इबादत और रियाज़त की। यह दौर उनकी रूहानी तरबियत का सबसे अहम हिस्सा था। इसी मुजाहदे ने उन्हें तसव्वुफ़ की बुलंद मंज़िलों तक पहुंचाया।

सन 1127 ईस्वी में आप दोबारा बग़दाद लौटे और दर्स-ओ-तदरीस का सिलसिला शुरू किया। आपकी तक़रीरों में इल्म के साथ अख़लाक़, मोहब्बत, तौबा और अल्लाह की याद का ऐसा असर होता था कि हज़ारों लोग आपकी महफ़िलों में शामिल होने लगे। बहुत से लोग आपकी सोहबत में आकर अपनी ज़िंदगी बदलने लगे और तसव्वुफ़ की राह पर चल पड़े।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी ने सिर्फ़ इराक़ तक ही अपनी दावत सीमित नहीं रखी, बल्कि अपने ख़ुलफ़ा और मुरीदीन को दुनिया के अलग-अलग इलाक़ों में भेजा। रिवायतों के मुताबिक़ आप ख़ुद भी कई सफ़र पर निकले और बर्रे-सग़ीर तक तशरीफ़ लाए। कहा जाता है कि आपने मुल्तान में भी कुछ वक़्त क़याम किया, जहां आपकी तालीमात का गहरा असर पड़ा।

आपने कई अहम किताबें भी तहरीर कीं, जिनमें “अल-फ़त्हुर्रब्बानी”, “फ़ुतूहुल-ग़ैब”, “जिला-उल-ख़ातिर” और “विर्दुश्शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी” जैसी किताबें आज भी तसव्वुफ़ की बुनियादी कुतुब मानी जाती हैं। इन तहरीरों में ख़ालिस इश्क़-ए-इलाही, तज़किया-ए-नफ़्स, सब्र, शुक्र और इंसानियत का पैग़ाम मिलता है।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी “मुही” तख़ल्लुस से फ़ारसी शायरी भी करते थे। उनका कलाम इश्क़-ए-हक़ीक़ी और रूहानी कैफ़ियत से भरपूर है। उनके अशआर में अल्लाह की मोहब्बत, बंदगी और फ़ना फ़िल्लाह का जज़्बा साफ़ नज़र आता है।

गर नकीर आयद-ओ-पुर्सद कि बगो रब्ब-ए-तू कीस्त
गोयम आं कस कि रुबूद ईं दिल-ए-दीवाना-ए-मा।

यानी अगर क़ब्र में मुनकर-नकीर मुझसे पूछें कि तेरा रब कौन है, तो मैं कहूंगा—वही जिसने मेरे दीवाने दिल को अपनी मोहब्बत में गिरफ़्तार कर लिया।

इसी तरह उनका एक और शेर इश्क़-ए-इलाही की गहराई को बयान करता है।

न-दानम गरचे आं दीद: कि बीनम दर जमाल-ए-तू
नयम नौमीद चूं उम्रम गुज़श्त अंदर ख़याल-ए-तू।

यानी मेरे पास वह नज़र नहीं जिससे तेरे जलवे को देख सकूं, लेकिन मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं कि मेरी सारी उम्र तेरे ख़याल में गुज़र गई।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी की तालीमात का ख़ुलासा उनके इस ख़ूबसूरत पैग़ाम में मिलता है।

“उसे देखो, जो तुम्हें देखता है। उससे मोहब्बत करो, जो तुमसे मोहब्बत करता है। उसकी सुनो, जो तुम्हारी सुनता है। अपना हाथ उसे दो, जो तुम्हारा हाथ थामने के लिए हमेशा तैयार है।”

यह पैग़ाम इंसान को अपने रब से सच्चा रिश्ता जोड़ने और उसकी मोहब्बत में ज़िंदगी गुज़ारने की दावत देता है।

8 रबीउल-अव्वल 561 हिजरी (1166 ईस्वी) को 89 साल की उम्र में आपका इंतिक़ाल हुआ। आपकी तदफ़ीन बग़दाद में आपके मदरसे के अहाते में हुई, जहां आज भी दुनिया भर से लाखों अकीदतमंद हाज़िरी देते हैं।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी की ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि इल्म, अख़लाक़, इबादत, ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ और इश्क़-ए-इलाही ही इंसान को असल कामयाबी और रूहानी बुलंदी तक पहुंचाते हैं। उनके अफ़कार और तालीमात आज भी तसव्वुफ़ की दुनिया में एक रोशन चराग़ की तरह लोगों की रहनुमाई कर रहे हैं।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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