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अनवर जलालपुरी: जिन्होंने उर्दू शायरी में गीता के श्लोकों को भी पिरोया

उर्दू अदब की महफ़िल में अनवर जलालपुरी का नाम बड़े अदब और एहतराम से लिया जाता है। अपनी शायरी और अपने काम के ज़रिए उन्होंने लोगों के दिलों में एक ख़ास मक़ाम बनाया। अनवर जलालपुरी भी ऐसे ही शायरों में शामिल थे। उन्होंने अपनी शायरी से ज़िंदगी, इंसानियत और समाज की सच्चाइयों को बयान किया, तो दूसरी तरफ़ उर्दू ज़बान के ज़रिए अलग-अलग मज़हबों और संस्कृतियों के बीच मोहब्बत का पैग़ाम भी दिया। उन्हें ख़ास तौर पर भगवद्गीता के श्लोकों का उर्दू शायरी में अनुवाद करने के लिए याद किया जाता है।

अनवर जलालपुरी की पैदाइश 6 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर ज़िले के जलालपुर क़स्बे में हुयी थी। उनका असली नाम अनवर अहमद था, लेकिन अदबी दुनिया में वे अनवर जलालपुरी के नाम से मशहूर हुए। बचपन से ही उन्हें शायरी और साहित्य में दिलचस्पी थी। किताबों से लगाव और लफ़्ज़ों को समझने की उनकी सलाहियत ने उन्हें धीरे-धीरे अदब की दुनिया की तरफ़ बढ़ाया।

उन्होंने शुरुआती तालीम आज़मगढ़ में हासिल की और आगे की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से की। यहीं उनकी साहित्यिक समझ और शायरी का हुनर और निखरा। वे अपने उस्ताद मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद का बहुत एहतराम करते थे और अपनी अदबी यात्रा में उनकी रहनुमाई को अहम मानते थे।

मुशायरों से मिली पहचान

अनवर जलालपुरी ने साल 1963 से मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू किया। अपनी सादा ज़बान, दिलचस्प अंदाज़-ए-बयान और असरदार आवाज़ की वजह से वे जल्द ही मुशायरों की महफ़िलों में पहचाने जाने लगे। उनकी शायरी में ज़िंदगी के तजुर्बे, इंसानी रिश्तों की पेचीदगियां और समाज की हक़ीक़तें दिखाई देती हैं।

अब नाम नहीं काम का क़ाएल है ज़माना
अब नाम किसी शख़्स का रावन न मिलेगा

इन अशआर में वे नाम और काम के बीच के फ़र्क़ पर सवाल उठाते हैं। शेर का भाव यह है कि किसी इंसान की पहचान सिर्फ़ उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके काम और उसके किरदार से होनी चाहिए। रावण का ज़िक्र करके शायर यह भी याद दिलाते हैं कि किसी को बुराई का प्रतीक मान लेना आसान है, लेकिन उसके पीछे छिपे सवालों को समझना ज़रूरी है।

उनकी शायरी में इंसानी ज़िंदगी की सच्चाइयां भी गहरी सादगी के साथ सामने आती हैं। 

मेरा हर शेर हक़ीक़त की है ज़िंदा तस्वीर
अपने अशआर में क़िस्सा नहीं लिख्खा मैंने

शायरी सिर्फ़ ख़यालों की दुनिया नहीं, बल्कि ज़िंदगी में देखे और महसूस किए गए तर्जुबों को बयान करने का ज़रिया थी।

भगवद्गीता को उर्दू शायरी में ढाला

अनवर जलालपुरी के साहित्यिक सफ़र का सबसे अहम पहलू अलग-अलग परंपराओं को समझने और उन्हें एक-दूसरे के क़रीब लाने की कोशिश थी। उन्होंने भगवद्गीता के श्लोकों को उर्दू शायरी में ढाला। उनका यह काम सिर्फ़ एक किताब का अनुवाद नहीं था, बल्कि अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद का एक रास्ता भी था। 

मैं ने लिख्खा है उसे मर्यम ओ सीता की तरह
जिस्म को उस के अजंता नहीं लिख्खा मैं ने

उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की मशहूर रचना गीतांजलि का भी उर्दू में काव्यात्मक अनुवाद (शायराना तर्जुमा) किया। इसके अलावा, उन्होंने क़ुरआन के ग्यारहवें पारे का उर्दू अनुवाद (तर्जुमा) भी किया। उनके इन कामों से पता चलता है कि वे साहित्य को किसी एक दायरे तक सीमित नहीं मानते थे। उनके लिए ज़बान एक ऐसा ज़रिया थी, जिसके ज़रिए से अलग-अलग विचारों और परंपराओं को समझा जा सकता है।

भगवद्गीता और गीतांजलि जैसी रचनाओं को उर्दू शायरी के अंदाज़ में पेश करना आसान काम नहीं था। इसके लिए मूल रचना के भाव को समझना और फिर उसे दूसरी ज़बान में उसी संवेदना के साथ बयान करना ज़रूरी था। अनवर जलालपुरी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपने काम से उर्दू साहित्य को एक अलग पहचान दी।

शायरी में इंसानी रिश्तों की गहराई

अनवर जलालपुरी के अशआर में इंसान की तन्हाई, उसकी ख़ुद्दारी और रिश्तों की उलझनें भी दिखाई देती हैं।

सभी के अपने मसाइल सभी की अपनी अना
पुकारूं किस को जो दे साथ उम्र भर मेरा

आज के इंसान की एक आम परेशानी सामने आती है। हर व्यक्ति अपनी मुश्किलों और अपने अहं से जूझ रहा है। ऐसे में किसी ऐसे साथी की तलाश आसान नहीं, जो मुश्किल वक़्त में भी साथ निभाए। शायर ने इस एहसास को बहुत सादे, मगर असरदार अल्फ़ाज़ में बयान किया है।

उनकी शायरी की यही ख़ूबी थी कि वे बड़ी बात कहने के लिए मुश्किल लफ़्ज़ों का सहारा नहीं लेते थे। उनके अशआर आम लोगों के अनुभवों से जुड़े होते थे, इसलिए सुनने और पढ़ने वाले उनसे आसानी से जुड़ जाते थे।

साहित्य और समाज में योगदान

अनवर जलालपुरी केवल शायर ही नहीं, बल्कि शिक्षक और साहित्यकार भी थे। वे जलालपुर के नरेंद्र देव इंटर कॉलेज में अंग्रेज़ी के लेक्चरर रहे। उन्होंने शिक्षा और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में अपना योगदान दिया। वे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और उत्तर प्रदेश हज कमेटी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा, उन्होंने उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी भी निभाई और बाद में राज्य मंत्री का दर्जा हासिल किया।

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