दिल्ली का निज़ामुद्दीन (Nizamuddin) करीब 700 साल पुरानी तहज़ीब और विरासत की पहचान है। इसी विरासत के बीच Insha-E-Noor निज़ामुद्दीन बस्ती की महिलाओं को अपने हुनर के दम पर आगे बढ़ने का मौक़ा दे रहा है। यहां महिलाएं सिलाई, आरी कढ़ाई, सांझी कला और क्रोशिया से ख़ूबसूरत चोज़े बनाती हैं। ये पहल उनके लिए सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और ख़ुद पर भरोसा करने का सफ़र भी है।
घर की चार दीवारी से बाहर निकली महिलाएं, हुनर से बनाई पहचान
आगा ख़ान ट्रस्ट फ़ॉर कल्चर की निज़ामुद्दीन (Nizamuddin) अर्बन रिन्यूअल इनिशिएटिव पहल के तहत शुरू हुआ Insha-E-Noor का मक़सद विरासत को सहेजने के साथ महिलाओं की आजीविका को मज़बूत बनाना है। प्रोग्राम ऑफ़िसर रत्ना साहनी बताती हैं कि 2007 में हुए क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ सर्वे में सामने आया कि सिर्फ़ करीब 8 से 9 प्रतिशत महिलाएं कमाती थी। इनमें भी ज़्यादातर बतौर हेल्पर काम करती हैं।
Insha-E-Noor में महिलाओं को ट्रेनिंग देने के बाद सिलाई, कढ़ाई और क्रोशिया जैसे हुनर सिखाए गए। 2011 में उन्होंने पहली बार क्राफ्ट म्यूज़्यिम की दस्तकार एग्ज़ीबिशन में हिस्सा लिया। रत्ना के मुताबिक, 2018 के सर्वे में काम करने वाली महिलाओं की तादाद करीब 24 प्रतिशत हो गई। इस सफ़र में Insha-E-Noor ने आत्मनिर्भर का पहला पायदान बनकर अहम भूमिका निभाई। आज यहां करीब 100 महिलाएं काम कर रही हैं।

पति के इंतकाल के बाद घर की ज़िम्मेदारी संभाल रही मीना
Insha-E-Noor में सिलाई का काम करने वाली मीना करीब 10-11 साल से इस पहल से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने यहां से सिलाई सीखी और धीरे-धीरे बड़े ऑर्डर पर काम करना शुरू किया। मीना बताती हैं कि करीब ढाई साल पहले उनके शौहर का इंतकाल हो गया। इसके बाद बच्चों की परवरिश और घर चलाने की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई। अब वो काम करके घर का ख़र्च उठाती हैं। पहले उनके पास अपने ख़र्च के लिए पैसे नहीं होते थे, लेकिन अब कमाई सीधे बैंक खाते में आती है। वो अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैसे खर्च कर सकती हैं।
अब बेझिझक रखती हैं अपनी बात
Insha-E-Noor में बुक बाइंडिंग का काम करने वाली अमृता भी करीब 10 साल से Insha-E-Noor से जुड़ी हैं। वो बताती हैं कि पहले दूसरी जगह नौकरी करते हुए उन्हें डर लगता था, लेकिन यहां बस्ती के लोग हैं और ये जगह उन्हें अपने घर जैसी लगती है। यहां काम करने के साथ महिलाओं को अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शनियों और वर्कशॉप में हिस्सा लेने का मौक़ा भी मिलता है। यहां की एग्ज़ीबीशन छतरपुर, लाल किला, गुरुग्राम और नोएडा ,समेत कई जगहों पर लगती हैं। सुंदर नर्सरी में होने वाली वर्कशॉप में बच्चों को पेपर बैग बनाना सिखाया जाता है। इन गतिविधियों से महिलाओं को अपने हुनर को दूसरों तक पहुंचाने का मौक़ा मिलता है।

700 साल पुरानी विरासत के डिज़ाइन से नया हुनर
Insha-E-Noor में हुनर सीखने के साथ बस्ती की ऐतिहासिक विरासत को भी काम का हिस्सा बनाया गया है। रत्ना साहनी बताती हैं कि ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के दौरान वहां की जालियों पर बने ख़ूबसूरत डिज़ाइन से उन्हें सांझी कला को नए अंदाज़ में इस्तेमाल करने का ख़याल आया। सांझी कलाकार साहिबा बताती हैं कि मथुरा से आए लोगों ने उन्हें ये कला सिखाई। अब इन डिज़ाइनों से बुकमार्क, लैंप और ट्रे जैसे प्रोडक्ट बनाए जाते हैं। साहिबा के मुताबिक, पहले उन्हें प्रदर्शनियों में लोगों से बात करने में झिझक होती थी, लेकिन अब उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। वो आसानी से अपनी बात रख पाती हैं।
पहली कमाई से पति को दिलाई स्कूटी
क्रोशिया का काम करने वाली सीमा Insha-E-Noor के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सदस्य और शेयरहोल्डर भी हैं। बस्ती के मेले में महिलाओं को क्रोशिया का काम करते देखकर उन्हें इस पहल के बारे में पता चला। आज वो पोटली बैग, हेयर क्लिप और ईयररिंग्स जैसे प्रोडक्ट बनाती हैं। सीमा बताती हैं कि अपनी पहली कमाई से उन्होंने सोने के ईयररिंग्स बनवाए थे। करीब तीन-चार साल पहले उन्होंने अपने शौहर के लिए स्कूटी खरीदी, जिसकी EMI वो अपनी कमाई से भरती हैं। उनके मुताबिक, यहां हुनर सीखने के साथ बोलने और अपनी बात रखने की ट्रेनिंग भी मिलती है।

महिलाएं बनीं कंपनी की डायरेक्टर, फ़ैसलों में भी हिस्सेदारी
रत्ना साहनी बताती हैं कि 2019 में महिलाओं के इस ग्रुप ने एक प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी बनाई। महिलाओं को वोटिंग के ज़रिए डायरेक्टर चुना गया। अब वो बैंक से जुड़े कामों और ज़रूरी दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने की ज़िम्मेदारी भी संभालती हैं। इस तरह वो संस्था के कामकाज में भी अपनी भूमिका निभा रही हैं। आज एक महिला की कमाई से पूरे परिवार की ज़िंदगी चलती है। Insha-E-Noor के प्रोडक्ट सुंदर नर्सरी में मौजूद कियोस्क पर बिकते हैं।
संस्था की वेबसाइट inshaenoor.com के ज़रिए भी लोग इनके बारे में जान सकते हैं। रत्ना साहनी चाहती हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग महिलाओं के बनाए प्रोडक्ट्स तक पहुंचें। उनका कहना है कि जब एक महिला कमाने लगती है, तो इसका फ़ायदा उसके पूरे परिवार को मिलता है। बस्ती में लोग एक-दूसरे को देखकर हौसला पाते हैं। एक महिला को काम करते और अपनी कमाई करते देखकर दूसरी महिलाएं भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होती हैं। Insha-E-Noor की कहानी बताती है कि सही ट्रेनिंग और मौक़ा मिलने पर हुनर रोज़गार के साथ आत्मविश्वास भी देता है। निज़ामुद्दीन की पुरानी विरासत के बीच ये महिलाएं ख़ूबसूरत चीज़ें बनाने के साथ अपनी ज़िंदगी की नई पहचान भी गढ़ रही हैं।
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