मैसूर की गलियों में चंदन की खुशबू और महलों की शान तो सब जानते हैं, लेकिन यहां एक ऐसा खज़ाना भी है जो बहुत कम लोगों की नज़र में आता है-गंजीफ़ा (Ganjifa)। ये सिर्फ़ ताश के पत्ते नहीं, बल्कि हाथ से बने मिनिएचर पेंटिंग्स का एक ऐसा मजमूआ हैं जिसमें खेल की चतुराई और फ़न की नफ़ासत दोनों समाई हैं।

फ़ारस से भारत तक का सफ़र
गंजीफ़ा की जड़ें फ़ारस में हैं। पंद्रहवीं सदी के इतिहासकार इब्न तग़रीबिरदी ने ‘कंजीफ़ा’ नाम के खेल का ज़िक्र किया है। माना जाता है कि यह खेल मुग़लों के साथ हिंदुस्तान पहुंचा — बाबर की 1527 की डायरी और गुलबदन बेगम की ‘हुमायूं-नामा’ तक में इसका उल्लेख मिलता है। वक़्त के साथ इसने भारतीय रंग ओढ़ लिए और कई देसी रूप सामने आए। जैसे अकबर का ईजाद किया ‘गंजपा’, दस रंगों वाला ‘दशावतार गंजीफा’ जिसमें भगवान विष्णु के दस अवतार दिखते हैं, ‘मैसूर चद गंजीफ़ा’, महाराष्ट्र का ‘सावंतवाड़ी गंजीफा’ और ओडिशा का ‘रामायण गंजपा’।

चित्रकारों का हुनर
यूरोप के चौकोर पत्तों के अलग, हिंदुस्तानी गंजीफ़ा की ख़ासियत इसका गोल आकार है। मुग़ल दौर में शाही लोगों के लिए हाथी-दांत और कछुए की खोल से डेक बनते थे, जबकि आम लोग कलफ़ लगे कपड़े, पेपर-माशे या ताड़ के पत्तों से काम चलाते थे। सबसे ज़्यादा मेहनत ‘कोर्ट कार्ड्स’ पर होती थी। जैसे घोड़े पर सवार बादशाह या वज़ीर, जिसके पीछे ख़ूबसूरत मंज़र और पत्ते का स्यूट सिंबल बारीकी से गुंथा होता। आज भी ये कार्ड चित्रकार नाम के हुनरमंद कारीगर हाथ से बनाते और रंगते हैं।

कला का अनमोल नमूना
उभरी हुई नक़्क़ाशी, चमकीले विरोधी रंग, सोने की पत्ती से सजावट गंजीफा के पत्ते देखते ही दिल मोह लेते हैं। 2008 में भारत सरकार ने ‘गंजीफ़ा कार्ड्स ऑफ़ मैसूर’ को भौगोलिक संकेत (GI) का दर्जा देकर इस फ़न को महफ़ूज़ कर दिया। हालांकि आज ये खेल शायद ही खेला जाता है, लेकिन चित्रकार अब भी नए-नए डेक बनाकर इस रिवायत को ज़िंदा रखे हुए हैं।
तो अगली बार मैसूर जाएं, तो चंदन की साबुन के साथ एक गंजीफ़ा डेक भी ज़रूर लाएं। ये सिर्फ़ यादगार नहीं, छह सदियों की कला और तहज़ीब का एक टुकड़ा है जो आप मैसूर से अपने घर ले जा सकते हैं।
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