उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होती, बल्कि एक एहसास बन जाती है। उबैदुल्लाह अलीम भी ऐसे ही शायरों में से एक थे। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, जुदाई, उम्मीद और ज़िंदगी के कड़वे-मीठे तजुर्बों की गहरी झलक मिलती है।
उबैदुल्लाह अलीम की पैदाइश 1939 में भोपाल में हुई। उनके घर का माहौल इल्म और अदब से भरा हुआ था। कहा जाता है कि उनके ख़ानदान की जड़ें कश्मीर से जुड़ी थीं। लेकिन 1947 के बंटवारे ने लाखों लोगों की तरह उनकी ज़िंदगी का रास्ता भी बदल दिया। उनका परिवार पाकिस्तान चला गया और कराची में बस गया। एक तरह से बचपन में ही उन्हें अपने पहले घर से जुदाई का दर्द मिल गया, और शायद यही दर्द आगे चलकर उनकी शायरी में भी झलकता रहा।
कराची में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें शायरी से गहरा लगाव हो गया। वे कम बोलने वाले, लेकिन गहरी सोच रखने वाले इंसान थे। उनके दोस्त कहते थे कि अलीम साहब आम बातों में भी एक अलग तरह की खूबसूरती तलाश कर लेते थे।
उनकी शायरी का अंदाज़ बहुत सादा लेकिन दिल को छू लेने वाला था। उनकी मशहूर ग़ज़लों में से एक शेर है
अज़ीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
इस शेर में मोहब्बत की नाज़ुक हदों को बहुत ख़ूबसूरती से बयान किया गया है। उबैदुल्लाह अलीम ने अपने करियर की शुरुआत रेडियो से की। बाद में वे पाकिस्तान टेलीविज़न से जुड़ गए और वहां बतौर प्रोड्यूसर काम किया। इसी दौर में उनकी शायरी भी धीरे-धीरे लोगों तक पहुंचने लगी।
1974 में उनका पहला शायरी संग्रह “चांद चेहरा सितारा आंखें” प्रकाशित हुआ। इस किताब ने उन्हें रातों-रात उर्दू अदब में मशहूर कर दिया। इस किताब के लिए उन्हें पाकिस्तान का प्रतिष्ठित आदमजी अवॉर्ड भी मिला, जो वहां का बड़ा साहित्यिक सम्मान माना जाता है।
उनकी ग़ज़लें सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि मशहूर ग़ज़ल गायकों ने भी उन्हें अपनी आवाज़ दी। मेहदी हसन, फ़रीदा ख़ानम और नूरजहां जैसे गायकों ने उनके कलाम को गाया, जिससे उनकी शायरी और भी लोकप्रिय हो गई।
उनका एक और बेहद मशहूर शेर है
आंख से दूर सही दिल से कहां जाएगा
जाने वाले तू हमें याद बहुत आएगा
यह शेर आज भी महफ़िलों और मुशायरों में बड़े शौक से पढ़ा जाता है।
लेकिन ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। 1978 में पाकिस्तान में जनरल ज़िया-उल-हक़ के दौर में धार्मिक सख़्ती बढ़ गई। चूंकि उबैदुल्लाह अलीम अहमदिया समुदाय से ताल्लुक रखते थे, इसलिए उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी हुआ और उन्हें पाकिस्तान टेलीविज़न से इस्तीफ़ा देना पड़ा। यह दौर उनकी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल वक़्त था।
लेकिन उन्होंने इन मुश्किलों को अपनी शायरी की ताक़त बना लिया। 1986 में उनका दूसरा संग्रह “वीरान सराय का दिया” प्रकाशित हुआ। इस किताब में उनके दिल का दर्द और तजुर्बे साफ़ झलकते हैं।
ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए
तो आसमान से उतरा ख़ुदा हमारे लिए
कुछ समय के लिए वे इंग्लैंड भी गए, लेकिन उनका दिल हमेशा कराची में ही रहा। आख़िरकार वे वापस पाकिस्तान लौट आए।
1998 में दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया। लेकिन शायरों की ख़ासियत यही होती है कि वे अपने अल्फ़ाज़ में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
उबैदुल्लाह अलीम की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी और सच्चाई है। उनके अल्फ़ाज़ सीधे दिल में उतर जाते हैं। वे मोहब्बत की बात भी करते हैं, तन्हाई की भी, और ज़िंदगी की सच्चाइयों की भी।
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूं
काश तुझ को भी इक झलक देखूं
आज भी उनकी ग़ज़लें नई पीढ़ी के दिलों में अपनी जगह बना रही हैं। उबैदुल्लाह अलीम की शायरी हमें यह सिखाती है कि सच्चे जज़्बात कभी पुराने नहीं होते। वक़्त बदलता है, लेकिन दिल की बातें वही रहती हैं।
यही वजह है कि उबैदुल्लाह अलीम आज भी उर्दू अदब के उन शायरों में गिने जाते हैं जिनके अल्फ़ाज़ महज़ शायरी नहीं, बल्कि ज़िंदगी का एहसास बन जाते हैं।
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