Fatima Bano भोपाल की इस बेटी का नाम आज सिर्फ़ एक खिलाड़ी के तौर पर नहीं, बल्कि हौसले, जज़्बे और लगन की ऐसी मिसाल के रूप में लिया जाता है जिसने मुश्किल हालात में भी अपने सपनों का रास्ता खुद बनाया। साल 1997 में 68 किलोग्राम वेट कैटेगरी में अपना पहला गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपनी पहचान बनाई। इसके बाद भी उनका सफ़र यही नहीं रुका। साल 2001 में वो मध्य प्रदेश की पहली महिला बनी, जिन्हें विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। कभी जूडो में 14 मेडल जीतने वाली Fatima Bano आज सैकड़ों बच्चों के ख़्वाबों को नई उड़ान दे रही हैं। उनके लिए कुश्ती सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि एक ऐसा ज़रिया है जो बच्चों को भरोसा, पहचान और बेहतर मुस्तक़बिल देता है।
भोपाल की तंग गलियों और पुराने मकानों के बीच एक ऐसी जगह है, जहां हर सुबह मिट्टी की खुशबू, पसीने की चमक और सपनों की परवाज़ एक साथ नज़र आती है। ये जगह है गप्पू उस्ताद अखाड़ा, जो करीब सौ साल पुराना है और आज भी उसी जुनून के साथ नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार कर रहा है।
इस अखाड़े की मिट्टी में सिर्फ़ कुश्ती की रवायत ही नहीं, बल्कि बराबरी और हिम्मत की एक गहरी दास्तान भी दबी हुई है। पिछले करीब तीन दशकों से यहां लड़के और लड़कियां एक साथ कुश्ती की ट्रेनिंग लेते हैं। यही वजह है कि ये अखाड़ा सिर्फ़ खेल का मैदान नहीं, बल्कि समाज में बदलते हुए नज़रिए की एक ख़ूबसूरत मिसाल भी बन गया है।
जब भारत में महिला कुश्ती की शुरुआत हुई
Fatima Bano बताती हैं कि उनका कुश्ती का सफ़र उस दौर में शुरू हुआ, जब भारत में महिला कुश्ती की शुरुआत हो रही थी। उस समय बहुत कम लोग ये जानते थे कि लड़कियां भी इस खेल में अपना मुकाम बना सकती हैं। साल 1997 भारतीय खेल इतिहास में एक अहम मोड़ बनकर आया। इसी साल पहली बार महिलाओं के लिए नेशनल रेसलिंग चैंपियनशिप आयोजित हुई। उस प्रतियोगिता में Fatima Bano ने हिस्सा लिया और अपने पहले ही मुकाबले में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

वो उस लम्हे को याद करते हुए कहती हैं कि उस वक्त ये खेल बिल्कुल नया था। लोगों के लिए ये सोच पाना भी मुश्किल था कि कोई लड़की अखाड़े में उतरकर कुश्ती खेलेगी। लेकिन उसी प्रतियोगिता ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि शायद यही खेल उनकी असली पहचान बन सकता है। उनका कहना है कि जब उन्होंने गोल्ड मेडल जीता, तो सिर्फ़ एक खिलाड़ी की जीत नहीं थी, बल्कि ये उस सोच की भी जीत थी जो लड़कियों को खेलों से दूर रखने की कोशिश करती थी।
जूडो से कुश्ती तक का सफ़र
कुश्ती में आने से पहले Fatima Bano जूडो की खिलाड़ी थी और इस खेल में उन्होंने करीब 14 मेडल अपने नाम किए थे। वो बताती हैं कि जूडो और कुश्ती के बीच काफ़ी समानता होती है। दोनों खेलों में ताक़त, बैलेंस और तकनीक का बहुत अहम किरदार होता है। शायद यही वजह थी कि जब उन्होंने कुश्ती की शुरुआत की, तो उन्हें इसे समझने और सीखने में ज़्यादा मुश्किल नहीं हुई। उनके कोच ने उन्हें कुश्ती के दांव-पेच, पकड़ और तकनीकें सिखाई। धीरे-धीरे ये खेल उनके दिल के क़रीब होता चला गया।
शुरुआत में वो अपने सेंटर में अभ्यास करती थी, लेकिन बाद में इसी अखाड़े में आने लगी। यही वो जगह थी जहां उनकी असली पहलवानी की बुनियाद पड़ी। मिट्टी के उस अखाड़े में गिरना, उठना, फिर गिरकर दोबारा खड़ा होना यही उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन गया। शायद वही मिट्टी थी जिसने उनके अंदर वो हौसला पैदा किया जो आगे चलकर उन्हें एक बड़ी खिलाड़ी बनाने वाला था।
खिलाड़ी से कोच बनने तक का सफ़र
Fatima Bano ने अपने खेल को और बेहतर बनाने के लिए पटियाला से साल 2002-03 बैच में रेसलिंग का डिप्लोमा किया। इसके बाद साल 2004 में उन्होंने मध्य प्रदेश खेल विभाग में नौकरी शुरू की। करीब बारह साल तक उन्होंने वहां काम किया और कई खिलाड़ियों को तैयार किया। लेकिन उनके दिल में हमेशा अखाड़े की मिट्टी के लिए एक अलग ही मोहब्बत रही। वो बताती है कि नौकरी के दौरान भी उनका मन हमेशा खिलाड़ियों के बीच रहता था। उन्हें लगता था कि अगर वो अपना पूरा समय अखाड़े को दें, तो ज़्यादा बच्चों को बेहतर ट्रेनिंग दे सकती हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने 2016 में नौकरी छोड़ने का बड़ा फैसला किया और अपना पूरा समय गप्पू उस्ताद अखाड़े को देने लगी। उनका मानना है कि अगर खिलाड़ियों को सही माहौल और सही रहनुमाई मिल जाए, तो छोटे शहरों और साधारण घरों से आने वाले बच्चे भी बड़े मुकाम तक पहुच सकते हैं।

जब कुश्ती के लिए परिवार को नहीं बताया
आज जिस खेल में फ़ातिमा बानो ने अपनी पहचान बनाई, उसी खेल को शुरू करते वक़्त उन्हें अपने ही घर वालों से ये बात छुपानी पड़ी थी। वो बताती है कि शुरुआत में उन्होंने अपने मम्मी-पापा को नहीं बताया कि वो कुश्ती खेल रही हैं। घर वालों को लगता था कि वो जूडो की प्रैक्टिस कर रही है। दरअसल जूडो और कुश्ती की ड्रेस में काफ़ी फ़र्क होता है, इसलिए उन्होंने ये बात कुछ समय तक घर से छुपाकर रखी।
लेकिन सच ज़्यादा दिन तक छुप नहीं सका। जब नेशनल चैंपियनशिप में उनका मेडल आया और अख़बार में उनकी तस्वीर के साथ ख़बर छपी, तब परिवार को पूरी सच्चाई पता चली। पहले तो घर वालों को ये बात अच्छी नहीं लगी। उन्हें लगा कि कुश्ती लड़कियों के लिए ठीक खेल नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे Fatima Bano ने उन्हें समझाया कि ये भी एक खेल है और इसमें भी इज़्ज़त और करियर बनाया जा सकता है। आख़िरकार परिवार ने उनका साथ देना शुरू कर दिया।
एक मुस्लिम लड़की के लिए चुनौतियां
Fatima Bano का बचपन भोपाल की न्यू सिटी में गुज़रा, लेकिन पुराने शहर के माहौल में लड़कियों के लिए खेलों में जाना हमेशा आसान नहीं रहा। वो कहती है कि एक मुस्लिम लड़की होने के नाते उन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों को अक्सर ये बात अजीब लगती थी कि एक लड़की कुश्ती खेल रही है। कई बार लोगों ने सवाल उठाए, तंज कसे और एतराज़ भी किया।
लेकिन ऐसे वक्त में उनके जीजा जी और परिवार के कुछ लोगों ने उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने लोगों से कहा कि अगर लड़की खेलना चाहती है, तो उसे खेलने दो। किसी के कपड़ों या खेल से समाज को क्या परेशानी हो सकती है। धीरे-धीरे लोगों का नज़रिया बदलने लगा। वही लोग जो पहले सवाल उठाते थे, बाद में उनकी कामयाबी पर गर्व महसूस करने लगे।

अखाड़े की शुरुआत इमली के पेड़ के नीचे
Fatima Bano के शौहर शाकिर नूर भी रेसलिंग कोच हैं और गप्पू उस्ताद अखाड़े से कई दशकों से जुड़े हुए हैं। वो बताते हैं कि पहले इस अखाड़े को “नलिया” के नाम से जाना जाता था। यहां एक बड़ा इमली का पेड़ हुआ करता था और उसी के नीचे से इस अखाड़े की शुरुआत हुई थी। उस वक्त ये इलाका बिल्कुल सुनसान था। चारों तरफ झाड़ियां और वीरान ज़मीन थी। लेकिन धीरे-धीरे मेहनत और लगन से इसे एक बेहतर ट्रेनिंग सेंटर में बदल दिया गया।
साल 1998 में इसका रजिस्ट्रेशन कराया गया और इसे नाम दिया गया गप्पू उस्ताद अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल। आज ये अखाड़ा भोपाल के उन अहम खेल सेंटर में शामिल हो चुका है जहां से कई खिलाड़ी नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंचे हैं।
जब लड़कियों के लिए चेंजिंग रूम भी नहीं था
Fatima Bano याद करती हैं कि जब उन्होंने कुश्ती शुरू की थी, तब हालात आज जैसे नहीं थे। नेशनल प्रतियोगिताओं में सैकड़ों खिलाड़ी होते थे, लेकिन लड़कियों के लिए अलग चेंजिंग रूम तक नहीं होते थे। बस एक टेंट लगा दिया जाता था और उसी में कपड़े बदलने पड़ते थे। ऐसे माहौल में मुकाबले की तैयारी करना लड़कियों के लिए आसान नहीं था। लेकिन इन मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। वो कहती हैं कि अगर उस वक्त उन्होंने हार मान ली होती, तो शायद आज वो यहां तक नहीं पहुंच पाती।

अखाड़े से निकलकर बने कई चैंपियन
गप्पू उस्ताद अखाड़ा सिर्फ़ एक ट्रेनिंग सेंटर नहीं, बल्कि प्रतिभाओं की एक ऐसी पाठशाला है जहां से कई खिलाड़ी निकलकर नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक पहुंचे हैं। इनमें से कई खिलाड़ी आज आईटीबीपी, एसएसबी, बीएसएफ, सीआरपीएफ और मध्य प्रदेश पुलिस जैसी सरकारी सेवाओं में काम कर रहे हैं। Fatima Bano कहती हैं कि जब वो अपने स्टूडेंट्स को इस मुकाम पर देखती हैं, तो उन्हें सबसे ज़्यादा खुशी मिलती है। उनके लिए ये सिर्फ़ खिलाड़ियों की कामयाबी नहीं, बल्कि उस मेहनत का नतीजा है जो सालों से इस अखाड़े की मिट्टी में बहाई जा रही है।
अखाड़े की बेटियां भी पीछे नहीं
इस अखाड़े की खिलाड़ी काजल सोनी बताती हैं कि उन्होंने 2023 में यहां प्रैक्टिस शुरू की थी। आज वो तीन ऑल इंडिया टूर्नामेंट खेल चुकी हैं और नेशनल लेवल पर मध्य प्रदेश को रिप्रेंज़ेंट भी कर चुकी हैं। वो कहती हैं कि कुश्ती ने उन्हें सिर्फ़ शारीरिक तौर पर मज़बूत नहीं बनाया, बल्कि उन्हें समाज में एक नई पहचान भी दी है।
अखाड़े की एक और खिलाड़ी भावना वाल्मीकी बताती है कि शुरुआत में ये खेल उन्हें बहुत कठिन लगता था। लेकिन फ़ातिमा मैम की ट्रेनिंग और रहनुमाई से धीरे-धीरे उनका भरोसा बढ़ता गया। हाल ही में उन्होंने सीनियर स्टेट चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता। एक बार टूर्नामेंट के दौरान चोट लगने के बाद उन्हें लगा कि शायद अब वो कुश्ती नहीं खेल पाएंगी। लेकिन उसी वक्त Fatima मैम ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें फिर से खड़े होने की ताक़त दी।

बदलते नियम और बदलता दौर
Fatima Bano बताती हैं कि समय के साथ कुश्ती के नियमों में भी काफ़ी बदलाव आए हैं। उनके समय में एक मुकाबले में पांच मिनट का एक राउंड होता था। बाद में नियम बदले और दो-दो मिनट के दो राउंड होने लगे। आज के समय में एक मुकाबले में तीन-तीन मिनट के दो राउंड होते हैं और उनके बीच तीस सेकंड का आराम मिलता है। सिर्फ़ नियम ही नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाएं भी पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा बेहतर हो चुकी हैं।
एक सपना अभी बाकी है
Fatima Bano का सपना सिर्फ़ खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देना नहीं है। वो चाहती है कि उनके स्टूडेंट्स ओलंपिक तक पहुंचें और देश के लिए मेडल जीतें। हालांकि इसके लिए बेहतर सुविधाओं की ज़रूरत है। फिलहाल अखाड़े में जगह और मेट की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। वो कहती हैं कि अगर सरकार थोड़ा सहयोग करे और जगह बढ़ा दे, तो यहां नेशनल और इंटरनेशनल लेवल की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा सकती हैं।
उनका भरोसा है कि अगर बच्चों को सही ट्रेनिंग, बेहतर सुविधाएं और हौसला मिलता रहे, तो इसी अखाड़े की मिट्टी से आने वाले दिनों में ऐसे खिलाड़ी निकलेंगे जो दुनिया के बड़े मंचों पर भारत का नाम रोशन करेंगे। और शायद उसी दिन Fatima Bano का वो ख़्वाब भी पूरा होगा, जिसे वो बरसों से अपने दिल में संजोए हुए हैं।
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