पंजाब की धरती ने सदियों से कई राजाओं, योद्धाओं, संतों, सूफ़ियों और विद्वानों को जन्म दिया है। इस धरती के हर इलाके की अपनी अलग तारीख़ी और सांस्कृतिक पहचान है। मालवा इलाके में बसा फरीदकोट (Faridkot) भी ऐसा ही एक विरासती शहर है। इसका इतिहास रूहानियत, शाही शान-ओ-शौक़त, तालीम, ख़ूबसूरत इमारतों और इंतज़ामिया के विकास से जुड़ा हुआ है।
फरीदकोट (Faridkot) का इतिहास सिर्फ़ एक रियासत या शाही ख़ानदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर के पंजाब में होने वाली सियासी उथल-पुथल, सिख रियासतों के उभार और बदलते समाज की तस्वीर भी पेश करता है। बाबा फरीद जी की रूहानी विरासत से लेकर बराड़ वंश के राजाओं की बनवाई शानदार इमारतों तक, फरीदकोट (Faridkot) का हर पहलू अपने अंदर एक अलग दास्तान समेटे हुए है।
मोकल नगर से फरीदकोट तक
फरीदकोट (Faridkot) के शुरुआती इतिहास को मोकल नगर से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक रवायतों के मुताबिक, इस इलाके पर राजा मोकलदेव का राज था। उन्होंने यहां एक किला बनवाने का काम शुरू करवाया था। इस दौर से जुड़ी एक मशहूर लोक-कहानी के मुताबिक, जब सूफ़ी संत बाबा फरीद जी इस इलाके से गुज़र रहे थे, तब किले के लिए मज़दूर तलाश रहे राजा के कर्मचारियों ने उन्हें भी बिना मज़दूरी दिए काम करने पर मजबूर किया। कहा जाता है कि जब बाबा फरीद जी ने गारे से भरी टोकरी अपने सिर पर उठाई, तो वो उनके सिर को छूने के बजाय हवा में तैरने लगी।

ये करिश्मा देखकर राजा मोकलदेव और उनके दरबारी बाबा फरीद जी की रूहानी शख्स़ियत से बहुत मुतासिर हुए और उन्होंने बाबा जी से माफ़ी मांगी। इसी लोक-कहानी के मुताबिक, बाबा फरीद जी के इस इलाके में आने और उनकी रूहानी शख्स़ियत से जुड़ी यादों के कारण मोकल नगर का नाम बदलकर ‘फरीदकोट (Faridkot)’ रख दिया गया। हालांकि, इस कहानी की अलग-अलग बातें ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और लोक-रवायतों में अलग-अलग तरह से बयान की जाती हैं, लेकिन बाबा फरीद जी के साथ फरीदकोट (Faridkot) का रूहानी रिश्ता आज भी इस शहर की सबसे अहम पहचान में से एक है।
बराड़ वंश का उभार
वक़्त के साथ इस इलाके में कई स्थानीय ताकतों का असर रहा। 16वीं सदी के आसपास बराड़ वंश ने यहां अपना दबदबा मज़बूत किया। बराड़ों ने अपनी जंगी ताकत, संगठन और सियासी समझ के दम पर इस इलाके में अपनी हुकूमत कायम की। आगे चलकर यही बराड़ वंश फरीदकोट (Faridkot) रियासत की बुनियाद बना। मुग़ल सल्तनत के कमज़ोर होने और पंजाब में नई सियासी ताकतों के उभरने के साथ फरीदकोट (Faridkot) ने एक अहम सिख रियासत के तौर पर अपनी पहचान बनाई।

रियासत के हुक्मरान और तरक्की का दौर
फरीदकोट (Faridkot) रियासत के इतिहास में कई हुक्मरानों का ज़िक्र मिलता है, लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में इस रियासत ने ख़ास तौर पर तरक्की की। राजा पहाड़ा सिंह के बाद उनके बेटे राजा वज़ीर सिंह ने 1849 में रियासत की बागडोर संभाली। उनके दौर में इलाके में अमन-ओ-अमान बनाए रखने के साथ-साथ इंतज़ामिया को बेहतर बनाने पर भी ध्यान दिया गया।
1874 में राजा वज़ीर सिंह के इंतकाल के बाद महाराजा बिक्रम सिंह ने गद्दी संभाली। उन्हें मज़हबी रुझान और सिख पंथ के प्रति अपनी सोच के लिए जाना जाता है। सिख धर्म और गुरुद्वारों की सेवा में उनके योगदान को ख़ास तौर पर याद किया जाता है।
उन्होंने अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब में गुरु के लंगर की इमारत के लिए आर्थिक मदद दी। इसके अलावा, वहां बिजली की रोशनी का इंतज़ाम करने में भी योगदान दिया। उस दौर में बिजली की सुविधा नई थी और इसके लिए बड़ी रकम खर्च की गई थी। सिख साहित्य और गुरबाणी के प्रचार-प्रसार में भी उन्होंने दिलचस्पी दिखाई। ‘फरीदकोटी टीका’ की तैयारी में भी उनका नाम जुड़ा हुआ है।

महाराजा बलबीर सिंह और इंतज़ामिया
1898 में महाराजा बिक्रम सिंह के इंतकाल के बाद महाराजा बलबीर सिंह ने रियासत की बागडोर संभाली। उनके दौर में रियासत की फौज और इंतज़ामिया को और मज़बूत किया गया। 1906 में उनके इंतकाल के बाद, वारिस की कम उम्र की वजह से कुछ समय तक रियासत का कामकाज ‘काउंसिल ऑफ़ रीजेंसी’ ने संभाला। इस इंतज़ाम से रियासत का सरकारी कामकाज बिना रुकावट जारी रहा और इंतज़ामिया में भी सिलसिला बना रहा।
1916 में महाराजा बृजिंदर सिंह ने रियासत की बागडोर संभाली। उनके दौर में फरीदकोट (Faridkot) में नई इमारतों, सड़कों और बागों के विकास पर ख़ास ध्यान दिया गया। पहले विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को पैसे और फौज के रूप में मदद भी दी। इस मदद के बदले ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘मेजर’ का रैंक दिया। 1918 में महाराजा बृजिंदर सिंह के इंतकाल के बाद, 1934 तक रियासत का कामकाज ‘काउंसिल ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन’ के ज़रिए चलाया गया।

महाराजा हरिंदर सिंह: तालीम और आधुनिक सोच के पैरोकार
17 अक्टूबर 1934 को महाराजा हरिंदर सिंह ने फरीदकोट (Faridkot) रियासत की गद्दी संभाली। उनका दौर फरीदकोट (Faridkot) को आधुनिक बनाने, तालीम को बढ़ावा देने और लोगों की भलाई के कामों के लिए ख़ास अहमियत रखता है। महाराजा हरिंदर सिंह का मानना था कि तालीम के बिना किसी भी समाज की असल तरक्की मुमकिन नहीं है। इसी सोच के साथ उन्होंने रियासत में कई तालीमी इदारे खुलवाए।
ब्रिजिंदरा कॉलेज ने मालवा इलाके में ऊंची तालीम को बढ़ावा देने में अहम किरदार निभाया। इसके अलावा, बिक्रम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, जूनियर बेसिक ट्रेनिंग स्कूल और खेती की तालीम के लिए भी इदारे खोले गए। कला और हस्तशिल्प से जुड़े संस्थानों की शुरुआत भी की गई।
रियासत के गांवों तक बुनियादी तालीम पहुंचाने पर भी ख़ास ध्यान दिया गया। कई गांवों में प्राइमरी स्कूल और इलाके में हाई स्कूल खोले गए। इसके साथ ही, लोगों को बेहतर सेहत की सहूलियतें देने के लिए अस्पताल और सेहत केंद्र भी बनाए गए।

लोगों की भलाई और 1947 का बंटवारा
महाराजा हरिंदर सिंह के इंतज़ामिया की एक और ख़ास बात लोगों की भलाई से जुड़ी थी। गरीब और ज़रूरतमंद लोगों के लिए रोज़गार और मदद का इंतज़ाम किया जाता था। भीख मांगने की समस्या को रोकने के लिए भी कदम उठाए गए। 1947 का बंटवारा पंजाब के इतिहास का एक बेहद दर्दनाक अध्याय था। पंजाब के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर दंगे, हिंसा और लोगों का उजड़ना देखा गया। फरीदकोट रियासत के संदर्भ में महाराजा हरिंदर सिंह की ओर से अमन-ओ-अमान बनाए रखने और लोगों की हिफाज़त के लिए किए गए प्रयासों का ज़िक्र मिलता है। बंटवारे के दौरान रियासत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिम परिवारों को महफूज़ तरीके से सरहद तक पहुंचाने की कोशिशें भी की गईं।

फरीदकोट की बेमिसाल इमारतें
फरीदकोट (Faridkot) की विरासत का सबसे दिलचस्प पहलू यहां की इमारतों की खूबसूरत बनावट है। बराड़ वंश के राजाओं और ख़ास तौर पर महाराजा हरिंदर सिंह के दौर में कई शानदार इमारतें बनवाई गईं। इन इमारतों में भारतीय, राजपूताना और यूरोपीय इमारतों की बनावट का ख़ूबसूरत मेल देखने को मिलता है। राज महल, किला मुबारक, शीश महल, मोती महल, विक्टोरिया टावर, लाल कोठी और ऐसी ही कई दूसरी इमारतें फरीदकोट (Faridkot) की शाही विरासत की कहानी बयान करती हैं।
शहर के अलग-अलग रास्तों पर बने स्वागत द्वार भी उस दौर की कलात्मक सोच और शाही शान की झलक पेश करते हैं। फरीदकोट (Faridkot) रियासत से जुड़ी विरासती इमारतें और जायदादें सिर्फ फरीदकोट (Faridkot) तक ही महदूद नहीं थीं। लाहौर, शिमला और दिल्ली समेत कई दूसरी जगहों पर भी इस रियासत से जुड़ी इमारतें और जायदादें मौजूद थीं।

शाही किला और गुरु गोबिंद सिंह जी की याद
फरीदकोट (Faridkot) के किला मुबारक का सिख इतिहास से भी गहरा रिश्ता माना जाता है। ऐतिहासिक रवायतों के मुताबिक, दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के इस इलाके में आने का संबंध बराड़ वंश के चौधरी कपूरा सिंह से जोड़ा जाता है। रवायतों के अनुसार, गुरु जी चौधरी कपूरा सिंह की सेवा से खुश हुए और उन्हें अपनी तलवार और ढाल बख्शिश में दी। इन पाक निशानियों को फरीदकोट की सिख विरासत से जुड़ी अहम यादों में गिना जाता है।
आज़ादी के बाद रियासत का खात्मा1947 में भारत की आज़ादी के बाद देश की रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने का सिलसिला शुरू हुआ। 1948 में फरीदकोट (Faridkot) रियासत का अलग शाही वजूद खत्म हो गया और इसे पेप्सू (पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन) में शामिल कर लिया गया। 1956 में पेप्सू के पंजाब में विलय के बाद फरीदकोट (Faridkot) भी पंजाब का हिस्सा बन गया। इस तरह सदियों पुरानी रियासती व्यवस्था का खात्मा हुआ और फरीदकोट (Faridkot) ने लोकतांत्रिक इंतज़ाम के एक नए दौर में कदम रखा।

महाराजा खेवा जी ट्रस्ट और विरासती जायदाद
महाराजा हरिंदर सिंह ने अपनी विरासती जायदाद की देखभाल और लोगों की भलाई से जुड़े कामों को जारी रखने के लिए महारावल खेवा जी ट्रस्ट की बुनियाद रखी। बाद के सालों में रियासत की जायदाद और विरासत से जुड़ी संपत्तियों को लेकर कानूनी विवाद भी चलते रहे। महाराजा हरिंदर सिंह का इंतकाल 16 अक्टूबर 1989 को हुआ। उनके परिवार और विरासत की जायदाद से जुड़े मामले लंबे समय तक अदालतों में भी चलते रहे।
टिल्ला बाबा फरीद: शहर की रूहानी पहचान
फरीदकोट (Faridkot) की पहचान सिर्फ़ राजाओं के महलों और किलों की वजह से नहीं, बल्कि बाबा फरीद जी की रूहानी विरासत की वजह से भी है। शहर में मौजूद टिल्ला बाबा फरीद श्रद्धालुओं के लिए एक अहम मज़हबी और ऐतिहासिक जगह है। हर साल सितंबर के महीने में बाबा फरीद जी का सालाना आगमन पर्व मनाया जाता है। इस मौके पर देश-विदेश से बड़ी तादाद में संगत और श्रद्धालु फरीदकोट पहुंचते हैं। मज़हबी कार्यक्रमों के साथ-साथ साहित्यिक, सांस्कृतिक और सूफ़ियाना कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। ये पर्व पंजाब की साझा विरासत, आपसी भाईचारे और सूफ़ी परंपरा की खूबसूरत मिसाल है।

विरासत की हिफाज़त वक़्त की ज़रूरत
फरीदकोट (Faridkot) की कहानी राजाओं-महाराजाओं की शान से कहीं बड़ी है। ये एक ऐसा शहर है, जहां सूफ़ी रूहानियत, सिख इतिहास, शाही विरासत, तालीम और आधुनिक इंतज़ामिया एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज वक़्त के साथ कई ऐतिहासिक इमारतों की हालत चिंताजनक हो गई है, जबकि कुछ विरासती इमारतें लगभग मिट चुकी हैं। ऐसे में इन इमारतों की सही तरीके से हिफाज़त, उनका रिकॉर्ड तैयार करना और उन्हें दोबारा बेहतर हालत में लाना बेहद ज़रूरी है। राज महल, किला मुबारक, विक्टोरिया टावर, शीश महल और दूसरी विरासती जगहों को एक सही योजना के तहत हेरिटेज टूरिज़्म से जोड़ा जा सकता है।
फरीदकोट (Faridkot) की विरासत सिर्फ़ पत्थरों और इमारतों तक महदूद नहीं है। ये बाबा फरीद जी की रूहानी सोच, बराड़ राजाओं की तारीख़ी विरासत, महाराजा बिक्रम सिंह की सिख पंथ के लिए की गई सेवा और महाराजा हरिंदर सिंह की तालीम व लोगों की भलाई से जुड़ी सोच में भी ज़िंदा है। इसलिए, फरीदकोट (Faridkot) की विरासत की हिफाज़त करना सिर्फ़ सरकार या किसी ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे पंजाबी समाज की साझा ज़िम्मेदारी है। अगर इस विरासत को सही तरीके से संभालकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए, तो फरीदकोट पंजाब में ऐतिहासिक और विरासती सैर-सपाटे का एक अहम मरकज़ बन सकता है।
लेख: सविंदर कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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