उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनके अशआर सिर्फ़ मोहब्बत और हुस्न की बातें नहीं करते, बल्कि समाज, इंसानी रिश्तों, तन्हाई, ग़रीबी और बदलती हुई ज़िंदगी की तस्वीर भी सामने रखते हैं। असलम कोलसरी ऐसे ही संवेदनशील शायर थे। उनकी शायरी में एक तरफ़ मोहब्बत की नर्मी है, तो दूसरी तरफ़ ज़िंदगी के कड़वे तजुर्बों का दर्द भी महसूस होता है।
असलम कोलसरी की पैदाइश 1 अगस्त 1946 को जामर, ज़िला ओकारा, पाकिस्तान में हुई। उनका असल नाम और साहित्यिक पहचान असलम कोलसरी के नाम से ही मशहूर हुई। उन्होंने अपनी ज़िंदगी की शुरुआत एक लैबोरेटरी सुपरवाइज़र के तौर पर की। बाद में वे लाहौर चले गए, जहां उन्होंने मशहूर अख़बार ‘मशरिक़’ में काम किया। पत्रकारिता से जुड़े रहने की वजह से उन्हें समाज और आम लोगों की ज़िंदगी को क़रीब से देखने का मौक़ा मिला।
इसके बाद असलम कोलसरी ने उर्दू साइंस बोर्ड में रिसर्च ऑफ़िसर के तौर पर काम किया और आगे चलकर डिप्टी डायरेक्टर के पद तक पहुंचे। यानी उनका रिश्ता सिर्फ़ शायरी से नहीं था, बल्कि इल्म, रिसर्च, पत्रकारिता और अदब कई मैदानों से रहा।
उनकी साहित्यिक पहचान का सबसे अहम हिस्सा उनकी शायरी है। उन्होंने कई कविता-संग्रह लिखे, जिनमें ‘काश’, ‘नींद’, ‘बरसात’, ‘वीरान’, ‘जीवन’, ‘कैफ़’ और ‘पंछी’ जैसे संग्रह शामिल हैं। इन किताबों के नाम से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनके कलाम में ज़िंदगी के अलग-अलग रंग, मौसम, तन्हाई और इंसानी जज़्बात किस तरह मौजूद रहे होंगे।
असलम कोलसरी ने बच्चों के लिए भी कहानियां लिखीं। ‘खंडहर में चिराग़’, ‘ज़ख़्मी गुलाब’, ‘अनौखे शिकारी’ और ‘चांद के उस पार’ उनकी लोकप्रिय बाल कहानियों में गिनी जाती हैं। इससे उनकी रचनात्मक दुनिया की विविधता का पता चलता है। वे सिर्फ़ संजीदा और दर्द भरी शायरी तक सीमित नहीं थे, बल्कि बच्चों के लिए भी दिलचस्प और कल्पनाशील साहित्य लिखते थे।
उनकी शायरी में निजी दर्द और सामाजिक हालात अक्सर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
“यार को दीदा-ए-ख़ूं-बार से ओझल कर के
मुझ को हालात ने मारा है मुकम्मल कर के।”
इसमें जुदाई और हालात की मजबूरी का दर्द साफ़ महसूस होता है। शायर कहता है कि उसने अपने महबूब को अपनी ख़ून-आलूदा आंखों से दूर होते देखा और हालात ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। यहां मोहब्बत का दर्द सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ज़िंदगी की मजबूरियों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
असलम कोलसरी की शायरी में समाज की तकलीफ़ों की तस्वीर भी बहुत असरदार अंदाज़ में आती है।
“बिखरे बिखरे बाल और सूरत खोई खोई
मन घायल करती हैं आंखें रोई रोई।”
इसमें एक दुखी और परेशान इंसान की तस्वीर सामने आती है। बिखरे बाल, उदास चेहरा और रोती हुई आंखें ये सब मिलकर उस दर्द को बयान करते हैं जिसे शब्दों में कहना मुश्किल होता है।
“मलबे के नीचे से निकला मां का लाशा
और मां की गोदी में बच्ची सोई सोई।”
इसमें किसी हादसे या तबाही के बाद का वह मंज़र सामने आता है जिसे देखकर दिल दहल जाता है। मां की मौत और उसकी गोद में सोई हुई बच्ची की तस्वीर के ज़रिए शायर ने इंसानी त्रासदी को बेहद सादा लेकिन असरदार अंदाज़ में पेश किया है। यहां शायरी सिर्फ़ शायरी नहीं रहती, बल्कि समाज के दर्द की गवाही बन जाती है।
असलम कोलसरी आम इंसान की परेशानियों को भी अपनी शायरी में जगह देते हैं।
“शहर में आ कर पढ़ने वाले भूल गए
किस की मां ने कितना ज़ेवर बेचा था।”
इसमें मां की कुर्बानी, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की आर्थिक मुश्किलों की पूरी कहानी समाई हुई है। बेहतर भविष्य के लिए मां अपने ज़ेवर तक बेच देती है, लेकिन बड़े होकर वही बच्चे कभी-कभी उन कुर्बानियों को भूल जाते हैं। असलम इस भूल को बहुत सादगी से सामने रखते हैं।
उनकी शायरी में तन्हाई और अकेलेपन का रंग भी गहरा है।
“ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूं ‘असलम’
अपने दरवाज़े को बाहर से मुक़फ़्फ़ल कर के।”
ईद जैसे ख़ुशी के दिन कमरे में अकेले पड़े रहना और दरवाज़े को बाहर से बंद कर देना—यह तस्वीर सिर्फ़ अकेलेपन की नहीं, बल्कि भीतर के टूटे हुए इंसान की भी है। शायर ने एक छोटे से मंज़र के ज़रिए गहरी उदासी को बयान किया है।
मोहब्बत के रिश्ते और बिछड़ने का दर्द भी उनके कलाम में बार-बार सामने आता है।
“हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं
बिछड़ के हम ने कई रात दिन गुज़ारे हैं।”
यहां मोहब्बत में जीत और हार की परिभाषा ही बदल जाती है। दोनों अगर बिछड़ गए हैं तो जीत किसकी हुई? शायर के लिए असल जीत साथ रहने में थी, लेकिन जुदाई ने दोनों को ही हरा दिया।
उनका एक बेहद ख़ूबसूरत और यादगार शेर है।
“सिर्फ़ मेरे लिए नहीं रहना
तुम मिरे बाद भी हसीं रहना।”
इसमें मोहब्बत का एक अलग ही रूप दिखाई देता है। सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ अपने लिए किसी को चाहने का नाम नहीं, बल्कि महबूब की ख़ुशी की दुआ करने का नाम भी है। शायर कहता है कि मेरे बाद भी तुम ख़ुश और ख़ूबसूरत ज़िंदगी जीना।
असलम कोलसरी की यही ख़ासियत उन्हें अलग बनाती है। उनकी शायरी में निजी जज़्बात के साथ समाज का दर्द भी है। वे मां की कुर्बानी को देखते हैं, अकेलेपन को महसूस करते हैं, मोहब्बत में बिछड़ने का दर्द लिखते हैं और तबाही के मंज़रों को भी अपनी क़लम से दर्ज करते हैं।
7 नवंबर 2016 को लाहौर में असलम कोलसरी का इंतिक़ाल हुआ। लेकिन उनके अशआर आज भी उर्दू अदब के क़द्रदानों के बीच ज़िंदा हैं। उनकी शायरी हमें मोहब्बत की नर्मी, रिश्तों की अहमियत, मां की कुर्बानी और इंसानी दर्द को समझने का मौक़ा देती है।
असलम कोलसरी की क़लम की सबसे बड़ी ख़ूबी यही थी कि उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय छोटी-छोटी तस्वीरों में बड़ी सच्चाइयां बयान कीं। उनके अशआर पढ़ते हुए कभी आंखें नम होती हैं, कभी दिल में मोहब्बत जागती है और कभी समाज के उन चेहरों पर नज़र जाती है जिन्हें हम रोज़ देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं। यही उनकी शायरी की असली ताक़त और उनकी अदबी विरासत है।
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