किसी भी क़ौम की पहचान उसकी ज़बान, संस्कृति, तारीख़, अदब और रिवायतों से जुड़ी होती है। ज़बान इंसान के ख़यालों, जज़्बात और तजुर्बों को बयान करने का सबसे अहम ज़रिया है। वहीं, लिपि इन ख़यालों और बातों को लिखित रूप देती है, ताकि इन्हें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके। बोली और लिपि का रिश्ता बहुत गहरा है। बोली इंसान की ज़बान पर ज़िंदा रहती है, लेकिन लिपि उसकी आवाज़ और विचारों को वक़्त और जगह की हदों से आगे ले जाती है।
पंजाबी ज़बान की तारीख़ भी इसी मेल-जोल और तरक़्क़ी की कहानी है। पंजाब की धरती पर अलग-अलग मज़हबी, सामाजिक और सांस्कृतिक रिवायतों ने जन्म लिया। यहां के लोकगीतों, क़िस्सों, सूफ़ी कलाम, गुरबाणी, वारों और लोक-साहित्य ने पंजाबी ज़बान को और भी अमीर बनाया। वक़्त के साथ पंजाबी लिखने के लिए अलग-अलग लिपियों का इस्तेमाल होता रहा। आज भारतीय पंजाब में मुख्य रूप से गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) और पाकिस्तानी पंजाब में शाहमुखी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है।
ये दोनों लिपियां एक ही ज़बान और विरासत को लिखने के दो अलग-अलग तरीक़े हैं। इनकी बनावट, तारीख़ और इस्तेमाल में फ़र्क़ ज़रूर है, लेकिन इनके ज़रिए बयान होने वाली पंजाबी की रूह एक ही है। इसलिए गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) और शाहमुखी के बारे में बात करते वक़्त ऐतिहासिक तथ्यों, ज़बान के वैज्ञानिक अध्ययन और सांस्कृतिक मेल-जोल को एक साथ समझना ज़रूरी है।
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi): पुरानी जड़ों से विकास का लंबा सफ़र
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) पंजाबी ज़बान के लिखित इतिहास का एक अहम हिस्सा है। इसका आज का रूप किसी एक दिन में तैयार नहीं हुआ, बल्कि ये उत्तर भारत में इस्तेमाल होने वाली पुरानी लिपियों के लंबे सफ़र से जुड़ा हुआ है। ब्राह्मी लिपि से कई दूसरी लिपियां विकसित हुईं, जिन्होंने वक़्त के साथ अलग-अलग इलाक़ों में अपनी पहचान बनाई। उत्तर भारत में शारदा और लंडा जैसी लिपियों और उनसे जुड़ी लिखने की रिवायतों का भी पंजाब के लिपि-इतिहास पर असर पड़ा।
ये समझना ज़रूरी है कि किसी लिपि के पुराने अक्षरों से मिलते-जुलते निशान मिलने का मतलब ये नहीं है कि उसकी पूरी बनावट और नाम भी उतने ही पुराने हैं। किसी लिपि का इतिहास समझने के लिए पत्थरों पर लिखे लेखों, हाथ से लिखी पुरानी किताबों, पुराने दस्तावेज़ों और अक्षरों की बनावट का आपस में मुक़ाबला करना पड़ता है। गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) की जड़ों को भी इसी वैज्ञानिक नज़रिए से समझना चाहिए।

सिख गुरुओं के दौर में पंजाब में लिखने के कई अलग-अलग तरीक़े इस्तेमाल किए जाते थे। श्री गुरु नानक देव जी की बाणी में अक्षरों और वर्णमाला से जुड़ी रचना ‘पट्टी’ की ख़ास अहमियत है। इससे पता चलता है कि अक्षरों की जानकारी और लिखने-पढ़ने की रिवायत का रिश्ता धार्मिक और नैतिक शिक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ था। गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) के विकास और उसे लोगों तक पहुंचाने में श्री गुरु अंगद देव जी का अहम योगदान माना जाता है।
उन्होंने इस लिपि को शिक्षा, गुरबाणी के अध्ययन और संगतों तक धार्मिक ज्ञान पहुंचाने के लिए ज़्यादा व्यवस्थित रूप में प्रचलित करने में अहम भूमिका निभाई। इसलिए ये कहना ज़्यादा सही होगा कि गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) का इतिहास पुरानी लिखित रिवायतों से जुड़ा हुआ है, जबकि गुरु अंगद देव जी ने इस लिपि को एक तय रूप देने और इसका प्रचार करने में नई दिशा दी।
गुरमुखी नाम और इसकी तारीख़ी पहचान
‘गुरमुखी’ शब्द का रिश्ता गुरु से जुड़ी लिखने की रिवायत से माना जाता है। पुरानी जनम-साखियों और दूसरे लिखित दस्तावेज़ों में इस शब्द के इस्तेमाल के हवाले मिलते हैं। हालांकि, इन दस्तावेज़ों के लिखे जाने के वक़्त, उनके अलग-अलग रूपों और उनकी सच्चाई की जांच करना ज़रूरी है। फिर भी, ये हवाले गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) के तारीख़ी विकास को समझने में मदद करते हैं।
सिख धार्मिक रिवायत में गुरमुखी को ख़ास जगह इसलिए मिली, क्योंकि इसके ज़रिए गुरबाणी को पढ़ने, लिखने और लोगों तक पहुंचाने का काम बड़े पैमाने पर हुआ। गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी को गुरमुखी में पढ़ने और लिखने की रिवायत ने इस लिपि को मज़हबी, साहित्यिक और तालीमी अहमियत दी। गोइंदवाल की पोथियों और दूसरी पुरानी हाथ से लिखी किताबों का अध्ययन इस लिखित विरासत को समझने के लिए अहम है।
गुरमुखी को सिर्फ़ मज़हबी पहचान तक सीमित कर देना, ज़बान और साहित्य के लिए इसके बड़े योगदान को कम करके देखने जैसा होगा। आज के दौर में ये पंजाबी साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, सरकारी कामकाज, रंगमंच, सिनेमा और डिजिटल दुनिया की एक अहम लिपि है। पंजाबी की कहानियों, उपन्यासों, कविताओं, रिसर्च की किताबों और तारीख़ी रचनाओं का बड़ा ख़ज़ाना गुरमुखी में मौजूद है।
इसके साथ ही पंजाबी ज़बान की दूसरी लिखित रिवायतों को भी मानना चाहिए। गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) की अहमियत बताने के लिए शाहमुखी के वजूद या उसके योगदान को कम करके दिखाने की ज़रूरत नहीं है। दोनों लिपियों की तारीख़ को बिना किसी तरफ़दारी के समझना ही पंजाब की साझा विरासत की सही पहचान है।

शाहमुखी लिपि: फ़ारसी-अरबी लिखने की रिवायत में पंजाबी
शाहमुखी पाकिस्तान के पंजाब में पंजाबी लिखने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक अहम लिपि है। ये फ़ारसी-अरबी लिपि पर आधारित है और आम तौर पर नस्तालीक़ लिखने के अंदाज़ में लिखी जाती है। इसमें पंजाबी की आवाज़ों को लिखने के लिए फ़ारसी-अरबी अक्षरों के साथ कुछ अतिरिक्त निशानों और पुराने लिखने के तरीक़ों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
पंजाब में मुस्लिम हुकूमतों, फ़ारसी में सरकारी कामकाज की रिवायत और फ़ारसी व उर्दू के साहित्यिक असर की वजह से इस लिपि का इस्तेमाल बढ़ा। मध्यकाल में फ़ारसी सरकारी कामकाज और ऊंची तालीम की एक अहम ज़बान थी।
इसी वजह से कई लेखकों, शायरों और विद्वानों ने फ़ारसी-अरबी अक्षरों का इस्तेमाल करके पंजाबी में रचनाएं लिखीं। बाबा फ़रीद जी की बाणी पंजाबी साहित्य और सूफ़ी रिवायत का एक अनमोल ख़ज़ाना है। उनके शलोक श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं और पंजाबी की पुरानी शायरी की रिवायत को समझने के लिए बहुत अहम हैं। लेकिन बाबा फ़रीद जी की बाणी के शुरुआती लिखित रूप के बारे में बात करते वक़्त सावधानी बरतना ज़रूरी है। आज मौजूद उनकी बाणी की लिखित रिवायत और उसे लोगों तक पहुंचाने के इतिहास को सीधे आधुनिक शाहमुखी लिपि से जोड़ देना एक आसान, लेकिन अधूरा नतीजा हो सकता है।
इसी तरह, पंजाबी सूफ़ी साहित्य में बाबा बुल्ले शाह, वारिस शाह, क़ादिर यार और दूसरे शायरों की रचनाओं ने ज़बान को गहराई दी। उनके कलाम में ख़ुदा से मोहब्बत, इंसानों की बराबरी, समाज में फैले पाखंड की आलोचना और इंसान के अंदर चलने वाली कशमकश को बयान किया गया है। इन रचनाओं की पुरानी हाथ से लिखी किताबें और छपे हुए संस्करण अलग-अलग लिखित रूपों में मिलते हैं। इसलिए किसी रचना के शुरुआती रूप को पहचानने के लिए उसकी पुरानी पांडुलिपियों और उसे तैयार करके छापने के इतिहास की जांच करना ज़रूरी है।
शाहमुखी पंजाबी साहित्य को महफ़ूज़ रखने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक अहम ज़रिया है। इसे सिर्फ़ उर्दू की लिपि कहकर ख़ारिज करना सही नहीं होगा, क्योंकि एक ही लिपि का इस्तेमाल कई ज़बानों को लिखने के लिए किया जा सकता है। इसी तरह, शाहमुखी में लिखी जाने वाली पंजाबी की अपनी अलग भाषाई पहचान है, भले ही इसकी लिखने की रिवायत फ़ारसी-अरबी अक्षरों से जुड़ी हुई है।

1947 का बंटवारा: पंजाबी ज़बान और लिपियों के लिए एक अहम तारीख़ी मोड़
1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा पंजाब के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक था। इस बंटवारे ने सिर्फ़ दो मुल्कों के बीच सरहद नहीं बनाई, बल्कि परिवारों, गांवों, शहरों, सांस्कृतिक मरकज़ों और लोगों की साझा यादों को भी बांट दिया। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े और अनगिनत परिवारों को जान-माल का नुक़सान उठाना पड़ा।
इस बंटवारे का असर पंजाबी ज़बान की लिखित रिवायतों पर भी पड़ा।
भारतीय पंजाब में गुरमुखी को शिक्षा, साहित्य और सरकारी कामकाज में ज़्यादा संस्थागत सहारा मिला। वहीं, पाकिस्तानी पंजाब में उर्दू को क़ौमी ज़बान का दर्जा मिला और सरकारी कामकाज व शिक्षा के मैदान में भी उसे ख़ास जगह दी गई। पंजाबी बोलने वाली बड़ी आबादी होने के बावजूद वहां पंजाबी को शिक्षा और सरकारी कामकाज में वो जगह नहीं मिल सकी, जिसकी वो हक़दार थी। इसके बावजूद पंजाबी साहित्य, लोक-संगीत और शायरी की रिवायत जारी रही।
ये कहना कि शाहमुखी लिपि सिर्फ़ 1947 के बाद ही वजूद में आई, तारीख़ी तौर पर सही नहीं होगा। फ़ारसी-अरबी लिपि में पंजाबी लिखने की रिवायत बंटवारे से बहुत पहले से मौजूद थी। हालांकि, ‘शाहमुखी’ शब्द का इस्तेमाल कब शुरू हुआ और इस लिपि की मौजूदा पहचान कैसे बनी, इस बारे में अलग से रिसर्च करने की ज़रूरत है।
बंटवारे के बाद दोनों तरफ़ की शिक्षा और सरकारी नीतियों ने लिपियों के इस्तेमाल और लोगों की लिखने-पढ़ने की समझ पर गहरा असर डाला। इसलिए बंटवारे को दोनों लिपियों के जन्म की वजह मानने के बजाय, उनके सामाजिक इस्तेमाल, संस्थानों में उनकी जगह और आपसी मेल-जोल में आए बदलाव के एक बड़े तारीख़ी मोड़ के तौर पर देखना ज़्यादा सही होगा।
गुरमुखी और शाहमुखी: बनावट और इस्तेमाल में फ़र्क़
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) और शाहमुखी, दोनों पंजाबी लिखने के लिए इस्तेमाल होती हैं, लेकिन इनकी बनावट और लिखने का तरीक़ा अलग-अलग है। इन फ़र्क़ों को समझना दोनों लिपियों को सीखने और एक लिपि में लिखी बात को दूसरी लिपि में बदलने के लिए फ़ायदेमंद है।
पहला फ़र्क़ — लिखने की दिशा: गुरमुखी बाएं से दाएं लिखी जाती है, जबकि शाहमुखी दाएं से बाएं लिखी जाती है। इस वजह से दोनों लिपियों को पढ़ने वाले को पन्ने की दिशा, शब्दों की बनावट और विराम चिह्नों के इस्तेमाल के हिसाब से पढ़ने की आदत डालनी पड़ती है।
दूसरा फ़र्क़ — अक्षरों की बनावट: गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) में आम तौर पर किसी अक्षर का बुनियादी रूप शब्द की शुरुआत, बीच या आख़िर में नहीं बदलता। इसके उलट, शाहमुखी में कई अक्षरों की बनावट शब्द में उनकी जगह के हिसाब से बदल जाती है। अक्षरों को आपस में जोड़कर लिखना नस्तालीक़ शैली की ख़ासियत है। थोड़ी प्रैक्टिस के बाद इसे पढ़ना और लिखना आसान हो जाता है।
तीसरा फ़र्क़ — स्वरों को लिखने का तरीक़ा: गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) में स्वरों की आवाज़ों को दिखाने के लिए मात्राओं का एक व्यवस्थित तरीक़ा है। मुक्ता, कन्ना, सिहारी, बिहारी, औंकड़, दुलैंकड़, लांवा, दुलावां, होड़ा और कनौड़ा जैसे चिह्न शब्दों के सही उच्चारण को समझने में मदद करते हैं। शाहमुखी में स्वरों की आवाज़ दिखाने के लिए अक्षरों के साथ ज़बर, ज़ेर और पेश जैसे निशानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन आम लिखावट में अक्सर इन निशानों को नहीं लिखा जाता। इसलिए कई शब्दों का सही उच्चारण समझने के लिए उनके मतलब, इस्तेमाल और पढ़ने वाले की ज़बान की जानकारी पर निर्भर रहना पड़ता है।
चौथा फ़र्क़ — आवाज़ों को लिखने का तरीक़ा: गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) की वर्णमाला पंजाबी की कई आवाज़ों को सीधे तौर पर दिखाती है। शाहमुखी में भी पंजाबी की आवाज़ों को लिखने के लिए अलग-अलग पुराने तरीक़ों और अतिरिक्त अक्षरों का इस्तेमाल किया जाता है। फिर भी, दोनों लिपियों में हर शब्द को बिना किसी उलझन के एक लिपि से दूसरी लिपि में बदलना हमेशा मुमकिन नहीं होता। इसलिए लिप्यंतरण करते वक़्त सिर्फ़ अक्षरों को बदलना काफ़ी नहीं है। शब्द का उच्चारण, उसका मतलब और जिस संदर्भ में उसका इस्तेमाल हुआ है, उसे भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।
पांचवां फ़र्क़ — सीखने का तरीक़ा: गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) में अक्षरों और मात्राओं की व्यवस्थित बनावट नए सीखने वालों को लिखावट और उच्चारण के बीच का रिश्ता समझने में मदद करती है। वहीं, शाहमुखी सीखने के लिए अक्षरों के जुड़े हुए रूपों और स्वरों को कई बार बिना किसी निशान के लिखने के तरीक़े को समझना पड़ता है। हालांकि, किसी लिपि को आसान या मुश्किल मानना सीखने वाले की पहले से मौजूद भाषाई जानकारी और उसकी प्रैक्टिस पर भी निर्भर करता है।
इस तुलना का मक़सद किसी एक लिपि को दूसरी से बेहतर या कमतर साबित करना नहीं है, बल्कि दोनों की ख़ासियतों और उनके इस्तेमाल के तरीक़ों को समझना है। दोनों लिपियां पंजाबी ज़बान और उसकी साझा विरासत को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं।

गुरमुखी की प्रमुख ख़ासियतें
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) की सबसे अहम ख़ासियत इसकी व्यवस्थित अक्षर-प्रणाली है। इसमें तीन स्वर-वाहक—ੳ, ਅ और ੲ—अलग-अलग स्वरों को लिखने में मदद करते हैं। मात्राओं के ज़रिए शब्दों के उच्चारण को साफ़ तौर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा, अद्धक, बिंदी और टिप्पी जैसे निशान भी पंजाबी के सही उच्चारण में अहम भूमिका निभाते हैं। गुरमुखी की वर्णमाला में 35 अक्षरों वाली पारंपरिक व्यवस्था मशहूर है। बाद में इस्तेमाल में आए कुछ अतिरिक्त अक्षरों और नुक़्ते वाले अक्षरों ने दूसरी ज़बानों से आए शब्दों को लिखने में मदद की। इस तरह, वक़्त के साथ गुरमुखी ने ज़बान की ज़रूरतों के मुताबिक़ अपने लिखने के तरीक़े को और बेहतर बनाया।
इसकी एक और ख़ासियत ये है कि अक्षरों की तरतीब उनके उच्चारण की जगह और आवाज़ों के अलग-अलग समूहों के हिसाब से बनाई गई है। क, ख, ग, घ, ङ; च, छ, ज, झ, ञ; ट, ठ, ड, ढ, ण; त, थ, द, ध, न; और प, फ, ब, भ, म जैसे अक्षर आवाज़ों के अलग-अलग समूहों को समझने में मदद करते हैं। इस व्यवस्था से बच्चों को अक्षरों की पहचान करने, उनका सही उच्चारण सीखने और लिखने में आसानी होती है।
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) में लिखने का आसान तरीक़ा इसे पढ़ाई और छपाई के लिए भी फ़ायदेमंद बनाता है। आज कंप्यूटर, मोबाइल फ़ोन, यूनिकोड और डिजिटल पब्लिशिंग की मदद से गुरमुखी में किताबें, अख़बार, वेबसाइट और सोशल मीडिया के लिए सामग्री तैयार करना पहले के मुक़ाबले बहुत आसान हो गया है।
शाहमुखी की ख़ासियतें और साहित्यिक अहमियत
शाहमुखी की अहमियत इस बात में है कि इसका रिश्ता पाकिस्तानी पंजाब में रहने वाली बड़ी पंजाबी-भाषी आबादी की लिखित रिवायत से जुड़ा हुआ है। इसके ज़रिए पंजाबी के क़िस्से, सूफ़ी कलाम, लोकगीत, उपन्यास, कविताएं, अख़बार और आधुनिक साहित्य लिखा और पढ़ा जाता है। ये लिपि पंजाबी की उस साहित्यिक विरासत तक पहुंचने का रास्ता है, जिसकी कई अहम रचनाएं पाकिस्तानी पंजाब में महफ़ूज़ रखी गई हैं।
शाहमुखी में लिखी पंजाबी के उच्चारण और शब्दों के रूप अलग-अलग इलाक़ों की बोलियों और लेखकों की रिवायत के हिसाब से बदल सकते हैं। कई बार एक ही शब्द को लिखने के तरीक़े में फ़र्क़ देखने को मिलता है। इसलिए शाहमुखी पढ़ने वालों के लिए सिर्फ़ अक्षरों को पहचानना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि पंजाबी के शब्दों, मुहावरों और उनके इस्तेमाल के संदर्भ को समझना भी ज़रूरी है।
इस लिपि के ज़रिए पंजाबी साहित्य की उन रचनाओं को भी पढ़ा जा सकता है, जिनकी पुरानी पांडुलिपियां फ़ारसी-अरबी लिपि की रिवायत में लिखी गई थीं। लेकिन हर पुरानी पांडुलिपि को आज की मानक शाहमुखी के बिल्कुल बराबर मानना सही नहीं होगा। लिखने के तरीक़े वक़्त के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए पुरानी रचनाओं को सही ढंग से पढ़ने और समझने के लिए उस दौर की लिपि की जानकारी और संपादन से जुड़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है।

चढ़ते और लहिंदे पंजाब की मौजूदा स्थिति
आज पंजाबी ज़बान दोनों पंजाबों में बड़ी तादाद में बोली जाती है, लेकिन इसकी पढ़ाई और लिखने-पढ़ने की स्थिति अलग-अलग है। भारतीय पंजाब में गुरमुखी का इस्तेमाल स्कूलों की पढ़ाई, सरकारी कामकाज, साहित्य और मीडिया में बड़े पैमाने पर होता है। वहीं, पाकिस्तानी पंजाब में पंजाबी बोलने वालों की बड़ी आबादी होने के बावजूद उर्दू को शिक्षा और सरकारी कामकाज में ख़ास जगह हासिल है। इस वजह से पंजाबी को स्कूलों में पढ़ाने, लिखने और अकादमिक रिसर्च में इस्तेमाल करने के मामले में कई चुनौतियां सामने आती हैं।
ये समझना भी ज़रूरी है कि किसी ज़बान को बोलने वालों की बड़ी तादाद होना और उस ज़बान में पढ़ने-लिखने की जानकारी का आम होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। लोग अपनी मां-बोली बोल सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें उसकी लिपि में पढ़ने-लिखने के मौके नहीं मिलते, तो वो उसके साहित्य और विरासत से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। इसलिए दोनों पंजाबों में पंजाबी की पढ़ाई, किताबों की उपलब्धता, रिसर्च और डिजिटल सामग्री को बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी है।
चढ़ते पंजाब के लोगों के लिए शाहमुखी सीखना सूफ़ी साहित्य, पुरानी पांडुलिपियों और पाकिस्तानी पंजाब के आधुनिक साहित्य तक सीधे पहुंचने में मददगार हो सकता है। इसी तरह, लहिंदे पंजाब के लोगों के लिए गुरमुखी सीखना गुरबाणी, भारतीय पंजाब के साहित्य, पत्रकारिता और तारीख़ी रिसर्च को समझने का रास्ता खोल सकता है। दोनों लिपियों की जानकारी से विद्यार्थियों, रिसर्च करने वालों, अनुवादकों और साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों को बहुत फ़ायदा हो सकता है। ये जानकारी पंजाबी की अलग-अलग लिखित रिवायतों के बीच एक पुल का काम कर सकती है।
साझा विरासत को जोड़ने के लिए ज़रूरी क़दम
गुरमुखी लिपि (Gurmukhi) और शाहमुखी के बीच की दूरी कम करने के लिए सबसे पहले शिक्षा और साहित्य के मैदान में मिलकर काम करने की ज़रूरत है। दोनों लिपियों में पंजाबी सीखने के लिए आसान किताबें, शब्दकोश, व्याकरण की गाइड और ऑनलाइन कोर्स तैयार किए जा सकते हैं। ऐसी सामग्री में एक ही शब्द को दोनों लिपियों में लिखकर उसका उच्चारण और मतलब भी समझाया जा सकता है।
दूसरा अहम क़दम पुराने साहित्य को महफ़ूज़ रखना और उसे डिजिटल रूप देना है। पुरानी हाथ से लिखी किताबों, क़िस्सों, सूफ़ी कलाम और तारीख़ी दस्तावेज़ों की अच्छी क्वालिटी वाली डिजिटल कॉपियां तैयार की जानी चाहिए। जहां मुमकिन हो, वहां उनके असली पाठ के साथ गुरमुखी और शाहमुखी में लिप्यंतरण और उसकी आसान व्याख्या भी उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे रिसर्च करने वालों और आम पाठकों, दोनों को फ़ायदा होगा।
तीसरा क़दम दोनों पंजाबों के लेखकों, शिक्षकों, भाषा के जानकारों और साहित्यिक संस्थाओं के बीच बातचीत को बढ़ावा देना है। साझा सेमिनार, साहित्यिक गोष्ठियां, अनुवाद के प्रोजेक्ट और डिजिटल लाइब्रेरी पंजाबी के बड़े साहित्यिक ख़ज़ाने को दोनों तरफ़ के लोगों के क़रीब ला सकती हैं। इसके अलावा, नई पीढ़ी को पंजाबी की दोनों लिपियों से परिचित कराना भी वक़्त की ज़रूरत है। अगर विद्यार्थी अपनी लिपि के साथ दूसरी लिपि की बुनियादी जानकारी भी हासिल कर लें, तो वो सरहद के दोनों तरफ़ के साहित्य और इतिहास से और गहराई से जुड़ सकते हैं। इससे पंजाबी की साझा पहचान मज़बूत होगी और बंटवारे की वजह से पैदा हुई सांस्कृतिक दूरियों को कम करने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष: लिपियां अलग, लेकिन पंजाबी की रूह एक
पंजाबी ज़बान और इसे लिखने की अलग-अलग रिवायतों का इतिहास सदियों के सामाजिक, मज़हबी, सांस्कृतिक और सियासी बदलावों से जुड़ा हुआ है। गुरमुखी और शाहमुखी, दोनों इस लंबे सफ़र की अहम निशानियां हैं। गुरमुखी ने गुरबाणी, पंजाबी साहित्य, शिक्षा और आधुनिक मीडिया में ख़ास जगह बनाई है। वहीं, शाहमुखी ने पंजाबी के सूफ़ी साहित्य, क़िस्सों और पाकिस्तानी पंजाब की साहित्यिक रिवायत को लिखित रूप में महफ़ूज़ रखने में अहम भूमिका निभाई है।
1947 के बंटवारे ने पंजाबी समाज को अलग-अलग सियासी हालात और संस्थागत व्यवस्थाओं में बांट दिया, लेकिन पंजाबी ज़बान, लोगों की यादों, मुहावरों, लोकगीतों और साहित्य की जड़ें साझा रहीं। इसलिए गुरमुखी और शाहमुखी को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय, पंजाबी साहित्य की बड़ी दुनिया के दो अहम दरवाज़ों के तौर पर समझना चाहिए। गुरमुखी से मोहब्बत करने का मतलब शाहमुखी को नकारना नहीं है और शाहमुखी सीखने का मतलब गुरमुखी की अहमियत कम करना भी नहीं है।
दोनों लिपियों की जानकारी पंजाबी पढ़ने वालों को अपनी ज़बान की विरासत के और क़रीब ला सकती है। पंजाबी की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है कि इसका इस्तेमाल घरों, स्कूलों, यूनिवर्सिटियों, किताबों, अख़बारों और डिजिटल मंचों पर ज़्यादा से ज़्यादा किया जाए।
पंजाबी की असली ताक़त इसकी साझा विरासत, एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की सोच और इंसानी मोहब्बत की रिवायत में है। अगर चढ़ते और लहिंदे पंजाब के लोग गुरमुखी और शाहमुखी, दोनों को समझने और महफ़ूज़ रखने की कोशिश करें, तो ये लिपियां सिर्फ़ लिखने के ज़रिए बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि दोनों पंजाबों के लोगों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक पुल भी बन सकती हैं। यही पंजाबी ज़बान, साहित्य और साझा विरासत के बेहतर मुस्तक़बिल की तरफ़ एक अहम क़दम होगा।
लेख: सविंदर कौर
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