क्या आप जानते हैं कि भारत का एक ऐसा शहर है जहां की हवा में भी करघों की रिदम सुनाई देती है? जहां बच्चे खेल-खेल में ताने-बाने सीखते हैं और बुज़ुर्गों की उंगलियों में दशकों का हुनर समाया होता है? ये शहर है पानीपत, जिसे दुनिया ‘सिटी ऑफ़ वीवर्स’ यानी बुनकरों का शहर कहती है।

पानीपत को ‘शहर-ए-बुनकर’ क्यों कहा जाता है?
पानीपत की पहचान सिर्फ़ एक शहर के तौर पर नहीं, बल्कि एक तहज़ीब के तौर पर है। यहां की बड़ी आबादी सीधे तौर पर हथकरघा (हैंडलूम) और पावरलूम से जुड़ी हुई है। ये शहर इतनी बड़ी मात्रा में होम फ़र्निशिंग टेक्सटाइल्स — जैसे कंबल, चटाइयां, दरियां, बेड लिनन और अपहोल्स्ट्री फ़ैब्रिक पैदा करता है कि ये न सिर्फ़ पूरे भारत में सप्लाई होते हैं, बल्कि विदेशों तक एक्सपोर्ट भी किए जाते हैं। बुनाई यहां की मज़बूत अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और यही वजह है कि इसे ऐतिहासिक और व्यावहारिक, दोनों नज़रियों से ‘सिटी ऑफ़ वीवर्स’ कहा जाता है।

बुनाई की इब्तिदा और तारीख़
पानीपत की बुनाई की परंपरा कई सदियों पुरानी है। मुग़ल दौर में जब बुने हुए कपड़ों की मांग आसमान छू रही थी, तब इस शहर के हुनरमंद कारीगरों ने अपने घरों में छोटे-छोटे करघे लगाए। आज़ादी के बाद सरकारी मदद और औद्योगिक विकास ने इन पारिवारिक करघों को बड़े मैन्युफ़ैक्चरिंग यूनिट्स में बदल दिया। आज पानीपत भारत के सबसे अहम टेक्सटाइल हब्स में से एक है।

यहां क्या-क्या बनता है?
पानीपत की ख़ासियत ये है कि यहां के टेक्सटाइल्स दाम में सस्ते और टिकाऊ होते हैं। कंबल, कालीन, दरियां, रग, बेड शीट और अपहोल्स्ट्री फ़ैब्रिक यहां के मुख्य उत्पाद हैं। ये प्रोडक्ट्स घरों से लेकर होटलों और संस्थानों तक हर जगह इस्तेमाल होते हैं। यही वजह है कि पानीपत के टेक्सटाइल्स बाज़ार में हमेशा आगे रहते हैं।

भारत की टेक्सटाइल इकॉनमी में अहम किरदार
पानीपत सिर्फ़ कपड़े नहीं बनाता, बल्कि लाखों लोगों को रोज़गार भी देता है। यहां के टेक्सटाइल यूनिट्स MSMEs, निर्यातकों, ट्रांसपोर्टरों और कच्चे माल के सप्लायरों, सबको सहारा देते हैं। ये शहर भारत की घरेलू खपत और निर्यात आमदनी में क़ीमती योगदान देता है।

‘Cast-off Capital of India’-रीसाइक्लिंग का बादशाह
पानीपत की एक और अनोखी पहचान है ‘Cast-off Capital of India’। यहां पुराने और फेंके हुए कपड़ों को रीसाइकल करके धागा बनाया जाता है। इसी धागे से कंबल और दरियां तैयार होती हैं। यानी पानीपत सस्टेनेबल और इको-फ़्रेंडली टेक्सटाइल प्रोडक्शन में सबसे आगे है। यहां कचरे को क़ीमती संसाधन में बदलने का हुनर है।

कुछ दिलचस्प बातें
- नस्लों-नस्लों का हुनर: यहां बुनाई पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ करघे की बारीकियां भी सीखते हैं।
- रोज़गार का पहाड़: लाखों लोग बुनकर, रंगरेज़, डिज़ाइनर, व्यापारी, ट्रांसपोर्ट, डायरेक्ट और इनडायरेक्ट इस इंडस्ट्री से जुड़े हैं।
- ग्लोबल मार्केट: पानीपत के टेक्सटाइल्स यूरोप, मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अमेरिका तक एक्सपोर्ट होते हैं।
- परंपरा और टेक्नोलॉजी का संगम: ये शहर हथकरघा की ख़ूबसूरती और पावरलूम की रफ़्तार दोनों को साथ लेकर चलता है।
- लोकल इकॉनमी की जान: यहां की हर छोटी-बड़ी दुकान, ट्रांसपोर्ट और बिज़नेस किसी न किसी तरह बुनाई से जुड़ा है।
पानीपत सिर्फ़ एक भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि एक जज़्बा है, मेहनत, हुनर और क्रिएटिविटी का ऐसा संगम जहां हर धागा एक नई कहानी बुनता है। यही वजह है कि जब भी भारत की बुनाई की बात होती है, पानीपत का नाम सबसे पहले ज़ुबान पर आता है। ये शहर अपने करघों की आवाज़ में पूरे देश का फ़ख़्र बुनता है।
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