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धार्मिक एकता की मिसाल: रिज़वान अहमद उर्फ मामा की काली पूजा 

जब हर साल काली पूजा का दिन करीब आता है तो लोग रिज़वान अहमद से पूछते हैं कि क्या इस बार भी काली पूजा का आयोजन होगा? यह उनके प्रति लोगों के स्नेह और विश्वास को दर्शाता है। दरअसल काली पूजा का आयोजन करने वाले प्रमुख व्यक्ति के रूप में उनकी पहचान कोलकता के हर वर्ग में ख़ास जगह बनाए हुए हैं।

रिज़वान अहमद सिद्दीकी उर्फ मामा साल 1999 से काली पूजा का आयोजन करते आ रहे हैं। वह हर साल इस पूजा को उतनी ही श्रृद्धा और धूमधाम से करते हैं जैसे यह किसी की निजी आस्था का हिस्सा हो। पूजा का आयोजन पुलिस मुख्यालय लाल बाजार के पास ग्रांट लेन में किया जाता है। यह पूजा उनके और उनके सहयोगियों के लिए महज़ धार्मिक गतिविधि नहीं है, बल्कि समाज सेवा और भाईचारे का एक ज़रिया भी है।

पूजा के दौरान हिंदू और मुसलमान भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। रिज़वान की इस पहल से अलग-अलग समुदाय एक ही जगह पर मिलकर भगवान की आराधना और मानवीयता के सिद्धांतों को जीते हैं। रिज़वान अहमद सिद्दीकी का संगठन “शबनम गोल्डन वेलफेयर सोसायटी” समाज सेवा करता है। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को बढ़ावा देना और गरीबों की सहायता करना है।

मिलजुल कर मनाते हैं हर त्योहार

रिज़वान केबल नेटवर्क का काम करते हैं, वो अपने इस व्यवसाय से जो भी पैसा कमाते हैं उसका कुछ हिस्सा लोगों की सेवा में लगा देते हैं। काली पूजा के दौरान दान देने की कोई ज़बरदस्ती नहीं होती। अगर कोई इच्छा से योगदान करना चाहता है तो उनका स्वागत होता है। बाकी सभी खर्च वो खुद और उनके साथी उठाते हैं।

रिजवान की काली पूजा का आयोजन स्थानीय हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच भाईचारे और एकता का प्रतीक बन चुका है। मामा का कहना है, “हम सालों से साथ रहते आ रहे हैं। सभी त्योहारों को एक साथ मनाते हैं।”

रिजवान अहमद सिद्दीकी यानी मामा आज धार्मिक भेदभाव को दरकिनार कर एक नयी राह पर चल रहे हैं। वे न केवल हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन चुके हैं, बल्कि समाज सेवा के कार्यों के ज़रिए समाज में भाईचारे और मानवता का संदेश भी फैला रहे हैं।

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