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मोर के पंख पर भील पेंटिंग उकेरने वाले जोधपुर के पहले चित्रकार मांगीलाल

भारत एक ऐसा देश है जहां हर कोने में आपको लोककला के रंग में सराबोर नायाब कलाकार देखने को मिल जाएंगे। उनके हाथों में ऐसा हुनर होता है जो देखने वालों को मोह लेता है। इन्हीं कलाकारों में से एक है भील जनजाति के शानदार कलाकार जोधपुर के मांगीलाल भील। जिनकी चित्रकला कुछ ख़ास है। वो राजस्थान के पहले ऐसे कलाकार है जो मोर के पंखों पर अपना हुनर उकेरते है।

भील पेंटिंग को कपड़ो, कैनवास और मोर के पंख पर बना रहे मांगीलाल

मांगीलाल को इस कला से जुड़े करीब 20 से 22 साल हो गए हैं। वो भील जनजाति की लोककला और संस्कृति को मोर के पंखों पर बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ सजाते रहे हैं। मांगी लाल ने DNN24 को बताया कि “भील जनजाति का प्रमुख नृत्य गवरी होता है। गवरी नृत्य रक्षाबंधन के बाद शुरू होता है और नवरात्री तक चलता है। पहले गवरी डांस के चित्र मांगी लाल के बुजुर्ग दीवारों पर बनाया करते थे।” आज वो भील पेंटिंग को कपड़े, कैनवास और मोर के पंख पर बना रहे हैं। वो 2015 से चित्र कपड़े और कैनवास पर बनाया करते थे। लेकिन साल 2021 से उन्होंने मोर के पंख पर पेंटिंग बनानी शुरू की।

कैसे आया मोर के पंख पर पेंटिंग बनाने का आईडिया

मांगीलाल ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान जब सभी लोग अपने घरों में बंद थे। उस दौरान वो कैनवास नहीं खरीद सकते थे। लेकिन घर के पास कई मोर आते थे, जिनके पंख टूटकर नीचे गिर जाते थे। एक दिन उन्होंने एक पंख उठाया और सोचा कि क्या इस पर भी कुछ कलाकृति बनाई जाए। फिर उन्होंने पंख पर छोटे -छोटे फूल और पत्तियां बनाईं। जो देखने में काफी ख़ूबसूरत लग रही थीं।

इन्ही पेंटिंग को उन्होंने ओड़िशा एग्जीबिशन में लगाई। जहां लोगों ने इसे काफी पसंद किया। इसके बाद उनकी एग्जीबिशन आदि महोत्सव में लगी तब भी उनकी पेंटिंग काफी बिकी और धीरे-धीरे अलग अलग डिज़ाइन बनाना शुरू किया।

अलग-अलग विषय पर आधारित होती है भील पेंटिंग

मांगीलाल भील पेटिंग आदिवासी नृत्य, शादी और रस्मों के आधार पर बनाते है। इसके अलावा देवी देवताओं जैसे गणेश जी, शिव जी, कृष्णा और जंगल के जानवरों को भी चित्रित करते हैं। 15 नवंबर 2023 में उन्हें राजस्थान के राज्यपाल ने इस कला को अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने के लिए सम्मानित किया था। आज ये पेंटिंग उनकी रोज़ी रोटी का ज़रिया है। सरकार की ओर से आयोजित की जा रहे एग्जीबीशन से उन्हें काफी सम्मान और लाभ हो रहा है। वो चाहते हैं कि सिर्फ भारत ही नहीं विदेश में भी लोग इस कला को जानें।

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