भारत में रेल की पटरियां सिर्फ़ सफ़र का ज़रिया नहीं हैं। ये पटरियां कई जगहों पर उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीती-जागती गवाह हैं, जहां आस्था और इंजीनियरिंग आमने-सामने खड़ी होकर भी एक-दूसरे के लिए रास्ता बनाती हैं। आपको जानकर हैरत होगी कि देश के कई बड़े रेलवे स्टेशनों के ठीक बीचों-बीच या उनके परिसर में ऐसी मशहूर दरगाहें मौजूद हैं, जिनके सामने अंग्रेज़ों को भी घुटने टेकने पड़े और आज भी लाखों ज़ायरीन वहां अपनी मुरादें लेकर पहुंचते हैं। आइए, ऐसी ही कुछ दरगाहों के रहस्य, उनके फैक्ट्स और उनकी ख़ूबसूरत कहानियों पर एक गहरी नज़र डालते हैं।

चारबाग का रहस्य: जहां पटरियां ख़ुद रास्ता बदलती हैं
सबसे पहले बात उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन की। यहां प्लेटफ़ॉर्म नंबर 8 और 9 के बीच, रेल की पटरियों के ठीक बीच में हज़रत सैयद शाह क़ियामुद्दीन की दरगाह है, जिन्हें लोग प्यार से ख़म्मन पीर बाबा कहते हैं। इस दरगाह की उम्र को लेकर अलग-अलग दावे हैं। कुछ रिपोर्ट्स इसे 950 साल पुराना बताती हैं , तो कुछ इसे 900 साल पुराना मानती हैं। ये दरगाह एक से दो एकड़ में फैली है और इसका पूरा नाम शरीफ़ शाह सैयद क़ियामुद्दीन है ।
इस दरगाह की कहानी बड़ी दिलचस्प है। कहा जाता है कि जब अंग्रेज़ यहां रेलवे लाइन बिछा रहे थे, तो जो पटरियां दिन में बिछाई जातीं, वे रात में उखड़ी हुई मिलतीं। ये सिलसिला लगभग एक हफ़्ते तक चला। अंग्रेज़ इंजीनियर परेशान हो गए। तब माना जाता है कि पीर बाबा ने उस इंजीनियर के ख़्वाब में आकर बताया कि यह उनकी आरामगाह है, इसे न छेड़ा जाए। बस, तब से रेलवे को अपनी पटरियां दरगाह के दोनों तरफ़ से मोड़कर बिछानी पड़ीं।

ये दरगाह न सिर्फ़ मुसलमानों बल्कि बड़ी संख्या में हिंदुओं की भी आस्था का केंद्र है। यहां के इमाम मोहम्मद अरशद रज़ा के मुताबिक़, आने वाले ज़ायरीन में 90 फीसदी से ज़्यादा ग़ैर-मुस्लिम होते हैं, जिनमें हिंदू बहुसंख्यक हैं। लोग अपनी मुरादें पूरी होने पर चादर चढ़ाते हैं, रेवड़ियों का भोग लगाते हैं और कुछ तो अपनी लिखी हुई दुआओं की पर्चियां भी दरगाह की जालियों पर बांधने आते हैं। हर जुमेरात को यहां ख़ास भीड़ उमड़ती है और सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक हज़ारों लोग हाज़िरी लगाते हैं।
निज़ामुद्दीन की रूहानी दुनिया
दिल्ली की बात करें तो हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह एक अलग ही रूहानी माहौल समेटे हुए है। ये दरगाह स्टेशन से करीब 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर निज़ामुद्दीन वेस्ट इलाक़े में है। ये सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1238-1325 ईस्वी) की है जो चिश्ती सिलसिले के एक बहुत बड़े संत थे और अजमेर के ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे।

इस दरगाह का इतिहास भी बहुत समृद्ध है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया 1325 में इस दुनिया से रुख़सत हो गये थे। लेकिन मौजूदा इमारत 1562 में फ़रीदून ख़ान नाम के एक रईस ने बनवाई थी। दरगाह परिसर में सिर्फ़ हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार ही नहीं, बल्कि उनके शागिर्द और मशहूर शायर अमीर ख़ुसरो और मुग़ल शहज़ादी जहांआरा बेगम की क़ब्रें भी मौजूद हैं। यहां हर गुरुवार को मग़रिब की नमाज़ के बाद कव्वाली का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से लोग आकर शिरकत करते हैं। ये जगह सिर्फ़ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उस सूफ़ी परंपरा का प्रतीक है जो मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम देती है।
प्रयागराज का लाइन शाह बाबा: जहां मज़ार है, वहीं है पुल का नाम
इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है, वहां के जंक्शन पर भी एक अनोखी मज़ार है। लाइन शाह बाबा की मज़ार प्लेटफ़ॉर्म नंबर 1 के अंदर मौजूद है। इस मज़ार की देखरेख करने वालों के मुताबिक़, ये हज़रत करामत अली (लाइन शाह बाबा) की मज़ार है और ये सैकड़ों साल पुरानी है । इतिहास के पन्नों के मुताबिक, जब अंग्रेज़ यहां रेलवे लाइन बिछा रहे थे, तब ये मज़ार बीच में आ गई थी। कहा जाता है कि जब भी इसे हटाने की कोशिश की गई, वहां की पटरियां अपने आप उखड़ जाती थीं। आज ये मज़ार स्टेशन पर आने-जाने वाले मुसाफ़िरों के लिए एक ऐसी जगह है जहां वे भागदौड़ के बीच भी सुकून की सांस ले सकते हैं।

इस मज़ार की अहमियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रयागराज जंक्शन पर एक पैदल पुल का नाम ही “लाइन शाह बाबा मजार पुल” रख दिया गया है।
पुणे का क़ादरी दरगाह: स्टेशन से पहले का निशान
महाराष्ट्र के पुणे रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर हज़रत सैयद कमलुद्दीन शाह क़ादरी की दरगाह है। ये लगभग 400 साल पुरानी दरगाह है, जो रेलवे स्टेशन के बनने से भी पहले से यहां मौजूद थी। पुणे स्टेशन पर उतरते ही सिर्फ़ कुछ क़दमों की दूरी पर यह मुक़द्दस दरगाह मौजूद है, जो सूफ़ी परंपरा के चाहने वालों के लिए एक ख़ास रूहानी जगह है। ये इस बात का जीता-जागता सबूत है कि इंसान जब विकास की राह पर चलता है, तो वह अपनी आस्थाओं और परंपराओं को भी साथ लेकर चलता है।

ये दरगाहें सिर्फ़ पत्थर और चादरों का ढेर नहीं हैं। ये उस हिंदुस्तानी मिज़ाज की निशानी हैं, जहां रेल की तेज़ रफ़्तार भी आस्था के आगे सर झुकाती है। चाहे लखनऊ का ख़म्मन पीर हो जिसकी ख़ातिर अंग्रेज़ों को पटरियां मोड़नी पड़ीं, या प्रयागराज का लाइन शाह बाबा जिसके नाम पर आज भी स्टेशन का पुल जाना जाता है।
अगली बार जब आप इन स्टेशनों से गुज़रें, तो ज़रा ठहरकर इन दरगाहों को भी सलाम करना, क्योंकि ये हमारी मिली-जुली तहज़ीब की सबसे ख़ूबसूरत मिसालें हैं।
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