हिंदुस्तान की तारीख़ में कुछ ऐसी इल्मी शख़्सियतें गुज़री हैं जिन्होंने सिर्फ़ अपने दौर को नहीं, बल्कि आने वाली कई नस्लों की सोच और इल्मी रवायत को भी मुत्तासिर किया। शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी उन्हीं महान विद्वानों में शामिल हैं। वह आलिम, मुहद्दिस, मुफ़स्सिर, फ़क़ीह, सूफ़ी और इस्लामी चिंतक होने के साथ-साथ समाज की इस्लाह और बौद्धिक बेदारी के बड़े पैरोकार थे। उन्हें उनके अनुयायी “मुजद्दिद-ए-मिल्लत” और “हकीमुल उम्मत” जैसे अलक़ाब से याद करते हैं।
शाह वलीउल्लाह का असल नाम क़ुत्बुद्दीन अहमद इब्न अब्दुर्रहीम था। उनकी पैदाइश फ़रवरी 1703 में मौज़ा फुलत, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर में हुयी। उनके वालिद शाह अब्दुर्रहीम अपने दौर के बड़े आलिम और सूफ़ी थे। वह फ़तावा-ए-आलमगीरी की तैयारी से भी जुड़े रहे और उन्होंने दिल्ली में मदरसा रहिमिया की बुनियाद रखी। शाह वलीउल्लाह की शुरुआती तालीम अपने वालिद की निगरानी में ही हुई।
कम उम्र में ही उन्होंने क़ुरआन हिफ़्ज़ कर लिया था। इसके बाद अरबी, फ़ारसी, हदीस, फ़िक़्ह, मंतिक़, तफ़्सीर और दूसरे उलूम की तालीम हासिल की। उनकी इल्मी क़ाबिलियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि छोटी उम्र में ही उन्होंने मदरसे में तदरीस का काम संभाल लिया था। वालिद के इंतिक़ाल के बाद करीब 17 साल की उम्र में उन्होंने मदरसा रहिमिया की ज़िम्मेदारी संभाली और कई साल तक वहां तलबा को दीन और दूसरे उलूम की तालीम दी।
शाह वलीउल्लाह की ज़िंदगी का एक अहम मोड़ उस वक़्त आया जब उन्होंने मक्का और मदीना का सफ़र किया। वह 1732 के आसपास हज के लिए हिजाज़ गए और वहां कई बड़े उलमा से इल्म हासिल किया। हिंदुस्तान वापस आने के बाद उन्होंने क़ुरआन, हदीस और इस्लामी फ़िक्र को आम लोगों तक आसान अंदाज़ में पहुंचाने की कोशिश की।
उनकी सबसे अहम ख़िदमात में क़ुरआन का फ़ारसी तर्जुमा भी शामिल है। उस दौर में आम लोगों के लिए क़ुरआन के मआनी तक सीधी रसाई आसान नहीं थी। शाह वलीउल्लाह ने फ़ारसी में तर्जुमा करके क़ुरआन की समझ को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की राह आसान की। उनकी मशहूर किताब ‘फ़त्हुर्रहमान’ इसी सिलसिले की अहम कड़ी मानी जाती है।
क़ुरआनी उलूम और तफ़्सीर के उसूल पर उनकी किताब ‘अल-फ़ौज़ुल-कबीर फ़ी उसूल-ए-तफ़्सीर’ भी बहुत अहम मानी जाती है। इसमें उन्होंने क़ुरआन को समझने के लिए बुनियादी उसूल और तरीक़े बयान किए। उनका ज़ोर इस बात पर था कि क़ुरआन को समझते हुए उसके असल पैग़ाम, संदर्भ और सुन्नत को सामने रखा जाए।
हदीस और फ़िक़्ह के मैदान में भी शाह वलीउल्लाह ने अहम काम किया। वह सिर्फ़ किसी एक फ़िक़्ही राय तक महदूद रहने के बजाय अलग-अलग फ़िक़्ही मसलकों के बीच तालमेल और समझ की बात करते थे। उनका मानना था कि क़ुरआन और सुन्नत की बुनियादी तालीमात को सामने रखते हुए फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ को समझना चाहिए। वह अंधी तक़लीद के बजाय इल्मी तहक़ीक़ और इज्तिहाद की ज़रूरत पर ज़ोर देते थे।
उनकी सबसे मशहूर किताबों में ‘हुज्जतुल्लाह अल-बालिग़ा’ का नाम ख़ास तौर से लिया जाता है। इस किताब में उन्होंने दीन, इंसानी समाज, नैतिकता और इस्लामी अहकाम के पीछे मौजूद हिकमत को समझाने की कोशिश की। उनकी सोच में दीन सिर्फ़ इबादत तक महदूद नहीं था, बल्कि इंसान की व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी से भी उसका गहरा ताल्लुक़ था।
शाह वलीउल्लाह ने अपने दौर के सामाजिक और सियासी हालात पर भी गहरी नज़र रखी। वह हिंदुस्तानी मुसलमान समाज में पैदा हो रही कमज़ोरियों, आपसी इख़्तिलाफ़, इल्मी गिरावट और सामाजिक समस्याओं को लेकर फ़िक्रमंद थे। उनकी कोशिश थी कि लोग क़ुरआन और सुन्नत की बुनियादी तालीमात की तरफ़ लौटें और अपने समाज की इस्लाह के लिए इल्म और अमल दोनों को अहमियत दें।
उनकी इल्मी विरासत सिर्फ़ उनकी अपनी किताबों तक महदूद नहीं रही। उनके बेटों ने भी इल्म और तदरीस के मैदान में अहम मुक़ाम हासिल किया। उनके चार बेटे—शाह अब्दुल अज़ीज़, शाह रफ़ीउद्दीन, शाह अब्दुल क़ादिर और शाह अब्दुल ग़नी अपने दौर के जाने-माने विद्वान बने। इस तरह शाह वलीउल्लाह की इल्मी रवायत आगे की नस्लों तक पहुंचती रही।
उनकी शख़्सियत का एक अहम पहलू यह भी था कि उन्होंने हदीस, फ़िक़्ह, तफ़्सीर और तसव्वुफ़ को एक-दूसरे से अलग करके देखने के बजाय उनके बीच संतुलन पैदा करने की कोशिश की। वह चाहते थे कि दीन की समझ सिर्फ़ किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि इंसान की ज़िंदगी और समाज में भी उसका असर दिखाई दे।
शाह वलीउल्लाह का इंतिक़ाल 20 अगस्त 1762 ईस्वी, 29 मुहर्रम 1176 हिजरी को दिल्ली में हुआ। उनकी उम्र उस वक़्त करीब 59 साल थी। उन्हें दिल्ली के मेहदियान, क़ब्रिस्तान-ए-मुहद्दिसीन में उनके वालिद शाह अब्दुर्रहीम के पास दफ़्न किया गया।
शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी की ज़िंदगी को अगर एक जुमले में समेटा जाए तो वह इल्म, इस्लाह और फ़िक्री बेदारी का सफ़र थी। उन्होंने क़ुरआन और हदीस की तालीम को आम करने, फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ को समझने और अपने समाज की इस्लाह की कोशिश की। यही वजह है कि सदियों बाद भी उनका नाम हिंदुस्तान की इस्लामी इल्मी और फ़िक्री रवायत में बड़ी अहमियत के साथ लिया जाता है।
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