पॉटरी (Pottery) सिर्फ़ मिट्टी से बर्तन बनाने का हुनर नहीं है। ये एक ऐसी कला है, जो इंसान को सब्र करना सिखाती है, संतुलन में रहना सिखाती है और ख़ुद से जुड़ने का मौक़ा देती है। वही मिट्टी, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, दरअसल हमें गढ़ती भी है, संभालती भी है और ज़िंदगी के कई सबक सिखाती है। कभी इसी मिट्टी से खिलौने बने, घर बने और कई सभ्यताओं की बुनियाद इसे ने रखी है। आज जब ज़िंदगी मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक सिमटती जा रही है, तब कुछ लोग फिर से उसी मिट्टी की तरफ लौट रहे हैं।
O’ Hen Art : जहां मिट्टी से बनता है रिश्ता
गुवाहाटी के O’ Hen Art स्टूडियो ये सिर्फ़ पॉटरी (Pottery) सीखने की जगह नहीं है, बल्कि खुद को समझने और महसूस करने का एक स्पेस है। यहां पॉटरी (Pottery) को सिर्फ़ एक कला नहीं माना जाता। कोई यहां अपने बचपन की यादें ढूंढता है, तो कोई तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी के बीच कुछ पल का सुकून तलाशता है। O’ Hen Art स्टूडियो में पॉटरी (Pottery) सीख रही हैं सुश्रिता शर्मा। उनके लिए मिट्टी सिर्फ़ एक चीज़ नहीं है। बचपन में मिट्टी उनके लिए खिलौना थी, दोस्त थी और सपनों की दुनिया थी।
सुश्रिता बताती हैं कि आज ज़िंदगी ज़िम्मेदारियों से भरी हुई है, लेकिन मिट्टी उन्हें फिर से उनकी जड़ों से जोड़ रही है। बचपन में जब कंक्रीट की ऊंची इमारतें नहीं थीं, तब मिट्टी से खेलना रोज़ की बात थी। सुश्रिता को सोशल मीडिया के ज़रिए O’ Hen Art स्टूडियो के बारे में पता चला। वो कहती है “पॉटरी (Pottery) इसलिए सीख रही हूं क्योंकि ये नेचर है। ये हमे अपनी मदर अर्थ से जोड़कर रखती हैं और साथ ही स्ट्रेस फ्री करके रखती है।”

टेक्नोलॉजी से दूर, मिट्टी के करीब
आज टेक्नोलॉजी और भागदौड़ के बीच वो एहसास कहीं खो गया था। लेकिन सोशल मीडिया के ज़रिए जब उन्हें O’ Hen Art स्टूडियो के बारे में पता चला, तो उन्होंने कुछ अलग सीखने का फैसला किया। कुछ ऐसा, जो आम नहीं है और जो दिल को खुशी दे। सुश्रिता कहती हैं कि अभी वो इसे सिर्फ़ अपने शौक तक ही रखना चाहती हैं। आगे अगर कोई नया रास्ता खुला, तो वो बाद में सोचेंगी।
मोनालिसा देवनाथ: शांति की तलाश
मोनालिसा देवनाथ की कहानी भी सुश्रिता से मिलती-जुलती है। तेज़ ज़िंदगी, लगातार काम और भीतर का बढ़ता शोर उन्हें पॉटरी (Pottery) की ओर ले आया। मोनालिसा बताती हैं कि वो ज़िंदगी में थोड़ा स्लो होना चाहती थीं। वो खुद के साथ वक़्त बिताना चाहती थीं। मिट्टी के साथ काम करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि जब वो पॉटरी (Pottery) बना रही होती हैं, तो बाहर की दुनिया जैसे थम सी जाती है। ये उनका दूसरा दिन है, लेकिन इस छोटे से सफ़र में ही वो खुद को समझने लगी हैं।

मोनालिसा एक एनजीओ में छोटे बच्चों के साथ काम करती हैं। उनका मानना है कि हाथ से काम करने से बच्चे सबसे बेहतर सीखते हैं। ख़ासतौर पर छोटे बच्चों के लिए मिट्टी एक ऐसा ज़रिया है, जहां वो बिना डर के अपनी बातें कह सकते हैं। मिट्टी के साथ खेलते हुए बच्चे खुलते हैं, अपनी भावनाएं दिखाते हैं और सीखना उनके लिए आसान हो जाता है। इसी वजह से मोनालिसा चाहती हैं कि पॉटरी (Pottery) को वो अपने क्लासरूम का हिस्सा बनाएं।
मेंटोर की सोच: हुनर से पहले इंसान
इस पूरे प्रोसेस के पीछे मेंटोर की भूमिका बहुत अहम होती है। ओहिन आर्ट स्टूडियो में पॉटरी (Pottery) सिखा रहे खैरुल बशर बताते हैं कि यहां सिर्फ़ तकनीक नहीं सिखाई जाती। उनके मुताबिक, बड़े बर्तन बनाने से पहले इंसान ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से छोटी-छोटी चीजें बनाई। बिना किसी भारी औजार के। यहां आज भी वही पुरानी हैंड-बिल्ड पॉटरी (Pottery) सिखाई जाती है, जहां मिट्टी के साथ सिर्फ़ हाथ ही सबसे बड़ा औजार होते हैं। ज़रूरत पड़ने पर छोटे टूल्स भी इस्तेमाल किए जाते हैं, जिन्हें बांस जैसी कुदरती चीज़ों से खुद बनाया जा सकता है।

काली पॉटरी (Pottery) : कुदरती रंग, कुदरती चमक
स्टूडियो में रखे काले रंग के छोटे-छोटे बर्तन हर किसी का ध्यान खींचते हैं। ख़ास बात ये है कि इन पर कोई रंग या केमिकल नहीं लगाया गया है। एक ख़ास तरीके से इन्हें धीमी आंच पर फायर किया जाता है। 24 से 36 घंटे की इस प्रोसेस में धुएं की वजह से मिट्टी का रंग अपने आप काला हो जाता है और उसमें एक अलग ही चमक आ जाती है। ये रंग पूरी तरह कुदरती होता है।
हर उम्र के लिए पॉटरी
O’ Hen Art स्टूडियो में पॉटरी (Pottery) को एक हुनर नहीं, बल्कि एक अनुभव की तरह सिखाया जाता है। यहां मिट्टी को आकार देने से पहले इंसान को खुद को समझने का वक़्त दिया जाता है। इस कला को सीखने के लिए उम्र या पेशे की कोई पाबंदी नहीं है। स्टूडेंट हों, नौकरीपेशा लोग हों, बच्चे हों या पूरा परिवार कोई भी स्टूडियो आ सकता है। स्टूडियो एक दिन, तीन दिन और पांच दिन के सेशन होते हैं, जहां दोस्त और परिवार मिलकर पॉटरी (Pottery) कर सकते हैं।

हज़ारों साल पुरानी, आज भी उतनी ही ज़रूरी
O’ Hen Art स्टूडियो में सिखाई जा रही इस कला को देखकर ये साफ समझ आता है कि हज़ारों साल पुरानी ये कला आज भी उतनी ही ज़रूरी है। क्योंकि आज भी इंसान उतना ही बेचैन है। लोग अलग हैं, सोच अलग है, लेकिन मिट्टी एक है और कला भी एक। कहीं बचपन की यादें हैं, कहीं सुकून की तलाश और कहीं समाज से जुड़ने की चाह। शायद यही वजह है कि आज भी मिट्टी की अहमियत कम नहीं हुई है। यहां मिट्टी सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि इंसान को ख़ुद से मिलाने का ज़रिया बन जाती है।
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