Imagine कि आप एक दुकान पर खड़ी हैं। एक ही कंपनी के दो रेज़र रखे हैं, एक गुलाबी पैकेज में ‘महिलाओं के लिए’ और एक नीले पैकेज में ‘पुरुषों के लिए’। दोनों का काम एक ही है ‘बाल हटाना’। फिर भी गुलाबी वाला रेज़र 50 रुपए महंगा है। ये छोटा सा फर्क ‘Pink Tax’ है। वो अनकही कीमत (Pink Tax: The price of pink that every girl has to pay) जो औरत होने के नाम पर हर दिन चुकानी पड़ती है।
ये कोई सरकारी टैक्स नहीं है, बल्कि कंपनियों की एक मार्केटिंग चाल है, जिसमें महिलाओं को पुरुषों के समान प्रोडक्ट्स के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। आइए, समझते हैं ये गुलाबी टैक्स कहां-कहां छिपा है और इसकी कीमत क्या है।

कहां-कहां देना पड़ता है ये टैक्स?
ये भेदभाव हमारी रोजमर्रा की चीजों में इस कदर घुला हुआ है कि हमें पता ही नहीं चलता। भारत में Amazon India पर किए गए अध्ययन (2025) के बाद जो रिपोर्ट सामने आई है हैरान करने वाली है।
1.पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स: एक जैसे शैंपू, क्रीम या डियोडरेंट अगर महिलाओं के लिए हैं तो 13 फीसदी तक महंगे होते हैं। शेविंग क्रीम, रेज़र जैसी चीजों में कीमत का यह अंतर 58 फीसदी तक पहुंच जाता है।
2.कपड़े और सर्विस:रिपोर्ट कहती है, एक ही ब्रांड की एक जैसी कॉटन की सफेद शर्ट पुरुषों के लिए 399 रूपये और महिलाओं के लिए 499 रुपये। बाल कटवाने जाइए, तो महिलाओं के लिए कीमत 60 फीसदी ज़्यादा। ड्राई क्लीनिंग में महिलाओं के कपड़ों की कीमत 90 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकती है।
3.हेल्थकेयर और हाइजीन: सबसे हैरान करने वाला उदाहरण है सैनिटरी पैड्स पर टैक्स। 2018 तक सरकार इन पर 12 फीसदी GST वसूलती थी, जबकि कंडोम और वियाग्रा जैसी चीजों पर टैक्स न के बराबर था। मतलब,menstruation को ‘luxury’ समझा गया। हालांकि अब पैड टैक्स-फ्री हैं, लेकिन महिलाओं की health insurance premium आज भी ज़्यादा होती है, क्योंकि कंपनियां प्रेग्नेंसी को ‘ख़तरा’ मानती हैं।

आर्थिक असर: कम कमाओ, ज्यादा खर्च करो
ये सबसे बड़ा Contradiction है। एक तरफ जहां महिलाएं पुरुषों की तुलना में 28 फीसदी से 40 प्रतिशत तक कम कमाती हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें रोजमर्रा की चीजों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
एक स्टडी (GNLU Journal of Law & Economics (2025) के मुताबिक, केवल महिलाओं वाले घरों पर हर साल यह अतिरिक्त बोझ करीब 300 डॉलर (लगभग 25,000 रुपए) तक हो सकता है। सोचिए, अगर 25 साल की उम्र से लेकर 60 साल तक यह सिलसिला जारी रहे, तो ये रकम लाखों में पहुंच जाती है। ये पैसा महिलाओं की बचत, निवेश और आर्थिक आजादी से सीधा कटता है।

ऐसा क्यों होता है?
कंपनियां दलील देती हैं कि महिलाओं के प्रोडक्ट्स पर खुशबू, पैकेजिंग या मार्केटिंग में ज्यादा खर्च आता है। लेकिन सच्चाई ये है कि ये महज़ एक मानसिकता है। समाज में ये धारणा बना दी गई है कि महिलाएं ख़ूबसूरत और दिखावे पर पैसा खर्च करेंगी ही। ‘Pink’ कलर और ‘महिलाओं के लिए’ का लेबल लगाते ही कीमत बढ़ाने का एक बहाना मिल जाता है।
क्या है इसका हल?
अच्छी ख़बर यह है कि अब इसके खिलाफ आवाज़ उठने लगी है। अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में ‘जेंडर टैक्स रिपील एक्ट‘ जैसे कानून बन चुके हैं, जो सेवाओं में जेंडर के आधार पर अलग-अलग कीमत वसूलने पर रोक लगाते हैं।

भारत में अभी इससे जुड़ा कोई ख़ास कानून नहीं है, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत इसे ‘unfair trade practices’ मानकर चुनौती दी जा सकती है।
खुद को कैसे बचाएं?
सबसे बड़ा हथियार जागरूकता है।अगली बार ख़रीदारी करें तो पुरुषों वाले सेक्शन में भी नज़र डालें। रेज़र, क्रीम या शैंपू में अक्सर एक जैसे प्रोडक्ट सस्ते मिल जाएंगे।

- जेंडर-न्यूट्रल प्रोडक्ट्स चुनें। कई ब्रांड ऐसे हैं जो महिला-पुरुष का भेद नहीं करते।
- शिकायत दर्ज कराएं अगर आपको लगता है कि सिर्फ महिला होने की वजह से आपसे ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं, तो इसके खिलाफ आवाज उठाएं और उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराएं।
पिंक टैक्स सिर्फ पैसे का सवाल नहीं है, ये समानता का सवाल है। ये वो कीमत है जो औरतें सिर्फ औरत होने के कारण चुकाती हैं। इसे पहचानना और इसके खिलाफ आवाज उठाना ही इस भेदभाव को खत्म करने की पहली सीढ़ी है।
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