सैयद सादिक़ैन अहमद नक़वी 30 जून 1930 को उत्तर प्रदेश के शहर अमरोहा में पैदा हुए। उनका ख़ानदान पढ़ा-लिखा शिया घराना था, जहां ख़त्ताती (सुलेखन) को एक क़ीमती हुनर समझा जाता था। कहते हैं कि उनके पास पुरखों के हाथ से लिखे हुए सात क़ुरान थे। 1947 के बंटवारे के बाद उनका ख़ानदान पाकिस्तान चला गया और कराची के नाज़िमाबाद में बस गया। उसी ज़माने में वो प्रोग्रेसिव राइटर्स एंड आर्टिस्ट्स मूवमेंट से जुड़े।
उनके बुज़ुर्गों का शायरी, ख़त्ताती और मर्सिया-ख़्वानी से गहरा रिश्ता था। कहा जाता है कि मीर तक़ी मीर ने उनके परदादा की शागिर्दी में शायरी सीखी थी, और मीर अनीस जैसे बड़े मर्सिया-निगार उनके एक पुरखे के शागिर्द रहे। यानी अदब और फ़न उन्हें विरासत में मिला था।
सादिक़ैन को पाकिस्तान का सबसे बड़ा ख़त्तात (सुलेखक) और मुसव्विर (चित्रकार) माना जाता है। उनसे पहले वहां ख़त्ताती को दूसरे दर्जे का फ़न समझा जाता था, लेकिन उन्होंने इसे मॉडर्न आर्ट की मुख्यधारा बना दिया। उन्होंने पुरानी रिवायत पर चलने के बजाय अपना अलग अंदाज़ बनाया, जिसे “ख़त-ए-सादिक़ैन” कहा जाता है। उनके हरूफ़ में हरकत और जज़्बात नज़र आते हैं। बाद के बहुत-से पाकिस्तानी फ़नकारों ने उन्हीं का रास्ता अपनाया।

वो जिसको मोहब्बत की रविश कहते हैं
जज़्बात की हम उसको तपिश कहते हैं
सादिक़ैन अमीरों के बंद ड्रॉइंग रूम की जगह आम लोगों की इमारतों में काम करना पसंद करते थे, क्योंकि वो चाहते थे कि उनकी कला सब तक पहुंचे। उन्होंने तीस से ज़्यादा बड़े भित्तिचित्र (murals) बनाए। कराची के स्टेट बैंक में उनका “ख़ज़ाना-ए-वक़्त” है, जिसमें सुक़रात से इक़बाल और आइंस्टाइन तक इंसानी इल्म का सफ़र दिखाया गया है। मंगला डैम के पावर हाउस में “सागा ऑफ़ लेबर” है, जो मेहनतकशों को ख़िराज-ए-तहसीन है। इनके अलावा लाहौर म्यूज़ियम, पंजाब यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ और बनारस की यूनिवर्सिटियों, दिल्ली के इस्लामिक इंस्टीट्यूट और अबू धाबी के पावर हाउस में भी उनके काम मौजूद हैं। उनका आख़िरी काम कराची के फ़्रेरे हॉल की छत पर “अर्ज़-ओ-समावात” (ज़मीन और आसमान) था, जो उनकी वफ़ात की वजह से अधूरा रह गया।
ख़ुद अपने तरीक़े में क़लंदर मैं हूं
ख़ुद अपने सलीक़े में हुनरवर मैं हूं
1960 के दशक में सादिक़ैन सिंध के रेगिस्तानी इलाक़ों में रहे। वहां उन्होंने देखा कि झुलसाती गर्मी और पानी की कमी में भी कैक्टस सिर उठाकर बढ़ता है। यही कैक्टस उनके फ़न में मेहनत, हौसले और जद्दोजहद की अलामत बन गया। उसी दौर में उन्होंने कॉबवेब (मकड़ी का जाला), क्रो (कौआ), क्राइस्ट, होप और सन जैसी सिरीज़ बनाईं, जो उस वक़्त के समाज पर तंज़ और तबसिरा थीं।
सादिक़ैन सिर्फ़ मुसव्विर नहीं, शायर भी थे। उन्होंने उमर ख़य्याम और सरमद काशानी के अंदाज़ में सैकड़ों रुबाइयात कहीं। उनके चार मजमूए हैं: रुबाइयात-ए-सादिक़ैन नक़्क़ाश, रुबाइयात-ए-सादिक़ैन ख़त्तात, रुबाइयात-ए-सादिक़ैनी और जुज़्व-ए-बोसीदा। आपने जो रुबाइयां भेजी हैं, उनमें वो कहते हैं कि वो न किसी के शागिर्द हैं, न उस्ताद, बस अपनी राह के क़लंदर और हुनरमंद हैं। मोहब्बत और हुस्न के बारे में भी उनके अपने अलग ख़याल हैं।
शागिर्द किसी का हूं न उस्ताद हं मैं
करता हुआ तख़्लीक़ और ईजाद हूं मैं
सादिक़ैन फ़क़ीर-मिज़ाज इंसान थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वो ड्रॉइंग रूम के नहीं, गली-कूचे के फ़नकार हैं और उनका फ़न अवाम के लिए है। उन्होंने अपनी बहुत-सी तस्वीरें दोस्तों और दुश्मनों को तोहफ़े में दे दीं, और अक्सर एज़ाज़ात की तक़रीबों में जाने या इनाम की रक़म लेने से भी परहेज़ किया।
उन्हें कई बड़े एज़ाज़ात मिले: 1960 में तमग़ा-ए-इम्तियाज़, 1961 में पेरिस बिएनाले अवॉर्ड, 1962 में प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस, 1980 में सितारा-ए-इम्तियाज़ और 2021 में मरणोपरांत निशान-ए-इम्तियाज़। आज उनकी तस्वीरों की क़ीमत करोड़ों में है। 2017 में लंदन में उनकी पेंटिंग “क्रूसिफ़िक्शन” £118,750 (यानी करीब 1 करोड़ 50 लाख 42 हज़ार रुपये) में नीलाम हुई।
सादिक़ैन का इंतिक़ाल 10 फ़रवरी 1987 को कराची में हुआ, तब वो 56 साल के थे। उन्हें सख़ी हसन क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। अफ़सोस कि उनकी बहुत-सी तस्वीरें गुम हो गईं या चोरी हो गईं, लेकिन उर्दू और दक्षिण एशिया की कला की दुनिया में उनका नाम आज भी बड़े एहतराम से लिया जाता है।
ये भी पढ़ें: मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार
आप हमें Facebook,Instagram,Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं



