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मनुष्य बनने की राह – बिस्मिल्लाह की शहनाई

बिस्मिल्लाह खान जीवन भर तीन चीज़ों को अपने सीने से चिपटाए रहे- गंगा, बनारस और उनके जन्म का स्थान बिहार का डुमरांव क़स्बा. कोई कहता खां साब चलिए आपके लिए अमेरिका में म्यूजिक स्कूल खोल देते हैं, कोई कहता दिल्ली-बंबई में चल कर रहा जाय, कुछ माल बनाया जाय. वे बालसुलभ भोलेपन में अगले की आँखों में आँखें डाल कर कहते, “अमाँ यार! गंगा से अलग रहने को तो न कहो!”

शहनाई उनके होंठो से लगते ही आसपास की हवा को प्रेम और करुणा से सराबोर कर देती थी. वह उनकी आत्मा की पाक ज़ुबान थी जिसका होना आसपास के कंकड़-पत्थरों तक की स्मृतियों में दर्ज हो जाता होगा. उस दैवीय स्वर को गंगा किनारे की उस मस्जिद के किसी कंगूरे की नन्ही ढलान में अब भी ढूँढा जा सकता है जहाँ वे हर रोज गंगास्नान के बाद नमाज पढ़ते थे.

उसकी लरज़ को बालाजी मंदिर के फर्श के उन चकले पत्थरों की खुरदरी छुअन में महसूस किया जा सकता है जिन पर बैठकर उन्होंने पचास से भी ज्यादा सालों तक रियाज़ किया.

और बनारस वह शहर था जहाँ उन्होंने अपना लड़कपन गुज़ारा था और उसी दौरान अपने परिवार के बड़ों से शहनाई की तालीम ली. आधिकारिक रूप से शहनाई सीखने की शुरुआत जिसे गंडा बंधाना कहते हैं, उन्होंने उस्ताद अली बख्श से की जो काशी विश्वनाथ मंदिर में बरसों से शहनाई बजाते आ रहे थे. इसी नगर के मंदिरों में खुद बिस्मिल्लाह खान के पूर्वजों ने पीढ़ियों तक यही काम किया था. बनारस से उनका सम्बन्ध बेहद अन्तरंग था. वे कहते थे, “अगर कोई मुझसे मिलने की इच्छा रखता है तो उसे बनारस आना होगा. कोई राजा हो चाहे महाराजा, मैं उससे मिलने कहीं नहीं जाऊँगा.”  

Bismillah Khan
बिस्मिल्लाह खान (तस्वीर साभार: Wikimedia)

जिन दिनों बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई बजाना शुरू किया, इस वाद्य को शास्त्रीय संगीत के संसार में कोई बड़ा मुकाम हासिल न था और उन्हें बजाने वाले शादी-पूजा तक महदूद रहने वाले दोयम कलाकार गिने जाते थे. लेकिन शहनाई को बिस्मिल्लाह ने अपनी महबूबा बनाकर रखा और उसके साथ तमाम तरह के शास्त्रीय और आधुनिक प्रयोग किये. अपने जीवनकाल में उन्होंने शहनाई को वैश्विक मंचों पर प्रतिष्ठित कर दिया था.

शहनाई और बिस्मिल्लाह को लेकर कहा जा सकता है कि दोनों इस कदर आपस में घुल गए थे कि ठीक-ठीक कह सकना मुश्किल होगा कि शहनाई बिस्मिलाह थी या बिस्मिलाह शहनाई.

और राग-सुर की उनकी तपस्या ऐसी कि जो उस जुगलबंदी की गिरफ्त में आया फिर जीवनभर मुक्त न हो सका. पत्रकार जावेद नकवी के हवाले से एक वाकया पता लगता है. सन् 1978 में दिल्ली में एक ओपन एयर थियेटर में प्रोग्राम चल रहा था. अचानक लाइट चली गई. बेखबर खान साहब तन्मय होकर बजाते रहे. आयोजकों में से किसी एक ने कहीं से लालटेन लाकर उनके सामने धर दी. अगले एक घंटे तक वे उसी की झपझपाती रोशनी में शहनाई बजाते रहे. ऑडिएंस खामोशी से सुनती रही. बजाना ख़त्म हुआ, उस्ताद ने आँखें खोलीं. बोले – “लाइट तो जला लिए होते भाई!”

बिस्मिलाह खान (तस्वीर साभार: Wikimedia)

बिस्मिलाह खान का चेहरा भारतीय क्लासिकल संगीत का सबसे मुलायम, सबसे निश्छल चेहरा था. चौड़ी मोहरी वाला सफ़ेद पाजामा, गोल गले वाला सफ़ेद कुरता जिसकी जगह गर्मियों में जेब वाली बंडी ले लिया करती, सफ़ेद नेहरू टोपी और मुंह में बीड़ी. बनारस की गलियों में रिक्शे पर यूं सफ़र करते थे गोया रोल्स रॉयस में घूम रहे हों. उनकी सादगी और साफगोई के बेशुमार किस्से सुनने-पढ़ने को मिलते हैं.

जीते जी वैश्विक धरोहर बन गए इस उस्ताद संगीतकार की मौत के कुछ साल बाद यूं हुआ कि उन्हें भारत सरकार द्वारा दिए गए पद्मश्री प्रमाणपत्र को दीमक खा गयी. इसके कुछ साल बाद उनके घर में चोरी हुई. एक कमरे की दराज़ से पांच शहनाइयां चोरी हुईं जिनमें से तीन चांदी की थीं. एक साल बाद पुलिस ने चांदी वाली शहनाइयों को बनारस के एक सुनार के पास से गली-अधगली हालत में हासिल किया. उस्ताद के एक पोते नज़रे हसन ने कुल सत्रह हज़ार रुपये में उन्हें बेच डाला था. स्पेशल टास्क फ़ोर्स द्वारा गिरफ्तार किये जाने के बाद अपना जुर्म कबूल करते हुए उसने कहा, “मुझे बाजार में उधार चुकाना था.”

भारत रत्न से सम्मानित होते बिस्मिल्लाह खान (तस्वीर साभार: Wikimedia)

हमारे समाज में कलाकारों और उनकी संततियों का यूं मुफलिसी में रहना कोई नई बात नहीं है. इस विषय पर बहुत लम्बे-लम्बे विवरण खोजे जा सकते हैं. इस लिहाज़ से देश-समाज-परम्परा वगैरह बहुत बड़ी बातें हैं.

बिस्मिल्लाह खान का संगीत सबसे पहले एक ऐसा उद्यम था जो मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने समझने का जरिया बनता हैं.

आदमी बनने का शऊर सीखना हो तो फुर्सत में उनकी शहनाई सुननी चाहिए. बार-बार!

अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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Ashok Pande
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अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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