कल वो सिर्फ़ ‘मां’, ‘बहन’ या ‘प्रेमिका’ थी, आज वो ‘अपनी कहानी’ खुद लिख रही है। रानी मुखर्जी हों या काजोल (Rani Mukerji to Kajol), इन अभिनेत्रियों ने अपने दम पर इस बदलाव की इबारत लिखी है। लेकिन क्या सच में बदलाव (30 years of women’s journey in cinema) उतना गहरा है जितना दिखता है?
तीस साल पहले जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (Dilwale Dulhania Le Jayenge 1995) रिलीज़ हुई थी, तो सिमरन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि उसके पिता ने कहा, ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी।’ यानी उसकी ज़िंदगी जीने की इजाज़त भी उसे अपने पिता से लेनी पड़ी। मगर इसी किरदार ने एक मिसाल कायम की,सिमरन न सिर्फ रोमांटिक हीरोइन थीं, बल्कि संस्कारों और आधुनिकता के संगम की जीती-जागती तस्वीर भी थी।
ग्लैमर से गहराई तक: नब्बे के दशक की नायिका
कभी खुशी कभी ग़म (2001) हो या हम आपके हैं कौन (1994), हर जगह औरत या तो ‘संस्कारी बहू’ थी या ‘अच्छी पत्नी’। उसके ग्रे शेड्स नदारद थे। दुश्मन (1998) में काजोल (Kajol) जुड़वां बहनों का किरदार निभाकर दिखाया कि एक ही एक्ट्रेस में कितनी Variations समा सकती हैं, एक भोली-भाली और दूसरी बदले की आग में जलती हुई। वहीं कुछ कुछ होता है (1998) में उनकी अंजलि एक टॉमबॉय से एक खूबसूरत और आत्मविश्वासी औरत में बदलती नज़र आईं।
रानी मुखर्जी (Rani Mukerji) ने भी इसी दौर में कदम रखा। शुरुआत में वो भी पारंपरिक भूमिकाओं में नज़र आईं, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी।

90 के दशक की नायिका को देखिए। वो या तो राधा थी, चुपचाप दुख सहने वाली बलिदान की मूरत, या फिर बसंती, तेज़-तर्रार लेकिन सिर्फ हीरो के इर्द-गिर्द घूमने वाली। एक जाने-माने अख़बार के विश्लेषण के मुताबिक, शोले (1975) की बसंती जहां तांगा चलाती थी और बिना झिझक बोलती थी, वहीं आज की नायिका महज़ डिज़ाइनर कपड़ों और कुछ तीखे डायलॉग तक सीमित होकर रह गई है।
नई सदी, नई चुनौतियां, नई नायिकाएं
2000 के दशक में आते-आते ये तस्वीर बदलने लगी। रानी मुखर्जी ने ब्लैक (Black 2005) में मिशेल मैकनैली का किरदार निभाकर सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी। एक ऐसी लड़की जो देख और सुन नहीं सकती, लेकिन जीने की जिद नहीं हारती। ये किरदार सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि उस दौर की सबसे बड़ी चुनौती थी। फिल्मफेयर के मुताबिक, इस फिल्म ने साबित किया कि बिना डायलॉग के भी सिनेमा अपनी पूरी ताकत से बोल सकता है।

वीर-ज़ारा (2004) में रानी की पाकिस्तानी वकील सामिया सिद्दीकी ने दिखाया कि औरत सिर्फ रोमांस तक सीमित नहीं, बल्कि इंसाफ की आवाज़ भी बन सकती है।
लोकः चैप्टर वन चंद्रा (2025) की चंद्रा की बात कहना यहां इसलिए अहम है क्योंकि वो किसी पुरुष से ‘बचाई’ नहीं जाती। जब उसका दोस्त उसे बचाने दौड़ता है, तो वो मुस्कुराकर कहती है, ‘मुझे बचाने आए हो?’ ये सवाल हमारे सिनेमा की नायिका को दशकों से बचाने वाली मानसिकता पर एक तीख़ा मज़ाक है।

बदलाव की बयार: 2010 के बाद की नायिका
साल 2010 के बाद ये तस्वीर में और बदलाव आने लगा। इसमें सबसे बड़ा हाथ था ओटीटी (OTT) का। रवीना टंडन ने हाल ही में कहा कि अब महिला कलाकारों के पास ‘Shelf Life’ का झंझट खत्म हो गया है। शादी के बाद करियर खत्म होने का डर अब नहीं रहा। आरण्यक हो या कर्मा कॉलिंग (Aranyak or Karma calling), उन्हें ऐसे रोल मिल रहे हैं जो सिर्फ हीरोइन नहीं, बल्कि कहानी की जान हैं।

Queen (2013) की रानी से लेकर गंगूबाई काठियावाड़ी (2022) तक, अब औरत सिर्फ ‘मजबूर’ नहीं, ‘मज़बूत’ है। थप्पड़ में तापसी पन्नू ने दिखाया कि एक औरत की अस्मिता उसकी शादी से बड़ी है। पिंक (Film Pink) ने ‘ना’ को ‘ना’ ही मानना सिखाया।
मर्दानी से मिसेज़ चटर्जी तक: रानी का सफ़र
मर्दानी (2014) मर्दानी 2 (2019) और मर्दानी 2 (2025) में रानी की शिवानी शिवाजी रॉय सिर्फ एक पुलिस अधिकारी नहीं थीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ आवाज़ थीं जो औरतों को उनकी जंग में अकेला छोड़ देता है। हिचकी (2018) में उनकी नैना माथुर टॉयरेट सिंड्रोम से जूझती एक टीचर थीं, जिन्होंने सिखाया कि आपकी कमज़ोरियां आपकी ताकत बन सकती हैं।

मिसेज चटर्जी बनाम नॉर्वे (2023) तो उनके करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी। एक मां जो अपने बच्चों की कस्टडी के लिए पूरे देश से लड़ती है। इस किरदार को दुनियाभर में सराहना मिली ।
कंगना से दीपिका तक: नई पीढ़ी की नायिकाएं
कंगना रनौत की क्वीन (2013) ने तय किया कि टूटे दिल वाली लड़की भी अपनी पहचान खुद बना सकती है। आलिया भट्ट की राज़ी (2018) से लेकर गंगूबाई काठियावाड़ी (2022) तक का सफ़र बताता है कि औरत की कहानी में अब औरत ही केंद्र में है।

दीपिका पादुकोण ने पीकू (2015) में एक आम आधुनिक लड़की का किरदार निभाया तो छपाक (2020) में एसिड अटैक सर्वाइवर की संवेदनशील दास्तान बयां की। तापसी पन्नू की थप्पड़ (2020) ने घरेलू हिंसा पर एक तमाचे की तरह प्रहार किया।
विद्या बालन ने कहानी (2012) और द डर्टी पिक्चर (2011) जैसी फिल्मों से साबित किया कि महिला केंद्रित फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा सकती हैं।
लेकिन अभी भी अधूरी है कहानी
क्या ये बदलाव पूरा हो चुका है? बिल्कुल नहीं। आज भी बड़ी-बड़ी फिल्मों में नायिकाएं ग्लैमर का ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने का ज़रिया बनी हुई हैं। शिल्पा शेट्टी ने हाल ही में कहा कि 90 के दशक में फिल्में ‘बिना लॉजिक’ के बनती थीं, सिर्फ ‘Aspirational and Fantasy’ होती थीं।

सबसे बड़ी विडंबना ये है कि 1975 में शोले ने बसंती जैसा किरदार दिया जो आज़ाद था, लेकिन 2025 तक आते-आते हम अक्सर उसे वही ‘आज़ादी’ देने से कतराते हैं।
आगे की राह
तीस सालों में नायिका ने डांस करना तो सीख लिया है, ग्लैमरस होना सीख लिया है, लेकिन अब ज़रूरत है उसे ‘वॉर रूम’ में बिठाने की। जैसा कि एक आलोचक ने लिखा, ‘बसंती बातें तो बहुत कर सकती थी, लेकिन काश उसे गब्बर को हराने की प्लानिंग में भी शामिल किया जाता’। यही कमी आज भी बरकरार है।
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