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डेढ़ सौ बरस की साझी विरासत: अल्मोड़े का दशहरा

अल्मोड़ा का दशहरा उन विरल सांस्कृतिक आयोजनों में है, जिनमें अतीत किसी संग्रहालय की वस्तु की तरह सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि वर्तमान के जीवन में लगातार अपनी जगह बनाता रहता है। यहां दशहरा केवल राम और रावण की कथा का वार्षिक पुनरावर्तन नहीं है। यह नगर की कलात्मक अभिरुचि, मोहल्लों की सामूहिकता और विभिन्न समुदायों के साझे श्रम से निर्मित एक ऐसी परंपरा है, जो बदलते समय के साथ अपना रूप भी बदलती रही है।

अल्मोड़ा में रामलीला की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हो चुकी थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 1860 से यहां रामलीला का मंचन होता रहा है। आगे चलकर यह परंपरा नगर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में उदय शंकर ने अल्मोड़ा में अपना सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किया। भारतीय नृत्य को नए रूप में प्रस्तुत करने की उनकी महत्वाकांक्षा ने इस छोटे पहाड़ी नगर को देश के व्यापक कला-जगत से जोड़ा।

उनके केंद्र में जोहरा सहगल, गुरु दत्त और रविशंकर जैसे नामों का जुड़ना इस बात का संकेत था कि अल्मोड़ा की सांस्कृतिक दुनिया स्थानीय सीमाओं में बंद नहीं थी। इसी दौर में रामलीला के कलाकारों और आधुनिक रंगमंच तथा नृत्य से जुड़े लोगों के बीच संवाद के प्रसंग भी सामने आते हैं।

Photo: सारांश मंगोली

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का असर आज भी नगर की सांस्कृतिक गतिविधियों में देखा जा सकता है। हालांकि दशहरे की असली ऊर्जा उन लोगों से आती है, जिनके नाम शायद ही कभी बड़े आयोजनों की सुर्खियों में आते हों। कलाकारों के अभिनय से लेकर संगीत, वेशभूषा, मेकअप और मंच-सज्जा तक, इस आयोजन में अनेक हाथ लगते हैं। हुक्का क्लब जैसी संस्थाएं रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ उसके प्रशिक्षण और दस्तावेजीकरण का काम भी करती रही हैं। क्लब से जुड़े वरिष्ठ लोगों की स्मृतियों में पुराने मंच, कलाकार और प्रस्तुतियां आज भी जीवित हैं। इस तरह परंपरा केवल प्रदर्शन नहीं, अनुभवों के हस्तांतरण की प्रक्रिया भी बनती है।

अल्मोड़ा के दशहरे की एक विशिष्ट पहचान रावण के साथ उसके परिवार और दूसरे राक्षस पात्रों के पुतलों का निर्माण है। उत्तर भारत के अनेक स्थानों पर दशहरा मुख्यतः रावण-दहन के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां मोहल्ले अलग-अलग पात्रों के पुतले तैयार करते हैं। कुंभकर्ण, मेघनाद, ताड़का, मारीच, सुबाहु, प्रहस्त और अन्य पात्रों के विशाल रूप इस आयोजन को अलग पहचान देते हैं।

1936 के एक स्थानीय प्रकाशन में रावण के पुतले का चित्र मिलने का उल्लेख है। 1974 में रावण के साथ मेघनाद का पुतला बनाया गया और अगले वर्ष सुबाहु तथा ताड़का के पुतले भी इस परंपरा में शामिल हुए। 2019 में इन पुतलों की संख्या इकतीस तक पहुंच गई थी।

इस कला का इतिहास केवल पात्रों की संख्या बढ़ने का इतिहास नहीं है; यह तकनीक और कौशल में आए बदलावों की कहानी भी है। पहले धान की पराली से बने पुतले भारी होते थे और उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना कठिन था। 1980 के आसपास बांस की खपच्चियों और लोहे के तार से हल्के ढांचे तैयार करने की तकनीक अपनाई गई। बाद में अखबारी कागज और पेपर मैशी का इस्तेमाल बढ़ा। इन बदलावों ने पुतलों को अधिक सुविधाजनक बनाया, जबकि उनकी विशालता और दृश्य प्रभाव बनाए रखने की कोशिश जारी रही। स्थानीय कलाकारों के कौशल ने इस कला को लगातार विकसित किया है।

Photo: सारांश मंगोली

इस पूरी प्रक्रिया में सांप्रदायिक साझेदारी का महत्व विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मुस्लिम संगीतकारों ने रामलीला की तालीम में योगदान दिया; मुस्लिम कारीगर पुतलों की सजावट और रंगाई में शामिल रहे हैं। मेकअप से लेकर मंचीय भूमिकाओं तक उनकी भागीदारी के अनेक उदाहरण स्थानीय स्मृतियों में मौजूद हैं। दशहरे के अवसर पर दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण और श्रृंगार में भी विभिन्न समुदायों के कारीगर मिलकर काम करते हैं। यह सद्भाव किसी नारे से नहीं, रोजमर्रा के सहयोग और साझा कलात्मक जिम्मेदारी से निर्मित हुआ है।

दशहरे के दिन जब विभिन्न मोहल्लों के पुतले ढोल, दमाऊ और रणसिंघों की ध्वनि के बीच पुरानी बाजार की संकरी गलियों से गुजरते हैं, तो पूरा नगर एक विशाल रंगमंच में बदल जाता है। पुरानी इमारतों की खिड़कियों और छज्जों पर खड़े दर्शक इस दृश्य का हिस्सा बनते हैं। कई घंटों तक चलने वाला जुलूस अंततः मैदान में पहुंचता है, जहां पुतलों का दहन होता है।

अल्मोड़ा का दशहरा इसीलिए महत्वपूर्ण है कि यहां इतिहास और वर्तमान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पुरानी परंपराएं नई तकनीकों, बदलती पीढ़ियों और सामूहिक भागीदारी के सहारे जीवित हैं। पुतले हर साल जल जाते हैं, लेकिन उन्हें बनाने की कला, उन्हें सजाने वाले हाथ और उन्हें देखने के लिए उमड़ता शहर अगली बार फिर इस परंपरा को जन्म देते हैं। शायद किसी जीवित संस्कृति की पहचान भी यही है. वह स्मृति को बचाती है, मगर उसे स्थिर नहीं होने देती।

ये भी पढ़ें: नाहन में दशकों से मुस्लिम कारीगरों की मेहनत से सजता आ रहा दशहरा 

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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