कुछ शेर ऐसे होते हैं, जो शायर से भी ज़्यादा मशहूर हो जाते हैं। वक़्त गुज़रता रहता है, दौर बदलते रहते हैं, मगर उन शेरों में छुपी हक़ीक़त हर दौर में लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। मुज़फ़्फ़र रज़्मी का यह शेर भी कुछ ऐसा ही है
“ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।”
उत्तर प्रदेश के कैराना से ताल्लुक़ रखने वाले मुज़फ़्फ़र रज़्मी उर्दू शायरी का एक जाना-पहचाना नाम रहे हैं। मुशायरों की महफ़िलों में उनके कलाम और अंदाज़ को पसंद किया गया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बना यह शेर, जिसने इतिहास, सियासत और इंसानी ज़िंदगी के कई पहलुओं को बयान करने का ज़रिया बनकर अपनी अलग जगह बना ली।
कई जगह “जब्र” की जगह “ज़ुल्म” लफ़्ज़ भी छपा मिलता है। इसका मतलब यह है कि इतिहास ने यह सितम भी देखा कि ग़लती तो चंद लम्हों में हुई, मगर उसकी सज़ा पूरी सदियों को भुगतनी पड़ी। यह बात इतनी असरदार है कि इसे सुनकर इंसान ठहर जाता है और सोचने लगता है।
कहा जाता है कि 1997 में जब आई. के. गुजराल ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो उन्होंने रज़्मी का यही शेर पढ़ा था। यह शेर संसद की तक़रीरों और सियासी भाषणों में भी अक्सर सुनाई देता है। अफ़सोस की बात यह है कि शेर तो हर ज़बान पर है, लेकिन उसे कहने वाले शायर के नाम से बहुत कम लोग वाक़िफ़ हैं। यह उर्दू शायरी की एक पुरानी हक़ीक़त है कि कई बार कलाम मशहूर हो जाता है और कलाम-कार गुमनाम रह जाता है।
यह शेर सिर्फ़ ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों का मेल नहीं है, बल्कि इसमें इतिहास का दर्द छुपा है। लोग इसे ऐसे फ़ैसलों के लिए इस्तेमाल करते हैं जिन्होंने इतिहास का रुख़ बदल दिया, जैसे बंटवारा, और जिनका असर बेशुमार लोगों की तक़दीर पर सदियों तक पड़ता रहा। एक पल की चूक आने वाली कई नस्लों को रुला देती है, और यही बात इस शेर को हर दौर के लिए ताज़ा रखती है।
रज़्मी की शायरी में सिर्फ़ यही एक रंग नहीं है। उनके दूसरे अशआर में ख़ुद्दारी, वफ़ा और ज़िंदगी की गहराई भी नज़र आती है:
इस राज़ को क्या जानें साहिल के तमाशाई
हम डूब के समझे हैं दरिया तिरी गहराई
किनारे पर खड़े तमाशा देखने वाले दरिया की गहराई क्या जानें, यह राज़ तो डूबने वाला ही समझता है।
ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल तो ठहर जाऊंगा
वर्ना ख़ुद्दार मुसाफ़िर हूं गुज़र जाऊंगा
अगर मंज़िल ख़ुद बुलाएगी तो रुक जाऊंगा, वरना मैं एक ख़ुद्दार मुसाफ़िर हूं, चुपचाप आगे बढ़ जाऊंगा।
कोई सौग़ात-ए-वफ़ा दे के चला जाऊंगा
तुझ को जीने की अदा दे के चला जाऊंगा
इन शेरों में कहीं तजुर्बे की सच्चाई है, कहीं आन-बान, और कहीं मोहब्बत का नरम लहजा।
रज़्मी की ज़बान आसान है, मगर बात गहरी होती है। वे भारी-भरकम अल्फ़ाज़ के बजाय सादा लफ़्ज़ों में बड़ी बात कह जाते हैं। उनकी शायरी में तजुर्बा, ख़ुद्दारी और इंसानी दर्द एक साथ मिलते हैं। यही वजह है कि उनके शेर किताबों से निकलकर आम बोलचाल का हिस्सा बन गए।
मुज़फ़्फ़र रज़्मी उन शायरों में हैं जिनका एक शेर इतिहास, सियासत और आम ज़िंदगी, तीनों में गूंजता है। भले ही उनका नाम उनके शेर जितना मशहूर न हुआ हो, लेकिन उनकी लिखी हुई बात आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।
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