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कैफ़ अहमद सिद्दीकी: मास्टर साहब बच्चों के दिल के शायर और समाज का आईना

कभी-कभी बड़े शहरों की चकाचौंध से दूर, छोटे कस्बों की ख़ामोशी में ऐसी आवाज़ जन्म लेती है, जो शोर नहीं करती, मगर देर तक सुनाई देती रहती है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर में 1943 में पैदा हुए एहतिशाम अली सिद्दीकी ऐसी ही एक आवाज़ थे। अदबी दुनिया ने उन्हें बाद में कैफ़ अहमद सिद्दीकी के नाम से जाना। 

उनके पास न बड़ी महफ़िलें थीं, न नामवरों की संगत। उनके पास था एक स्कूल, कुछ बच्चे, चॉक से भरा ब्लैकबोर्ड और रात की तन्हाई में खुलती एक डायरी। यही उनकी दुनिया थी। उनकी शायरी किसी शाही दरबार में नहीं पली, बल्कि क्लासरूम की घंटी, बच्चों की शरारत और किताबों की खुशबू के बीच जवान हुई। उन्होंने बहुत जल्दी समझ लिया था कि ज़बान सिर्फ़ बड़े लोगों की चीज़ नहीं होती। बच्चों का भी उस पर उतना ही हक़ है और शायद इसी एहसास ने उन्हें एक ऐसे शायर में ढाल दिया, जो उम्र भर दो काम करता रहा, दिन में पढ़ाता रहा, रात में लिखता रहा।

उर्दू और इतिहास का संगम

कैफ़ साहब ने उर्दू और इतिहास में एम.ए. किया। यानी एक तरफ़ ज़बान, दूसरी तरफ़ वक़्त की समझ। यही दोहरी तालीम उनकी शायरी की पहचान बनी। वे आम ज़िंदगी को ऐसे देखते थे जैसे वह चलती-फिरती तारीख़ हो। हर लम्हा एक दस्तावेज़, हर एहसास एक बयान।

उन्होंने सीतापुर के म्युनिसिपल इंटर कॉलेज में बतौर टीचर नौकरी शुरू की। वे उन शायरों में से नहीं थे जो कभी-कभार पढ़ा लें,  वे सचमुच “मास्टर साहब” थे दिन में क्लास, रात में काग़ज़ और कलम।

मुझे नकल पर भी इतना अगर इख़्तियार होता
कभी फ़ेल इम्तिहान में न मैं बार-बार होता

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

बच्चों की किताबें: दिलचस्प, सदाबहार और तालीमी नज़्में

बहुत कम लोग जानते हैं कि कैफ़ साहब ने सबसे पहले बच्चों के लिए लिखना शुरू किया। उनकी नज़्में मशहूर बच्चों की पत्रिकाओं खिलौना, कलियां, गुंचा और पयाम-ए-तालीम में छपती थीं। इन पतली-सी पत्रिकाओं को पढ़ते हुए न जाने कितने बच्चों ने पहली बार शायरी का स्वाद चखा। उन्हें पता भी नहीं था कि ये अल्फ़ाज़ सीतापुर के एक सादा-मिज़ाज मास्टर साहब के हैं।

‘महसूस हो रहा है कि मैं ख़ुद सफ़र में हूं
जिस दिन से रेल पर मैं तुझे छोड़ने गया’

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

इसमें बच्चों की शरारत भी है और स्कूल की दुनिया का हल्का-फुल्का दर्द भी। उन्होंने बच्चों के लिए चार किताबें लिखी “दिलचस्प नज़्में”, “सदा बहार नज़्में”, “अच्छी नज़्में” और “देनी नज़्में”। इन नामों में ही उनकी सोच झलकती है दिलचस्प भी, हमेशा ताज़ा भी, और तालीम देने वाली भी।

वक़्त के साथ उनकी शायरी का दायरा बढ़ा। उन्होंने बड़ों के लिए भी ग़ज़लें और नज़्में लिखीं। उनकी तीन अहम किताबें हैं “गर्द का दर्द”, “हिसाब लफ़्ज़ लफ़्ज़ का” और “सूरजा की आंख”। इन शीर्षकों में ही समाज की बेचैनी सुनाई देती है। “गर्द” यानी धूल- जो शहरों, रिश्तों और यादों पर जमती रहती है।

“सर्द जज़्बे, बुझे-बुझे चेहरे
जिस्म ज़िंदा हैं, मर गए चेहरे”

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

कैफ़ अहमद सिद्दीकी का जीवन लंबा नहीं था। 1943 में जन्मे और 1986 में इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। महज़ चार दशक। मगर इन चार दशकों में उन्होंने बच्चों और बड़ों दोनों के लिए ऐसा साहित्य छोड़ा, जो आज भी पढ़ा जाता है।

आज के दौर में कैफ़ की अहमियत

आज जब बच्चों का ध्यान मोबाइल स्क्रीन और छोटे वीडियो में उलझा रहता है, कैफ़ साहब की शायरी हमें याद दिलाती है कि बच्चों के लिए लिखना आसान काम नहीं- यह अहम ज़िम्मेदारी है।

‘इक बरस भी अभी नहीं गुज़रा
कितनी जल्दी बदल गए चेहरे’

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

उन्होंने साबित किया कि एक छोटे शहर का शिक्षक भी बड़ी अदबी विरासत छोड़ सकता है। उर्दू की हिफ़ाज़त सिर्फ़ बड़ी यूनिवर्सिटियों से नहीं होती, बल्कि उस मास्टर से भी होती है जो स्कूल के बाद बच्चों के लिए नज़्म लिखता है।

कैफ़ अहमद सिद्दीकी ने कभी शोहरत के पीछे नहीं दौड़ा। उन्होंने बस अपना फ़र्ज़ निभाया पढ़ाना और लिखना। आज भी जब हम उनकी ग़ज़लें पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे सीतापुर की किसी गली में एक मास्टर साहब चॉक और कलम दोनों संभाले खड़े हैं यह कहते हुए कि हर लफ़्ज़ की क़ीमत है, और हर बच्चे का ज़ेहन एक नई दुनिया।

‘आज फिर शाख़ से गिरे पत्ते
और मिट्टी में मिल गए पत्ते’

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

ये भी पढ़ें: कैफ़ भोपाली: ज़िंदगी शायद इसी का नाम है…’ और उनके अंदाज़-ए-बयां की ख़ूबियां

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