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बनाने वाले तहज़ीब के होते हैं: क्यों सर गंगा राम और सोभा सिंह लुटियंस से कम नहीं?

नए संसद भवन से सर एडविन लुटियंस की मूर्ति हटाने से एक पुराना और असहज सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है, दिल्ली को असल में किसने बनाया? लुटियंस ने नई दिल्ली की नक्शेबंदी ज़रूर की, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन ये वक्त एक ज़रूरी सवाल का भी है, क्या हमने डिज़ाइन करने वाले को ही (Who Built Delhi Lutyens Matrix Punjabi-Builders Untold Story) बनाने वाला मान लिया?

पंजाबी हिंदुओं और सिखों के लिए ख़ासकर उनके लिए जिनके घरानों ने 1947 से पहले लाहौर को जाना और फिर दिल्ली में नई ज़िंदगी बसाई। ये बहस महज़ सियासत नहीं है। ये याददाश्त का मामला है। शहर खोए गए, शहर पाए गए, और पूरी ज़िंदगियां तक्सीम (बंटवारे) के साये में दोबारा खड़ी की गईं। उस तजुर्बे में एक गहरी समझ है। शहर सिर्फ ख्यालों से नहीं बनते। वे मेहनत, हिम्मत, कारोबार और उस ज़हानत से बनते हैं जो नक्शों को पत्थर में तब्दील करती है।

अगर नया संसद परिसर एक यादगार जगह बनना चाहता है, तो उसे तारीख को संकरा नहीं, बल्कि वसीह (विस्तृत) करना होगा।

लुटियंस ने शहर खींचा, पंजाबियों ने बनाया

ये लुटियंस के ख़िलाफ नहीं, बल्कि मुकम्मल तस्वीर के हक में दलील है।


नई दिल्ली सिर्फ सरकारी नक्शों से नहीं उठी। वो इसलिए उठी क्योंकि हिंदुस्तानी कारीगरों और ठेकेदारों ने उसे उस पैमाने पर तामीर किया जिसका ज़िक्र इतिहास में कम होता है।

सरदार सुजान सिंह और उनके बेटे सर सोभा सिंह इस कहानी के सेंटर में हैं। उनका तामीराती इदारा (निर्माण संस्थान) नई दिल्ली के बनने का दूसरा नाम बन गया। सरकारी इमारतें, रिहायशी बस्तियां, अदारे (संस्थान) और राजधानी की रोज़मर्रा की तामीर। सोभा सिंह का नाम ‘बिल्डर ऑफ न्यू दिल्ली’ के तौर पर मशहूर हुआ, मगर बड़े रिवायती बयान में वे लुटियंस के हाशिये पर ही रहे।

हकीकत साफ है, हुकूमतें डिज़ाइन देती हैं, शहर बनाने वाले चाहिए होते हैं।

एक आम गलतफहमी।

लाहौर की मिसाल: सर गंगा राम की बड़ी शख़्सियत

दिल्ली की दास्तान लाहौर तक जाती है, क्योंकि पंजाबी तामीर का जज़्बा यमुना पर नहीं रुका। वो पूरे अविभाजित पंजाब में फला-फूला और इसकी सबसे रोशन मिसाल हैं सर गंगा राम।

अगर सुजान सिंह और सोभा सिंह ने नई दिल्ली की तामीर की, तो गंगा राम एक और बड़े दायरे की नुमाइंदगी करते हैं। इंजीनियर, मुनसरिम (प्रशासक), मेमार (वास्तुकार), सरमायाकार (निवेशक), खैरख्वाह (समाजसेवी) और इस्लाही (सुधारक) सब एक शख्स में। लाहौर उन्हें शहर की जदीद (मॉडर्न) शहरी ज़िंदगी का बुनियादी किरदार मानता है। इसलिए नहीं कि उन्होंने शोहरत का दावा किया, बल्कि इसलिए कि उनकी इमारतें और इदारे लाहौर की पहचान बन गए।

अहम बात ये है कि बंटवारे से पहले जिन लोगों ने हमारे शहर बनाए, वे किसी मुस्तकबिल के मुल्क के लिए नहीं बन रहे थे। वे एक पूरे खित्ते (क्षेत्र) के लिए बना रहे थे। एक साझी तहज़ीबी दुनिया के लिए।

23 फरवरी, 2026 को राष्ट्रपति भवन में सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की नई मूर्ति का उद्घाटन किया गया, जो राजाजी उत्सव के मौके पर है – एक अथक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्र-निर्माता और काबिल एडमिनिस्ट्रेटर को श्रद्धांजलि।

अस्पतालों की दर्दनाक दास्तान

दिल्ली का सर गंगा राम अस्पताल लाखों खानदानों की याददाश्त का हिस्सा है। मगर इसमें एक दर्दनाक मफारकत (विरोधाभास) भी है। दिल्ली का ये अस्पताल उस शख्स की याद है जिसकी मशहूर तरीन इमारतें लाहौर में हैं।

ये तल्ख़ी तक्सीम के एक मशहूर किस्से में और गहरी हो जाती है जो पंजाबी अंदाज़ में सुनाया जाता है। फ़साद के दौरान एक हुजूम गंगा राम की मूर्ति पर हमला करता है, मगर एक हमलावर खुद ज़ख्मी हो जाता है और नफ़रत का नारा एक लम्हे में ज़रूरत की पुकार बन जाता है, ‘सर गंगा राम अस्पताल ले जाओ।’

किस्सा कुछ भी हो, उसकी रूह ये है कि जब जान बचानी हो, तो नज़रिया नहीं, इदारा काम आता है। नफरत निशाना चुन सकती है, मगर शुक्रगुज़ारी बनाने वाले की तरफ लौटती रहती है।

पटियाला: सबूत कि तामीर सरहदें नहीं मानती


पटियाला इस कहानी की मुकम्मल कड़ी है।

लाहौर की शहरी तारीख़ में दाखिल होने से पहले सर गंगा राम का काम पटियाला के शाही शहर तक भी फैला था। वहां के शासकों की सरपरस्ती में उन्होंने अहम इमारतें खड़ी कीं। वे इमारतें जिनसे एक दारुल-हुकूमत (राजधानी) अपनी शिक्षा, इंसाफ और आम ज़िंदगी का इज़हार करता है।

ये इसलिए ज़रूरी है कि गंगा राम को किसी एक शहर या किसी एक मुल्की दास्तान तक महदूद न किया जाए। उनकी कोशिशों का नक्शा पटियाला से लाहौर और वहां से पंजाब की नहर-बस्तियों तक फैला है।

पटियाला, लाहौर और दिल्ली मिलकर एक बात साबित करते हैं जो सियासत को नागवार गुज़रती है,  हुनर का नक्शा और सरहद का नक्शा कभी एक नहीं होते।

पुराना मोती बाग, पटियाला। अब यहां नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स है।

बनाने वाले तहज़ीबी जंगों से ऊपर हैं

लुटियंस की मूर्ति का मसला एक पुराने खेल में तब्दील होने का ख़तरा रखता है। एक मूर्ति हटाओ, दूसरी लगाओ, जीत का एलान करो। मगर असल सबक उलटा है, हमारी यादगार और ज़्यादा खुली होनी चाहिए, तंग नहीं।

लुटियंस का किरदार रिकॉर्ड में है। मगर सुजान सिंह और सोभा सिंह वो हिंदुस्तानी जज़्बे की नुमाइंदगी करते हैं जिसके बिना शाही मंसूबा कभी पूरा नहीं होता। और सर गंगा राम एक और बड़े दायरे की बात करते हैं, वो तहज़ीबी मेमार जिसके इदारे न सिर्फ साम्राज्य के खत्म होने पर, बल्कि तक्सीम की तबाही पर भी कायम रहे।

अगर हम यादों को ज़ीरो-सम गेम बना दें, तो हम तारीख़ के साथ ज़ुल्म करते हैं। शहर एक नाम, एक कौम या एक नज़रिये से नहीं बनते। वे मिलकर बनते हैं, नस्ल, तबके और मज़हब को पार करके।

लाहौर म्यूज़ियम और सर गंगा राम। उनकी ‘समाधि’ हाल ही में पाकिस्तानी अधिकारियों ने खोली है।

आख़िरी बात: बनाने वाले तहज़ीब के हैं

सबसे ज़रूरी बात सबसे सादा है, असली ख़ालिक (रचयिता) क़ौमियत और मज़हब से ऊपर होते हैं।

अस्पताल मरीज़ का मज़हब नहीं पूछता। मदरसा नसब (वंश) नहीं मांगता। अदालत पासपोर्ट नहीं देखती। जब कोई इमारत रोज़ाना की ज़िंदगी में दाख़िल हो जाती है, तो वो एक नई शहरियत हासिल कर लेती है। उसके इस्तेमाल करने वालों की।

माडल टाउन अपने रहने वालों का है। सर गंगा राम हस्पताल अपने मरीज़ों का है। नई दिल्ली उन लाखों लोगों की है जो उसकी सड़कों पर चलते हैं।

तो हां,  लुटियंस को याद करो, क्योंकि तारीख़ मिटाई नहीं जानी चाहिए। मगर सुजान सिंह और सोभा सिंह को भी याद करो, क्योंकि शहर वे बनाते हैं जो तामीर करते हैं। और सर गंगा राम को याद करो, क्योंकि उनकी ईंट-पत्थर की मुहब्बत उन नफ़रतों से बच निकली जिन्होंने उन्हें मिटाने की कोशिश की।

मूर्तियां मिटती हैं। बनाने वाले बाकी रहते हैं। और दिल्ली, लाहौर और पटियाला के मेमार किसी तंग कौमपरस्ती की बहस में नहीं, बल्कि पंजाब और हिंदुस्तान की साझी तहज़ीबी याददाश्त में जगह के हकदार हैं। उन लोगों की याददाश्त में भी जो घर की तस्वीर में लाहौर को, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिल्ली को, और विरासत के फख्र में पटियाला को साथ लिए चलते हैं।

यह लेख मूल रूप से लेखक के पर्सनल ब्लॉग, द KBS क्रॉनिकल पर पब्लिश हुआ था। ओरिजिनल आर्टिकल को English में क्लिक करके पढ़े

ये भी पढ़ें: Lady Meherbai Tata: बाल विवाह के ख़िलाफ जंग से लेकर साड़ी पहन टेनिस जीतने वाली ‘Brand Ambassador’ ऑफ इंडिया

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KBS Sidhu
KBS Sidhu
केबीएस सिद्धू, IAS (रिटायर्ड), पंजाब सरकार में स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के तौर पर काम कर चुके हैं। वे द केबीएस क्रॉनिकल के एडिटर-इन-चीफ हैं, जो गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी, हाई-टेक और स्ट्रेटेजिक मामलों पर इंडिपेंडेंट कमेंट्री देने वाला एक डेली न्यूज़लेटर है।

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