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अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां: शायरी में वतनपरस्ती और ज़िंदगी में शहादत

“कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।”

ये अल्फ़ाज़ उस जांबाज़ क्रांतिकारी के हैं, जिसने महज़ 27 साल की उम्र में मुल्क की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां न सिर्फ़ हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के बहादुर सिपाही थे, बल्कि एक बेहतरीन उर्दू शायर भी थे। ‘हसरत’ तख़ल्लुस से लिखने वाले अशफ़ाक़ की शायरी में वतन से मोहब्बत, आज़ादी की तड़प और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बग़ावत साफ़ दिखाई देती है।

22 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर में पैदा हुए अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां बचपन से ही तेज़-तर्रार और संवेदनशील मिज़ाज के थे। 1918 में मैनपुरी साज़िश से जुड़े घटनाक्रम ने उनके ज़ेहन पर गहरा असर डाला और धीरे-धीरे वे क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ़ बढ़ने लगे।

बिस्मिल से मुलाक़ात और ऐतिहासिक दोस्ती

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां की मुलाक़ात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई तो दोनों के बीच विचारों और मक़सद की एक गहरी समानता दिखाई दी। शुरुआत में बिस्मिल उन्हें क्रांतिकारी संगठन में शामिल करने को लेकर कुछ हिचकिचाए, लेकिन जल्द ही दोनों की दोस्ती ऐसी मिसाल बनी, जिसे आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा वतनपरस्ती की शानदार तस्वीर के तौर पर याद किया जाता है।

दोनों शायरी के भी शौक़ीन थे। बिस्मिल हिंदी और उर्दू में लिखते थे, जबकि अशफ़ाक़ ‘हसरत’ के नाम से उर्दू शायरी करते थे। उनके लिए मज़हब अलग हो सकता था, लेकिन वतन एक था और आज़ादी का मक़सद भी एक था।

काकोरी कांड और अंग्रेज़ी हुकूमत की तलाश

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे। 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन में उनकी अहम भूमिका रही।

काकोरी कांड के बाद अंग्रेज़ी सरकार ने क्रांतिकारियों की धर-पकड़ तेज़ कर दी। शाहजहांपुर पुलिस भी अशफ़ाक़ के घर पहुंची, लेकिन उन्हें पहले ही ख़बर मिल चुकी थी। वे घर से निकलकर शहर के बाहर गन्ने के खेतों में जा छिपे। बताया जाता है कि वे कई दिनों तक वहीं छिपे रहे और रात के वक़्त उनके लिए खाना पहुंचाया जाता था।

इसके बाद उन्होंने शाहजहांपुर छोड़ दिया और अलग-अलग शहरों में अपने साथियों से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत का शिकंजा लगातार कसता जा रहा था।

गिरफ्तारी के बाद भी नहीं टूटा हौसला

आख़िरकार अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां अंग्रेज़ों के हाथ गिरफ़्तार हो गए। मगर गिरफ़्तारी के बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा।

अंग्रेज़ सरकार चाहती थी कि वे सरकारी गवाह बन जाएं और क्रांतिकारी संगठन के बारे में जानकारी दें। उन्हें लालच दिया गया, डराया गया और यहां तक कि मज़हब का हवाला देकर बिस्मिल और दूसरे साथियों से अलग होने के लिए उकसाया गया।

लेकिन अशफ़ाक़ का जवाब साफ़ था। उनका मानना था कि अगर वे अकेले मुसलमान हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। वे अपने साथियों के साथ बेवफ़ाई करके अपनी जान बचाने के लिए तैयार नहीं थे।

“देश पहले, धर्म बाद में”

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां की शख़्सियत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यही थी कि उनके लिए हिंदुस्तान सबसे पहले था।

जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने राम प्रसाद बिस्मिल के हिंदू होने का हवाला देकर अशफ़ाक़ को उनसे अलग करने की कोशिश की, तो उन्होंने इसका पुरज़ोर विरोध किया। वे विदेशी हुकूमत के बजाय हिंदुस्तानियों की अपनी हुकूमत को बेहतर समझते थे।

उनकी दोस्ती और विचार उस दौर में एक ऐसा पैग़ाम थे, जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत महसूस होती है आज़ादी की लड़ाई किसी एक मज़हब की नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान की लड़ाई थी।

शायरी में भी गूंजता था इंक़लाब

अशफ़ाक़ की शायरी उनके दिल की आवाज़ थी। उनके अल्फ़ाज़ में जोश भी था, हौसला भी और वतन पर मिट जाने का जज़्बा भी।

“हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी ज़ुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।”

और फिर उनका यह ऐलान—

“दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूं से ही हम शहीदों की फ़ौज बना देंगे।”

इन अशआर में उस नौजवान का हौसला दिखाई देता है, जिसे मौत का ख़ौफ़ नहीं था। वह जानता था कि उसकी शहादत आने वाली नस्लों के लिए आज़ादी की मशाल बन सकती है।

27 साल की उम्र में शहादत

काकोरी कांड के मुक़दमे के बाद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां को फांसी की सज़ा सुनाई गई। 19 दिसंबर 1927 को फैज़ाबाद जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 27 साल थी।

फांसी से पहले भी उनके लहजे में शिकवा कम और वतन के लिए फ़ख़्र ज़्यादा था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी को देश की आज़ादी के नाम कर दिया था।

उनकी शहादत को याद करते हुए ये पंक्तियां आज भी दिल में उतरती हैं।

“शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा।”

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां की कहानी सिर्फ़ एक क्रांतिकारी की कहानी नहीं है। यह वफ़ादारी, दोस्ती, मज़हबी एकता, हौसले और वतनपरस्ती की कहानी है।

उन्होंने अपनी शायरी से नौजवानों में जोश पैदा किया और अपनी ज़िंदगी से यह साबित कर दिया कि जब मक़सद मुल्क की आज़ादी हो, तो उम्र छोटी हो सकती है, मगर हौसला बहुत बड़ा होना चाहिए।

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां आज भी हिंदुस्तान की उस साझा तहज़ीब और एकता की निशानी हैं, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां जैसे दो जांबाज़ एक ही वतन के लिए, एक ही मक़सद के साथ, कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई देते हैं।

ये भी पढ़ें: 1904 से 1947 तक: ऐसे बना भारत का तिरंगा, जो आज हमारी पहचान है
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