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सलमान अख़्तर: दिमाग़ के डॉक्टर और दिल के शायर, “हम जो पहले कहीं मिले होते…”

सलमान अख़्तर – ये नाम सिर्फ़ एक डॉक्टर का नहीं, बल्कि एक ऐसी शख़्सियत का है जिसने इंसानी जज़्बात, दिमाग़ और रूह – तीनों को गहराई से समझा। वो एक मनोचिकित्सक (Psychiatrist) भी हैं, मनोविश्लेषक (Psychoanalyst) भी और साथ ही एक नर्मदिल शायर भी, जिनकी लिखावट में इल्म भी है और एहसास भी।

कुछ तो मैं भी डरा डरा सा था
और कुछ रास्ता नया सा था

सलमान अख़्तर

अदबी माहौल में परवरिश

सलमान अख़्तर की पैदाइश 31 जुलाई 1946 को लखनऊ में हुयी। उनका ताल्लुक एक बेहद मशहूर अदबी ख़ानदान से है। उनके वालिद जां निसार अख़्तर उर्दू के बड़े शायर और फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने गीतकार थे। उनके भाई जावेद अख़्तर आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे दानिश्वर नामों में गिने जाते हैं।

उनकी वालिदा सफ़िया अख़्तर एक पढ़ी-लिखी औरत और लेखिका थी, लेकिन अफ़सोस कि बचपन में ही उनका इंतक़ाल हो गया। इस कमी ने सलमान अख़्तर की शख़्सियत पर गहरा असर डाला- शायद यही वजह है कि उन्होंने इंसानी जज़्बातों को इतनी गहराई से समझा।

ज़िंदगी हम से तो इस दर्जा तग़ाफ़ुल न बरत
हम भी शामिल थे तिरे चाहने वालों में कभी

सलमान अख़्तर

डॉक्टर बनने की राह

जहां उनका पूरा परिवार शायरी और अदब में डूबा हुआ था, वहीं सलमान अख़्तर ने एक अलग राह चुनी। उन्होंने Aligarh Muslim University से MBBS किया। इसके बाद Postgraduate Institute of Medical Education and Research (PGIMER), चंडीगढ़ से मनोचिकित्सा (Psychiatry) में MD की डिग्री हासिल की।

उनके उस्ताद डॉ. एन. एन. विग के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने करियर की बुनियाद रखी। इसी दौरान उन्होंने मानसिक बीमारियों पर रिसर्च भी की, जो आगे चलकर उनकी पहचान का अहम हिस्सा बनी।

अमेरिका का रुख

साल 1973 में सलमान अख़्तर अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) की गहरी ट्रेनिंग ली और धीरे-धीरे इस फील्ड के बड़े नामों में शामिल हो गए।

हम जो पहले कहीं मिले होते
और ही अपने सिलसिले होते

सलमान अख़्तर

आज वो Jefferson Medical College, फ़िलाडेल्फ़िया में प्रोफे़सर हैं और साथ ही साइकोएनालिटिक सेंटर में ट्रेनिंग एनालिस्ट के तौर पर भी काम कर रहे हैं।

उनका काम सिर्फ़ क्लिनिक तक सीमित नहीं है, बल्कि वो दुनिया भर में लेक्चर देते हैं और इंसानी दिमाग़ की पेचीदगियों को आसान अंदाज़ में समझाते हैं।

इल्म और अदब का ख़ूबसूरत मेल

सलमान अख़्तर की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि उन्होंने साइंस और अदब—दोनों को साथ लेकर चले। उन्होंने 300 से ज़्यादा रिसर्च पेपर लिखे हैं और 100 से भी ज़्यादा किताबों का लेखन, संपादन या सह-संपादन किया है।

जब ये माना कि दिल में डर है बहुत
तब कहीं जा के दिल से डर निकला

सलमान अख़्तर

उनकी उर्दू किताबों में ‘कू-ब-कू’, ‘दूसरा घर’, ‘तीसरा शहर’, ‘बंद गली का मकान’, ‘मीरनामा’ और ‘देर रात का सूरज’ जैसी कृतियां शामिल हैं। वहीं अंग्रेज़ी में ‘The Hidden Knot’, ‘After Landing’, ‘Symptoms of Belonging’, ‘This is What Happened’ जैसी किताबें भी काफी मशहूर हैं।

दिलचस्प बात यह है कि वो अपनी उर्दू शायरी में कभी-कभी अंग्रेज़ी शब्द भी इस्तेमाल करते हैं, ताकि “प्रवासी ज़िंदगी” का असली एहसास सामने आ सके।

कोई शय एक सी नहीं रहती
उम्र ढलती है ग़म बदलते हैं

सलमान अख़्तर

सलमान अख़्तर का मानना है कि शायरी कोई मेहनत से लिखी जाने वाली चीज़ नहीं, बल्कि एक एहसास है जो अचानक अल्फ़ाज़ बन जाता है। वो कहते हैं कि अक्सर वो कुछ ही मिनटों में एक पूरी कविता लिख लेते हैं। 

उनके मुताबिक, शायरी को ज़्यादा एडिट करना उसकी रूह को कमज़ोर कर देता है। यही वजह है कि वो अपनी लिखी हुई कविताओं को ज़्यादा छेड़ते नहीं हैं।

प्रवासी अनुभव और पहचान

अमेरिका में रहते हुए सलमान अख़्तर ने “Immigrant Experience” यानी प्रवासी अनुभव पर भी काफी काम किया। उनका मानना है कि जब इंसान अपने वतन से दूर जाता है, तो वो अक्सर अतीत में जीने लगता है।

वो इसे “nostalgia” कहते हैं एक ऐसा एहसास, जिसमें इंसान अपने पुराने दिनों को याद करते हुए वर्तमान से थोड़ा दूर हो जाता है।

उन्होंने यह भी बताया कि अलग-अलग संस्कृतियों के बीच रहना इंसान की पहचान को बदल देता है और उसे एक नई सोच देता है।

अवॉर्ड्स और पहचान

सलमान अख़्तर को उनके काम के लिए कई इंटरनेशनल अवॉर्ड्स से नवाज़ा गया है। उन्हें सिगमंड फ्रायड अवॉर्ड, सिगोरनी अवॉर्ड और कई अन्य सम्मान मिले हैं। वो अमेरिका के “Top Doctors” की लिस्ट में भी कई सालों तक शामिल रहे हैं जो उनके प्रोफेशनल एक्सीलेंस का सबूत है।

ये तमन्ना है कि अब और तमन्ना न करें
शेर कहते रहें चुप चाप तक़ाज़ा न करें

सलमान अख़्तर

एक अलग पहचान और एक गहरा पैग़ाम

सलमान अख़्तर की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि इंसान एक ही वक़्त में कई पहचानें जी सकता है। वो एक डॉक्टर हैं, एक शायर हैं, एक रिसर्चर हैं और सबसे बढ़कर एक सोचने-समझने वाले इंसान हैं।

उनकी कहानी सिर्फ़ कामयाबी की नहीं, बल्कि उस तलब (जुनून) की है जो इंसान को अपने अंदर झांकने और दुनिया को बेहतर समझने की ताक़त देती है।

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

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