हर साल दुर्गा पूजा के दौरान जब हम मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के सामने श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, तो हमारी नज़र उस दिव्य चेहरे पर टिकी होती है। लेकिन उन हाथों की कहानी कभी सामने नहीं आती, जिन्होंने मिट्टी, पुआल और रंगों से इस जीवंत प्रतिमा को आकार दिया है। ये कहानी है गुवाहाटी के उन मूर्तिकारों की, जिनकी कला आज संकट में है।
क्या है संकट की असली वजह?
विक्रम पाल, जो 25 सालों से मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं, बताते हैं कि उनकी दुकान 1947 से है। पहले उनके दादा और पिता यह काम करते थे, अब वो इसे आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। कच्चे माल की कीमत बढ़ी है, मेहनत बढ़ी है, समय भी बढ़ा है, लेकिन मुनाफ़ा वही ठहरा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि मेहनताना नहीं बढ़ रहा, जबकि सामान के दाम आसमान छू रहे हैं।

विक्रम बताते हैं कि अब गहनों के डिज़ाइन भी बदल गए हैं। एआई के आने के बाद डिज़ाइन में काफी बदलाव आया है। लोग भगवान की तस्वीरें एआई से बनाकर लाते हैं और उन्हीं के आधार पर प्रतिमा बनवाते हैं। ये बदलाव कला के लिए चुनौती भी है और अवसर भी।
सिर्फ पैसा नहीं, सम्मान की भी कमी
समस्या सिर्फ आर्थिक नहीं है। एक दूसरे मूर्तिकार रतन लाल पाल की शिकायत है कि इस काम में इज़्ज़त नहीं है। कभी-कभी मूर्ति की कीमत 2 लाख रुपये तक होती है, लेकिन लोग बाहर के कारीगरों को दाम देने के लिए तैयार हो जाते हैं, जबकि स्थानीय मूर्तिकारों को कम पैसे मिलते हैं। कभी मिट्टी नहीं मिलती, कभी बांस नहीं मिलता। ऐसे में यह पारंपरिक कला कब तक चलेगी, ये किसी को पता नहीं।

क्या ख़त्म हो जाएगी ये विरासत?
विक्रम पाल साफ कहते हैं कि वो अपने बच्चों को इस काम में नहीं लाएंगे। अगर बच्चे अपनी मर्ज़ी से आना चाहें तो आएं, लेकिन जबरदस्ती नहीं। ये सोच दर्शाती है कि आने वाले सालों में इस पारंपरिक कला को जानने वाले कारीगर मिलना भी मुश्किल हो जाएगा।
क्यों मायने रखती है ये लड़ाई?
यह सिर्फ एक कारोबार का संकट नहीं है। यह उस हुनर का संकट है, जो पीढ़ियों से मिट्टी, पुआल और रंगों के ज़रिए हमारी आस्था और संस्कृति को आकार देता आया है। मूर्ति हर साल नई बनेगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ियों में उन्हें बनाने वाले हाथ भी उतनी संख्या में बचेंगे?

अगर कलाकार नहीं बचेंगे, तो सिर्फ एक पेशा नहीं, हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा भी धीरे-धीरे खो जाएगा। यह समय की मांग है कि हम इन अनाम कलाकारों को सम्मान दें, उनकी कला को पहचानें और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करें। तभी दुर्गा पूजा की वह भव्यता बनी रहेगी, जिसके लिए हम सब एकत्र होते हैं।
स्टोरी: मंज़र आलम
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