‘कलम’ और ‘कारी’ यानी कलम से की गई कारीगरी। जी हां, कलमकारी (Kalamkari) वो प्राचीन भारतीय फ़न है जिसमें कपड़े पर कहानियां लिखी और रंगी जाती हैं। मिथकीय चित्र, मंदिरों के फूल-पत्ते, परिंदे और बेलें। सब कुछ क़ुदरती रंगों में, ज़मीन से जुड़े रंगों में। आंध्र प्रदेश में करीब 3,000 साल पहले जन्मा ये फ़न आज भी ज़िंदा है। एक तरफ़ मेहनत से बनी हस्तकला के रूप में, दूसरी तरफ़ साड़ियों पर छपे प्यारे प्रिंट्स के रूप में।

दो स्कूल, एक फ़न
श्रीकालहस्ती स्टाइल : ये फ्रीहैंड स्कूल है। कारीगर बांस की कलम को खमीर उठे गुड़-लोहे की स्याही में डुबोकर सीधे कपड़े पर चित्र बनाते हैं, फिर रंग भरते हैं। एक-एक रंग, एक-एक धुलाई। ये मंदिर-कथाओं की परंपरा है, रामायण और महाभारत के दृश्यों से भरी हुई।
मछलीपट्टनम स्टाइल : ये ब्लॉक स्कूल है। नक़्क़ाशीदार लकड़ी के ठप्पों से आउटलाइन छपती है, रंग ब्रश से भरे जाते हैं। यही वो अंदाज़ था जिसे फ़ारसी और मुग़ल व्यापारी दुनिया भर में ले गए। कीमती ‘चिंट्ज़’ के नाम से।
इतनी मेहनत क्यों? 23 स्टेप्स का सफ़र
असली हाथ की कलमकारी एक धीमी केमिस्ट्री है। कपड़े को मायरोबालन और दूध में तैयार किया जाता है ताकि रंग टिकें। फिर कलम से आउटलाइन, एलम मॉर्डेंट, मैडर में डुबकी से लाल, इंडिगो से नीला और हर स्टेज के बीच धूप में सुखाना। सादे कपड़े से तैयार पीस तक 23 तक स्टेप्स होते हैं। यही वजह है कि असली हाथ की कलमकारी कलेक्टर कीमतें मांगती है, और यही वजह है कि प्रिंटेड कलमकारी वजूद में आई।

मोटिफ़्स पढ़ना सीखिए
- मिथकीय पैनल: देवता, रथ और महाकाव्य :- श्रीकालहस्ती काम की पहचान।
- ट्री ऑफ़ लाइफ़: फूलों और परिंदों से भरा पेड़:- मछलीपट्टनम का क्लासिक सेंटर प्वाइंट।
- पिछवाई साथी: कमल के तालाब, गायें और कृष्ण :- मंदिर-कला परिवार के रिश्तेदार, अब साड़ी के पल्लू पर।
- मिट्टी का पैलेट: मैडर लाल, लोहा काला, इंडिगो, सरसों, क्रीम :- अगर रंग फुसफुसाते हैं, चिल्लाते नहीं, तो समझिए कलमकारी अपनी ज़ुबान बोल रही है।
आज की साड़ियों पर कलमकारी
इस फ़न की दूसरी ज़िंदगी प्रिंट है। कलमकारी की ज़ुबान आधुनिक बेस पर दोबारा बनाई जाती है। डोला सिल्क, सॉफ़्ट सिल्क, मल कॉटन और कोटा। यानी विरासत का लुक, रोज़मर्रा के वज़न और दाम में। इसी तरह 3,000 साल पुराना फ़न ऑफ़िस पहुंचता है, त्योहारों में, और नौजवानों की अलमारी में। 970+ कलमकारी साड़ियां, ज़्यादातर 750 से 1,500 रुपये सूरत से फैक्ट्री-डायरेक्ट।

जीआई टैग: असलियत की पहचान
2013 में पेडाना-स्टाइल कलमकारी (मछलीपट्टनम स्टाइल) को जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला। ये टैग कलमकारी प्रिंट्स की असलियत,मटीरियल और जड़ों की हिफ़ाज़त करता है। ताकि ये फ़न असली कारीगरों के हाथ में रहे, जो इसकी सांस्कृतिक पहचान को सहेजे हुए हैं।
हर ब्रशस्ट्रोक में हमारे भारतीय चित्रकारों से सीखने को बहुत कुछ है। कलमकारी सिर्फ़ कपड़ा नहीं। ये conscious fashion है, सांस्कृतिक कहानी को सलाम है, और वो टाइमलेस ग्रेस है जो हर पहनने वाले को कहानी का हिस्सा बना देती है।
ये भी पढ़ें- ज़रदोज़ी: जब सुनहरे तारों की कढ़ाई ने लखनऊ की तहज़ीब को लाफानी कर दिया!
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते है।



