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उर्दू मर्सिए को नई बुलंदी देने वाले मिर्ज़ा सलामत अली दबीर की दिलचस्प दास्तान

उर्दू अदब की दुनिया में जब भी मर्सिया निगारी का ज़िक्र होता है, तो दो नाम सबसे पहले ज़ेहन में आते हैं  मिर्ज़ा सलामत अली दबीर और मीर अनीस। इन दोनों शायरों ने सिर्फ़ मर्सिया नहीं लिखा, बल्कि करबला की दास्तान को ऐसे लफ़्ज़ दिए कि सदियों बाद भी उनके अशआर दिलों को हिला देते हैं। मिर्ज़ा सलामत अली दबीर उन शायरों में थे, जिनकी शायरी में जज़्बात, दर्द, बहादुरी और रूहानियत एक साथ दिखाई देती है।

मिर्ज़ा सलामत अली दबीर की पैदाइश सन 1803 में दिल्ली में हुयी। उनके वालिद का नाम मिर्ज़ा ग़ुलाम हुसैन बताया जाता है। बचपन से ही उन्हें मजलिसों और मर्सियों से गहरा लगाव था। मुहर्रम की महफ़िलों में बैठकर वे मरसिए सुनते और पढ़ते थे। यही शौक आगे चलकर उनकी पहचान बन गया। उन्होंने मशहूर मर्सिया-गो मीर मुज़फ़्फ़र हुसैन ज़मीर से इस्लाह ली और शायरी की बारीकियां सीखीं।

बाद में मिर्ज़ा सलामत अली दबीर दिल्ली से लखनऊ आ गए। उस दौर में लखनऊ उर्दू अदब और शायरी का बड़ा मरकज़ माना जाता था। यहां उन्हें अपने हुनर को निखारने का बेहतरीन माहौल मिला। उनकी शायरी में सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की खूबसूरती नहीं थी, बल्कि करबला का दर्द और हज़रत इमाम हुसैन की अज़मत भी साफ़ महसूस होती थी।

उनका मशहूर शेर आज भी मुहर्रम की मजलिसों में पढ़ा जाता है।

“किस शेर की आमद है कि रन कांप रहा है
रुस्तम का जिगर ज़ेर-ए-कफ़न कांप रहा है”

इस शेर में मिर्ज़ा सलामत अली दबीर ने इमाम हुसैन के लश्कर की शुजाअत को इस अंदाज़ में बयान किया कि मैदान-ए-जंग तक कांप उठता है। “रुस्तम” जैसे बहादुर का जिगर भी दहल जाए  यह तश्बीह उनकी शायरी की ताक़त दिखाती है।

“शमशीर-बकफ़ देख के हैदर के पिसर को
जिब्रील लरज़ते हैं समेटे हुए पर को”

मिर्ज़ा सलामत अली दबीर ने हज़रत अली के बेटे इमाम हुसैन की बहादुरी को इतनी बुलंदी से पेश किया कि फ़रिश्ते भी हैरत में दिखाई देते हैं। यही वह अंदाज़ था जिसने दबीर को मरसिया निगारी का बादशाह बना दिया।

दबीर सिर्फ़ मर्सिए तक सीमित नहीं थे। उन्होंने सलाम, नौहा और रुबाइयां भी लिखीं। उनका एक मशहूर सलाम का शेर देखिए—

“हुर्र फ़िदा प्यासा जो शाह पर हो गया
ऐ सलामी, क़तरा था समंदर हो गया”

इस शेर में कुर्बानी और वफ़ादारी का ऐसा जज़्बा है, जो सीधे दिल में उतर जाता है। दबीर की यही ख़ासियत थी कि वे छोटे से जुमले में बहुत बड़ा मतलब पैदा कर देते थे।

उनकी शायरी में इल्म और फ़लसफ़ा भी नज़र आता है। वे सिर्फ़ जज़्बाती शायर नहीं थे, बल्कि अपने दौर के बड़े आलिम भी माने जाते थे। कहा जाता है कि उन्होंने तीन हज़ार से ज़्यादा मर्सिए लिखे। उनकी एक मशहूर “बे-नुक़्ता” मरसिया भी थी, जिसमें बिना नुक्तों वाले हुरूफ़ का इस्तेमाल किया गया था। यह उनकी ज़बान पर पकड़ और फ़नकारी की मिसाल मानी जाती है।

मिर्ज़ा सलामत अली दबीर और मीर अनीस की रक़ाबत उर्दू अदब की सबसे मशहूर अदबी रक़ाबतों में गिनी जाती है। लोग दो हिस्सों में बंट गए थे  “अनीसिया” और “दबीरिया”। मगर दिलचस्प बात यह है कि दोनों शायर एक-दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते थे। जब मीर अनीस का इंतिक़ाल हुआ तो दबीर ने उनके लिए यह शेर कहा—

“आसमां बे माह-ए-कामिल, सिदरा बे रूहुल अमीन
तूर-ए-सीना बे कलीमुल्लाह, मिम्बर बे अनीस”

इस शेर में मिर्ज़ा सलामत अली दबीर ने अनीस की कमी को ऐसे बयान किया जैसे आसमान चांद के बिना अधूरा हो गया हो।

मिर्ज़ा दबीर का इंतिक़ाल 1875 में लखनऊ में हुआ, मगर उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है। उर्दू मर्सिया का ज़िक्र दबीर और अनीस के बिना मुकम्मल नहीं माना जाता। उन्होंने सिर्फ़ शायरी नहीं की, बल्कि करबला के पैग़ाम को ऐसी ज़बान दी, जो इंसानियत, सब्र, वफ़ा और कुर्बानी का सबक देती है।

उनके अशआर आज भी मजलिसों में गूंजते हैं और सुनने वालों के दिलों में एक अजीब कैफ़ियत पैदा कर देते हैं। यही किसी बड़े शायर की असली पहचान होती है।

ये भी पढ़ें: वहीद जहां बेग़म: तालीम के ज़रिए समाज बदलने वाली शख़्सियत

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