मेरठ के एक छोटे से गांव से IIT दिल्ली तक और फिर देश के 3.5 लाख बच्चों की ज़िंदगी बदलने तक, ये कहानी है उस शिक्षक की, जिसने साबित कर दिया कि टेक्नोलॉजी किसी शहर की जागीर नहीं है।
दिल्ली में मिला सम्मान
31 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में पांचवां रोहिनी नय्यर पुरस्कार उत्तराखंड के देहरादून के तकनीकी शिक्षक प्रशांत चौधरी को दिया गया। ये पुरस्कार 40 साल या उससे कम उम्र के उस शख्स को मिलता है जो ग्रामीण विकास में असाधारण योगदान दे। पुरस्कार NITI आयोग के पूर्व CEO और भारत सरकार के G20 शेरपा रहे अमिताभ कांत ने प्रदान किया। कांत सालों से ज़मीनी स्तर पर नीतियों को लागू होते देखते रहे हैं, इसलिए ग्रामीण भारत पर बने इस अवॉर्ड में उनकी मौजूदगी अहम थी।

अपने गांव से IIT दिल्ली से ग्रेजुएशन करने वाले पहले व्यक्ति
प्रशांत चौधरी उत्तर प्रदेश के मेरठ के पास एक गांव में पले-बढ़े। साल 2010 में वे अपने गांव से IIT दिल्ली से ग्रेजुएशन करने वाले पहले व्यक्ति बने। ऐसी डिग्री लेकर ज़्यादातर लोग बड़े शहर में आराम की नौकरी करते, लेकिन चौधरी अपने गांव लौटे और वहीं के बच्चों को तकनीक पढ़ाने लगे।
उनके कई छात्र बाद में Apple, Microsoft और Adobe जैसी कंपनियों में शामिल हुए। कई तो अपने परिवार में पहले शख्स थे जिन्हें ऐसी नौकरी मिली। इन नतीजों ने उन्हें एक ऐसा आइडिया दिया जिस पर दांव लगाना बनता था। साल 2020 में उन्होंने CodeYogi Foundation शुरू किया और शुरुआती काम का खर्च खुद उठाया।
जेब में समा जाने वाली क्लास
भारत के ज़्यादातर ग्रामीण घरों में डेस्कटॉप कंप्यूटर नहीं है। कई स्कूलों में कंप्यूटर लैब नहीं, और बहुतों में तो कोई शिक्षक ही नहीं जो कोडिंग समझा सके। लेकिन स्मार्टफोन देश के लगभग हर कोने तक पहुंच चुका है। CodeYogi इसी फैक्ट पर बना है।
पूरा प्लेटफॉर्म परिवार के स्मार्टफोन पर चलता है। इसके Lesson भारतीय भाषाओं में आते हैं, इसलिए शुरुआत के लिए अंग्रेज़ी ज़रूरी नहीं। न कंप्यूटर, न लैब, न प्रशिक्षित शिक्षक। शुरुआती कोर्स में कोडिंग सिखाई गई, और छात्रों ने साबित किया कि वे फोन पर ही असली कोड लिख सकते हैं और चलती-फिरती वेब एप्लिकेशन बना सकते हैं। अब ये कार्यक्रम 30 दिन का Applied AI Fluency कोर्स बन चुका है, जिसमें छात्र पढ़ाई और घर के कामों में काम आने वाले असली AI टूल्स इस्तेमाल करते हैं। जिसमें एजुकेशन, हेल्थ, रिसर्च, बिज़नेस और फेक न्यूज़ की पहचान तक।
स्पीड और लागत क्यों मायने रखती है
चौधरी अपनी बात एक ही वाक्य में रखते हैं: ‘AI स्कूली व्यवस्थाओं से तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।’ लैब बनाने में साल लगते हैं, शिक्षकों को प्रशिक्षित करने में साल लगते हैं और जो ग्रामीण छात्र इन दोनों का इंतज़ार करेगा, वो सबजेक्ट में बहुत पीछे रह जाएगा। CodeYogi इस इंतज़ार को बायपास कर देता है। कार्यक्रम प्रति छात्र प्रति माह 10 रुपये से भी कम में चलता है। हर जिले में ह्यूनम टीचर पर डिपेंड मॉडल इस आंकड़े के पास भी नहीं फटक सकता और यही वजह है कि दस लाख स्टूडेंट्स का लक्ष्य वास्तविक दिखता है।

आंकड़े क्या कहते हैं
पिछले तीन सालों में कार्यक्रम 9 राज्यों और 120 जिलों के 3.5 लाख से ज़्यादा छात्रों तक पहुंच चुका है। ये जिले भारत के लगभग 30 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र को कवर करते हैं। सीखने वालों में 48.6 फीसदी लड़कियां हैं। लगभग 95 प्रतिशत केवल स्मार्टफोन पर पढ़ते हैं, और 59 प्रतिशत उन्नत शिक्षार्थी विज्ञान-तकनीक से बाहर की बैकग्राउंड से आते हैं।
फाउंडेशन बताता है कि एक लाख से ज़्यादा छात्रों ने फोन पर अपनी पहली डिजिटल रचना बनाई है। 80 प्रतिशत पूर्व छात्रों को नौकरी मिली है, शुरुआती पैकेज 6 लाख रुपये सालाना। इनमें से कई रिमोट सॉफ्टवेयर भूमिकाएं हैं, यानी युवा गांव छोड़े बिना वेतन कमा सकते हैं। कम या बिना ज़मीन वाले परिवार के लिए यह आमदनी का दूसरा सोर्स है जो मानसून पर निर्भर नहीं।
दस लाख की राह
CodeYogi को मार्च 2027 तक दस लाख स्टूडेंट्स तक पहुंचने की उम्मीद है। योजना है 30 लाख छात्रों को AI साक्षर बनाने, 60,000 से ज़्यादा उन्नत AI शिक्षार्थी तैयार करने और पांच या अधिक राज्य सरकारों के साथ पार्टनरशिप की। चौधरी चाहते हैं कि ग्रामीण युवाओं की एक पीढ़ी ऐसी हो जो तकनीक को कभी “किसी और की चीज़” न समझे। सवाल यह नहीं रहा कि गांव का छात्र इसे सीख सकता है या नहीं। सवाल अब ये है कि वो कितनी दूर तक जा सकता है।
पुरस्कार के पीछे की महिला
ये पुरस्कार दिवंगत डॉ. रोहिनी नय्यर को समर्पित है, जो एक प्रख्यात विद्वान और प्रशासक थीं जिन्होंने अपना अधिकांश पेशेवर जीवन भारत में ग्रामीण विकास को दिया। उनके परिवार ने Nayyar Foundation for Social and Economic Purpose बनाया, जो हर साल यह अवॉर्ड देश में सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए देता है।
प्रशांत चौधरी की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए बड़े बजट नहीं, सही सोच चाहिए। जहां एक स्मार्टफोन और 10 रुपये महीना एक गांव के बच्चे को Apple और Microsoft तक पहुंचा सकते हैं।



