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क़तील शिफ़ाई: मोहब्बत को शायरी का सबसे ख़ूबसूरत लहजा देने वाला शायर

“जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ,
जाने क्यूं लोग मिरे नाम से जल जाते हैं।”

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं, जिनके अशआर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। क़तील शिफ़ाई भी ऐसे ही शायर थे। उनकी शायरी में मोहब्बत की नरमी भी थी, जुदाई का दर्द भी और इंसानी जज़्बात की गहराई भी। यही वजह है कि उनके लिखे शेर और गीत आज भी लोगों की ज़ुबान पर ज़िंदा हैं।

क़तील शिफ़ाई का असली नाम औरंगज़ेब ख़ां था। उनकी पैदाइश 24 दिसंबर 1919 को हज़ारा ज़िले के हरिपुर में हुयी, जो अब पाकिस्तान में है। उनके वालिद एक   कारोबारी थे और घर में शायरी का कोई माहौल नहीं था। लेकिन शायद कुछ लोग पैदा ही अल्फ़ाज़ की दुनिया के लिए होते हैं। क़तील भी उन्हीं में से एक थे।

बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। साल 1935 में वालिद के इंतेक़ाल के बाद उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। घर की ज़िम्मेदारियों ने उन्हें बहुत जल्दी बड़ा बना दिया। उन्होंने खेल के सामान की दुकान खोली, मगर कारोबार में कामयाबी नहीं मिली। फिर रोज़गार की तलाश उन्हें रावलपिंडी ले गई, जहां उन्होंने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी की।

लेकिन दिल में शायरी का चिराग़ लगातार जल रहा था। शुरुआत में उन्होंने अपनी ग़ज़लें हकीम मोहम्मद याहया शिफ़ा ख़ानपुरी को दिखाईं। वही उनके उस्ताद बने। अपने उस्ताद के सम्मान में उन्होंने अपने नाम के साथ “शिफ़ाई” जोड़ा और दुनिया उन्हें “क़तील शिफ़ाई” के नाम से जानने लगी।

बाद में उनकी दोस्ती मशहूर शायर अहमद नदीम क़ासमी से हुई। क़ासमी सिर्फ़ उनके दोस्त ही नहीं, बल्कि रहनुमा भी बने। क़तील की शायरी धीरे-धीरे अदबी हलकों में पहचानी जाने लगी। उनकी पहली ग़ज़ल लाहौर के एक साप्ताहिक अख़बार में प्रकाशित हुई।

साल 1946 में उन्हें लाहौर बुलाया गया, जहां उन्होंने मशहूर अदबी रिसाले “अदब-ए-लतीफ़” में सहायक संपादक के तौर पर काम किया। इसी दौरान पाकिस्तान का फ़िल्मी दौर शुरू हो रहा था। 1947 में एक फ़िल्म निर्माता ने उन्हें फ़िल्म के गीत लिखने का मौक़ा दिया। उनकी पहली फ़िल्म थी “तेरी याद”, जो पाकिस्तान की शुरुआती फ़िल्मों में शामिल मानी जाती है।

इसके बाद क़तील शिफ़ाई ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने पाकिस्तानी और भारतीय फ़िल्मों के लिए ढाई हज़ार से ज़्यादा गीत लिखे। उनकी शायरी में ऐसी मिठास और संगीतात्मकता थी कि हर गीत सीधे दिल में उतर जाता था।

“आख़री हिचकी तिरे ज़ानूं पे आए,
मौत भी मैं शाइराना चाहता हूं।”

इस शेर में मोहब्बत का दर्द भी है और एक शायर की रूमानी सोच भी। क़तील की यही अदा उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। उनकी ग़ज़लों में जुदाई और रिश्तों की नर्मी बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाई देती है.

“यूं लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना,
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना।”

यह शेर सिर्फ़ मोहब्बत की बात नहीं करता, बल्कि रिश्तों के टूटने की तकलीफ़ को भी महसूस कराता है।

क़तील शिफ़ाई को रूमानी शायरी का शायर कहा जाता है, लेकिन उनकी शायरी सिर्फ़ इश्क़ तक सीमित नहीं थी। वह इंसानियत, समाज और ज़िंदगी की सच्चाइयों को भी अपने अशआर में जगह देते थे। उनकी सोच प्रगतिशील और इंसान दोस्त थी।

“उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन,
देखने वाले उसे ताजमहल कहते हैं।”

इस शेर में क़तील की तसव्वुर की दुनिया साफ़ दिखाई देती है। उनके अल्फ़ाज़ में तस्वीर बनाने की ताक़त थी।

क़तील शिफ़ाई सिर्फ़ शायर ही नहीं, बल्कि बेहद कामयाब फ़िल्म गीतकार भी थे। उन्होंने “नाजायज़”, “सर”, “फिर तेरी कहानी याद आई”, “तमन्ना” और “औज़ार” जैसी भारतीय फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। पाकिस्तान में भी उनकी गिनती सबसे बड़े गीतकारों में होती है।

उनकी अदबी और फ़िल्मी ख़िदमतों के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें “प्राइड ऑफ़ परफॉर्मेंस अवार्ड” से नवाज़ा। भारत में भी उन्हें “अमीर ख़ुसरो अवार्ड” मिला।

क़तील शिफ़ाई ने सिर्फ़ उर्दू में ही नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा हिंदको में भी काम किया। उन्होंने “किस्सा ख़्वानी” नाम की फ़िल्म बनाई, जो हिंदको भाषा की पहली फ़िल्म मानी जाती है।

11 जुलाई 2001 को लाहौर में उनका इंतक़ाल हो गया। मगर शायर कभी मरते नहीं। वह अपने अल्फ़ाज़ में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। आज भी जब कोई मोहब्बत, दर्द या तन्हाई को महसूस करता है, तो क़तील शिफ़ाई के अशआर अनायास ज़हन में उतर आते हैं।

उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत यही थी कि वह मुश्किल बातों को भी आसान और दिलकश अल्फ़ाज़ में कह देते थे। शायद यही वजह है कि क़तील शिफ़ाई आज भी उर्दू शायरी के सबसे लोकप्रिय और दिल के क़रीब शायरों में गिने जाते हैं।

ये भी पढ़ें: वहीद जहां बेग़म: तालीम के ज़रिए समाज बदलने वाली शख़्सियत

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