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मुरझाते फूलों से खिली कामयाबी: ‘The Flower Lady of Manipur’ चोखोने कृचेना ने फूलों के कचरे को बिज़नेस में बदला  

ये कहानी है उस लड़की की, जिसने परेशानी को मौका में बदल दिया। साल था 2020 और कोरोना महामारी की वजह से पूरा देश में  लॉकडाउन  लगा था। मणिपुर के सुदूर पहाड़ी गांव माओ में किसान परेशान थेय़ उनके खेतों में लगे खूबसूरत फूल सड़ रहे थे। फूलों को बाहर भेजने के लिए न कोई गाड़ी थी और न ही कोई रास्ता। तभी वहां की रहने वाली एक पढ़ी-लिखी लड़की ने कुछ अलग करने की ठानी। ये कहानी है चोखोने कृचेना (Chokhone Krichena) की, जिन्हें आज पूरा देश ‘The Flower Lady of Manipur’ के नाम से जानता है।

दादी के नुस्खे और वैज्ञानिक सोच का संगम

32 साल की चोखोने ने जब लॉकडाउन में फूलों को बर्बाद होते देखा, तो उन्होंने इसे एक मौके की तरह लिया। उनके पास बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) की डिग्री भी थी और दादी-नानी के वो पुराने नुस्खे भी याद थे, जब फूलों और सब्जियों को बिना केमिकल के लंबे समय तक सुखाकर रखा जाता था। उन्होंने घर पर ही एक्सपेरिमेंट शुरू कर दिए। फूलों को उल्टा लटकाकर हवा में सुखाना, उनके रंग और आकार को बरकरार रखना, ये उनकी तपस्या थी। 

यही प्रयोग आगे चलकर Dianthe Pvt Ltd’ की नींव बना। आज ये कंपनी ड्राई फ्लावर (सूखे फूल) से ऐसे प्रोडक्ट  बनाती है, जो न सिर्फ खूबसूरत हैं, बल्कि प्लास्टिक के ऑर्नामेंट्स का बेहतरीन ऑप्शन भी हैं। गुलदस्ते से लेकर शादी के सजावटी सामान और मोमबत्तियों में सूखी पंखुड़ियां डालकर प्रोडक्ट्स ने बाजार में एक नई पहचान बनाई। 

प्रधानमंत्री ने की तारीफ, किसानों की बदली किस्मत

चोखोने की इस मुहिम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।  पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उनके काम की जमकर सराहना की। उन्होंने बताया कि कैसे चोखोने सेनापति जिले की महिला किसानों को जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं, लेकिन ये राह इतनी आसान नहीं थी।

जब अपनों ने ही समझा पागलपन

जब चोखोने ने ये काम शुरू किया, तो परिवार और पड़ोसियों ने उन्हें समझाया कि “बायोटेक्नोलॉजी पढ़कर फूलों में क्यों मरना? कोई अच्छी सरकारी नौकरी ढूंढो.” लेकिन चोखोने ने अपने फैसले पर अडिग रहकर किसानों को 50-50 फूल के पौधे बांटे और वादा किया कि वो उनके सारे फूल खरीदेगी। उन्होंने सब्जियों से तीन गुना ज्यादा दाम दिए। नतीजा? आज 200 से ज्यादा किसान (जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं) उनसे जुड़े हैं। 52 साल की एस्तेर चिसवुटे जैसी किसान, जो 2005 से फूल उगा रही हैं, आज उनके नेटवर्क से देश भर में अपने उत्पाद बेच रही हैं। 

पहाड़ों की मुश्किलें और अनोखा समाधान

माओ के पहाड़ी इलाके में पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। फूलों की खेती के लिए सिंचाई जरूरी है। इसके अलावा, दूरदराज के इलाके से शिपिंग करना और कुशल श्रमिकों की कमी भी परेशान करती है। यही वजह है कि चोखोने ने केमिकल-फ्री तकनीक चुनी। वो सिर्फ उन्हीं फूलों को सुखाती हैं, जो मणिपुर की जलवायु में पनपते हैं और अपना रंग बरकरार रखते हैं। जैसे स्टैटिस, बन्नी टेल्स, सेलोसिया और एडलवाइस डेज़ी. इनमें डाई भी सब्जियों और फलों से निकाले गए नेचुरल रंगों से ही की जाती है। 

आर्थिक ताकत और भविष्य का सपना

आज दिएंथे का सालाना टर्नओवर 12 लाख रुपये है. ये कंपनी पांच लोगों को सीधा रोजगार देती है और 200 किसानों की आजीविका चला रही है। चोखोने को उनके इस इनोवेशन के लिए आरकेवीवाई रफ्तार ग्रांट से तीन लाख रुपये और क्लाइमेट इनोवेशन अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

चोखोने अब और बड़ा सपना देख रही हैं, बेहतर ड्राइंग टेक्नोलॉजी और क्वालिटी कंट्रोल के साथ इस मॉडल को दूसरे पहाड़ी राज्यों तक पहुंचाना। वो साबित कर रही हैं कि अगर स्थानीय संसाधनों को साइंस और मार्केट की समझ से जोड़ दिया जाए, तो पहाड़ों का इलाका भी आर्थिक तरक्की का केंद्र बन सकता है। मुरझाते फूल अब माओ की पहचान बन चुके हैं, और चोखोने कृचेना उस पहचान की ‘फूल वाली दीदी’। 

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

ये भी पढ़ें:  5000 साल पुराना पंजाब: हड़प्पा के उस पार की अनकही दास्तान

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