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मॉर्निंग ग्लोरी के फूलों की कथा

सुबह की पहली रोशनी में, जब धूप अभी पूरी तरह जागी नहीं होती, मॉर्निंग ग्लोरी के नीले, बैंगनी और कभी गुलाबी फूल खिलने लगते हैं गोया आकाश ने अपने छोटे-छोटे टुकड़े धरती पर टाँक दिए हों। वे रात की नमी को अपने भीतर सहेजे धीरे-धीरे खुलते हैं, ऐसा लगता है कोई संकोचभरा सपना निगाह उठाकर धरती को देख रहा हो। उनकी पंखुड़ियों में क्षणभंगुरता की सुगंध होती है। आज हैं, अभी हैं, और दोपहर की धूप में धीरे-धीरे अदृश्य हो जाएंगे। उनका जीवन लंबा नहीं, पर अर्थवान होता है। हर सुबह वे नया जन्म लेते हैं, हर शाम चुपचाप विदा हो जाते हैं, बिना कोई शोर किए, बिना कोई शिकायत।

देश के तमाम हिस्सों में कहाँ-तहां इफरात में पाए जाने वाले इस मॉर्निंग ग्लोरी को लेकर एक शानदार कथा चलती है।

मोहब्बत हुई तो लड़का-लड़की बाकी संसार को भूल गए। लड़के से उसकी माँ ने पालतू भैंसों को तालाब में नहला लाने को कहा था। लड़की को उसके बाप ने सुबह उठते ही हिदायत दे रखी थी कि पहली फुर्सत में सुई-धागा लेकर सूरज की तरफ खुलने वाली खिड़की के परदे के उस हिस्से की मरम्मत कर दे जो तीन दिन पहले फट गया था और जिसकी वजह से बाप की नींद जल्दी खुल जा रही थी।

जैसे ही दोनों के माँ-बाप चारे और लकड़ी के लिए जंगल के लिए निकले, लड़का और लड़की अपने-अपने घरों से निकल नीली पहाड़ी की ओट में गिरने वाले छोटे झरने की तरफ भाग चले. वही उनका मिलने का ठिकाना था। गुस्सैल बाप की नज़र बचाकर लड़की अपने हिस्से के नाश्ते में से पनीर का सबसे बड़ा टुकड़ा लड़के के लिए लाई थी। लड़का उसके बालों में सजाने को मोरपंख लाया था।

जंगल से घर आकर दोनों के माँ-बाप ने देखा न लड़की घर पर है न लड़का। न भैंसें नहलाई गयी हैं न परदे सिये गए हैं। गाँव के देवता से शिकायत की गई कि जल्द इन कामचोर बच्चों का कुछ न किया गया तो जीना मुश्किल हो जाना है।

प्यार-व्यार तो ठीक है मगर इंसान को अपना काम भी तो करना होता है! देवता ने विचार किया और फैसला सुनाया लड़का-लड़की अब से साल में सिर्फ एक दिन के लिए मिलेंगे। देवता ने गाँव के बीचोबीच एक नदी बना दी। खूब चौड़े पाट वाली नदी. इतनी चौड़ी कि इस किनारे बोला गया अक्षर उस किनारे न पहुँच सके। इस किनारे का इंसान उस किनारे वाले को धुंधली परछाई से ज्यादा न दिखाई पड़े।

दिन भर लड़का और लड़की उदास आँखों से दूसरे किनारे पर अस्पष्ट आकृतियों में एक दूसरे को पहचानने की कोशिश करते। पानी के रास्ते चुम्बन भेजते, हवा के रास्ते चिठ्ठियाँ। पक्का पता किसी पर न लिखा होता।

खूब सारी बेपता चिठ्ठियाँ और खूब सारे बेपता चुम्बन इकठ्ठा हो गए तो एक शाम मेंह बरसना शुरू हुआ। खूब बारिश हुई. बहुत रातों के बाद लड़का-लड़की को चैन की नींद आई।

अगली सुबह गाँव वालों ने देखा नदी के दोनों छोरों पर एक-एक बेल उग आई थी। एक ही रात में दोनों बेलें दूसरे किनारों तक पसर गयी थीं. और उनमें बेशुमार बैंगनी फूल! लड़के वाले किनारे पर उगी बेल के फूलों में लड़की का चेहरा था, दूसरी बेल के फूलों में लड़के का। अब समूची नदी और हवा में दोनों का घर था। उनकी मोहब्बत का घर।

बेहद मजबूत जड़ों और रुई जितनी हल्की, पारदर्शी पंखुड़ियों वाले इन ख़ूबसूरत फूलों को चीन में सच्चे प्रेम और विरह का प्रतीक माना जाता है। चूंकि सुबह खिलने वाले इन फूलों की उम्र फकत दिन भर की होती है, उन्हें जीवन की क्षणभंगुरता और प्रेम की सतत ताजगी से जोड़कर भी देखा जाता है।

चीन की यह पुरानी लोककथा मुझे एक सुबह अल्मोड़ा के नज़दीक स्थित कसारदेवी नाम की छोटी सी जगह के उस घर की सीढियां चढ़ते हुए याद आई, मानसून के आने पर जिसकी लोहे की रेलिंग पर मॉर्निंग ग्लोरी के उन्हीं फूलों की आलीशान लकदक लिपट जाती है।

ये भी पढ़ें:फूल वालों की सैर – मजहब और वर्ग की सीमाएं तोड़ जब समूची दिल्ली एक हुई By Ashok Pande

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अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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