Friday, October 23, 2026
31.3 C
Delhi

अंडमान की गुफाओं से सिरपुर के इतिहास तक, UNESCO की Tentative List में भारत की तीन धरोहरें

कहीं धरती के अंदर लाखों साल में बनी चूना पत्थर की गुफाएं हैं, तो कहीं समुद्र के बीच धधकता ज्वालामुखी। एक जगह ऐसी भी है, जहां पुराने मंदिर, बौद्ध विहार और जैन स्मारक भारत की साझा तहज़ीब की कहानी बयां करते हैं। भारत की ऐसी ही तीन ख़ास जगहों को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर की संभावित सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। इनमें अंडमान-निकोबार का बाराटांग द्वीप, अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप और छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक स्थल सिरपुर शामिल हैं।

पेरिस में यूनेस्को (UNESCO) में भारत के स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने 20 अक्टूबर 2026 को इसकी जानकारी दी। ये तीनों जगहें अपनी अलग-अलग ख़ूबियों के लिए जानी जाती हैं। जहां बाराटांग धरती की अनोखी बनावट और जीव-जंतुओं की दुनिया को सामने लाता है, वहीं अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप कुदरत की ताक़त दिखाते हैं। दूसरी ओर, सिरपुर प्राचीन भारत की कला, व्यापार और अलग-अलग धर्मों के बीच मेल-जोल की कहानी कहता है। अब तक भारत की विश्व धरोहर सूची में पहले से 45 स्थल शामिल हैं।

बाराटांग की चूना पत्थर की गुफाएं और कीचड़ के ज्वालामुखी

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मौजूद बाराटांग द्वीप अपनी चूना पत्थर की गुफाओं और कीचड़ के ज्वालामुखियों के लिए जाना जाता है। ये श्री विजयपुरम से करीब 100 किलोमीटर उत्तर में है। यहां की अनोखी बनावट हमें धरती के पुराने इतिहास की झलक दिखाती है।

बाराटांग की चूना पत्थर की गुफाएं लाखों साल में बनी हैं। बारिश का पानी जब धीरे-धीरे चट्टानों पर गिरता है, तो उन्हें घोलने लगता है। लंबे समय में इसी वजह से गुफाएं, दरारें और सुरंगें बनती हैं। इन गुफाओं के अंदर पत्थरों से बनी कई तरह की सुंदर आकृतियां भी देखने को मिलती हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके ये जानने की कोशिश करते हैं कि पुराने समय में धरती का मौसम कैसा था और यहां किस तरह के बदलाव हुए।

Source: Social Media/X

बाराटांग की एक और ख़ास बात यहां के कीचड़ के ज्वालामुखी हैं। स्थानीय लोग इन्हें ‘जल्की’ कहते हैं। आम ज्वालामुखियों से गर्म लावा निकलता है, लेकिन यहां कीचड़, पानी और गैस बाहर आते हैं। करीब 20 साल तक शांत रहने के बाद 2025 में यहां फिर से हलचल देखी गई। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भी यहां के कीचड़ के ज्वालामुखी को ख़ास प्राकृतिक जगह के तौर पर पहचाना है।

बाराटांग की ख़ूबसूरती सिर्फ़ गुफाओं और चट्टानों तक ही महदूद नहीं है। यहां घने जंगल, मैंग्रोव के पेड़, चमगादड़ और स्विफ्टलेट जैसे पक्षी भी पाए जाते हैं। इन जंगलों और गुफाओं को बचाना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि यही कई जीवों का घर हैं। इस तरह बाराटांग न सिर्फ़ धरती के पुराने इतिहास को समझने में मदद करता है, बल्कि यहां की कुदरती दुनिया को भी ख़ास बनाता है।

अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी क्षेत्र में बैरन और नारकोंडम नाम के दो द्वीप शामिल हैं। ये बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के बीच मौजूद हैं। इन द्वीपों का बनना धरती के नीचे मौजूद भारतीय प्लेट और बर्मा माइक्रोप्लेट की हलचल से जुड़ा है। बैरन द्वीप दक्षिण एशिया का इकलौता सक्रिय ज्वालामुखी है। यहां 1787 में पहली बार ज्वालामुखी फटने का रिकॉर्ड मिला था। इसके बाद भी यहां कई बार हलचल देखी गई है। वैज्ञानिकों के लिए ये द्वीप बहुत ख़ास है, क्योंकि यहां वो समझ सकते हैं कि ज्वालामुखी फटने के बाद किस तरह नए पौधे उगते हैं और जीव-जंतु फिर से अपना घर बसाते हैं।

वहीं, नारकोंडम एक ऐसा ज्वालामुखीय द्वीप है, जहां लंबे समय से कोई बड़ा विस्फोट दर्ज नहीं हुआ है। यहां घने जंगल हैं और कई ऐसे जीव पाए जाते हैं, जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलते। इनमें नारकोंडम हॉर्नबिल नाम का पक्षी भी शामिल है। ये पक्षी सिर्फ़ इसी द्वीप पर अपने कुदरती घर में पाया जाता है।

दोनों द्वीपों को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा मिला हुआ है। यहां इंसानों की आवाजाही और दूसरी गतिविधियों पर रोक है। इन द्वीपों पर सक्रिय ज्वालामुखी, अनोखी चट्टानें, घने जंगल और दुर्लभ जीव-जंतु इन्हें ख़ास बनाते हैं। यही वजह है कि इन्हें यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर की संभावित सूची (Tentative List) में शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया है।

सिरपुर: जहां इतिहास में दिखती है धार्मिक विविधता

अंडमान की कुदरती दुनिया से दूर, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले में सिरपुर नाम की एक ऐतिहासिक जगह है, जो भारत के पुराने इतिहास की कहानी सुनाती है। महानदी के पूर्वी किनारे पर बसा ये गांव रायपुर से करीब 78 किलोमीटर दूर है। यहां पुराने मंदिरों, बौद्ध विहारों, जैन स्मारकों और इमारतों के अवशेष मिलते हैं।

पुराने समय में सिरपुर को श्रीपुर या श्रीपुरा कहा जाता था। शरभपुरीय और पांडुवंशी राजाओं के दौर में ये दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के किनारे बसा होने की वजह से ये व्यापार का भी एक बड़ा केंद्र बना। नदी के रास्ते दूसरे इलाकों तक पहुंचना आसान था। इससे यहां व्यापार बढ़ा और धार्मिक गतिविधियों के साथ पढ़ाई-लिखाई को भी बढ़ावा मिला।

सिरपुर में पांचवीं से बारहवीं सदी के बीच बने कई पुराने स्मारक आज भी मौजूद हैं। इनमें लक्ष्मण मंदिर, गंधेश्वर मंदिर, आनंदप्रभु कुटी विहार और बौद्ध विहारों के अवशेष शामिल हैं। यहां हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ी इमारतें एक ही जगह पर मिलती हैं। ये इस बात की गवाही देती हैं कि पुराने समय में सिरपुर में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते थे और उनकी परंपराओं ने इस जगह को ख़ास पहचान दी।

ईंटों से बना लक्ष्मण मंदिर सिरपुर की ख़ास इमारतों में से एक है। इसकी बनावट और दीवारों पर की गई नक़्क़ाशी उस दौर के कारीगरों के हुनर को दिखाती है। यहां खुदाई के दौरान पुराने बाज़ारों, कुओं, पानी बाहर निकालने के इंतज़ाम और लोगों के रहने की जगहों के निशान भी मिले हैं। इनसे पता चलता है कि सिरपुर में लोगों की ज़िंदगी अच्छी तरह बसी हुई थी और शहर में रोज़मर्रा के कामों के लिए कई तरह के इंतज़ाम थे।

सातवीं सदी में भारत आए चीनी मुसाफ़िर ह्वेनसांग ने भी इस इलाके में बौद्ध मठों और धार्मिक गतिविधियों का ज़िक्र किया था। बाद के सालों में यहां हुई खुदाई से सिरपुर के पुराने इतिहास के बारे में कई नई बातें सामने आईं।

सिरपुर को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर की संभावित सूची (Tentative List) में शामिल करने का प्रस्ताव इसकी पुरानी इमारतों, अलग-अलग धर्मों के बीच मेल-जोल और ऐतिहासिक अहमियत को देखते हुए दिया गया है। सिरपुर की सबसे ख़ास बात ये है कि यहां एक ही जगह पर पुराने व्यापार, राजाओं के शासन और हिंदू, बौद्ध व जैन धर्म से जुड़े निशान मिलते हैं। ये जगह हमें भारत के उस दौर की याद दिलाती है, जब अलग-अलग धर्मों और परंपराओं ने मिलकर एक साझा तहज़ीब को आकार दिया था।

विरासत की हिफाज़त की दिशा में अहम कदम

बाराटांग की गुफाएं, अंडमान के ज्वालामुखीय द्वीप और सिरपुर, तीनों भारत की विरासत के अलग-अलग रंग दिखाते हैं। एक धरती के पुराने इतिहास की कहानी कहता है, दूसरा कुदरत की ताक़त और दुर्लभ जीवों की दुनिया सामने लाता है, जबकि तीसरा सदियों पुराने सांस्कृतिक मेल-जोल की याद दिलाता है।

यूनेस्को (UNESCO) की संभावित सूची (Tentative List) में इनका शामिल होना इनकी पहचान बढ़ाने और हिफाज़त की दिशा में अहम कदम है। अब चुनौती इन जगहों की ख़ासियत को बचाए रखने की है, ताकि आने वाली नस्लें भी इनके ज़रिए कुदरत, इतिहास और भारत की रंग-बिरंगी तहज़ीब को समझ सकें।

ये भी पढ़ें: Sarnath: बुद्ध के पहले उपदेश से UNESCO World Heritage तक का सफ़र 

आप हमें Facebook,Instagram,Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सब्सक्राइब  कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

मऊ साड़ी: ज़री में लिपटी परंपरा,जिसका हर धागा कहानी कहता है

उत्तर प्रदेश, जो भारत के सबसे बड़े राज्यों में...

Durgi Stone Carving: पत्थरों में जान डालने की अनोखी कला

आंध्र प्रदेश के पल्नाडु ज़िले में बसा एक छोटा-सा...

Nawab Kapur Singh: सिख इतिहास के अज़ीम जरनल, महान रहनुमा और खालसा पंथ के बेमिसाल नेता

सिख तारीख़ की 18वीं सदी संघर्ष, कुर्बानी, मज़हब पर...

Topics

मऊ साड़ी: ज़री में लिपटी परंपरा,जिसका हर धागा कहानी कहता है

उत्तर प्रदेश, जो भारत के सबसे बड़े राज्यों में...

Durgi Stone Carving: पत्थरों में जान डालने की अनोखी कला

आंध्र प्रदेश के पल्नाडु ज़िले में बसा एक छोटा-सा...

Related Articles

Popular Categories