उर्दू अदब की दुनिया में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जो सिर्फ़ सुनाई नहीं देतीं बल्कि दिल में उतर जाती हैं। ऐसी ही एक ख़ूबसूरत और असरदार आवाज़ का नाम है अलीना इतरत। उनकी शायरी में एहसास की नर्मी, लफ़्ज़ों की पाकीज़गी और सोच की गहराई साफ़ दिखाई देती है।
6 जून को उत्तर प्रदेश के नगीना, ज़िला बिजनौर में पैदाइश हुईं अलीना इतरत ने अंग्रेज़ी अदब और तारीख़ में एम.ए करने के साथ बी.एड भी किया। तालीम हासिल करने के बाद उन्होंने शिक्षा विभाग से जुड़कर शिक्षण के मैदान में अपनी ख़िदमत जारी रखी। लेकिन उनकी असली पहचान उनकी शायरी बनी, जिसने उन्हें मुल्क ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहचान दिलाई।
अलीना इतरत की शायरी किसी बनावटी चमक-दमक की मोहताज नहीं। उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी के छोटे-छोटे जज़्बात बड़ी ख़ामोशी और सलीके से सामने आते हैं। वह मुशायरा-ज़दा शायरी से दूर रहकर अल्फ़ाज़ को एक नया मयार देती हैं। उनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे कोई दर्द, कोई याद या कोई ख़्वाब धीरे-धीरे दिल में उतर रहा हो।
“अभी तो चाक पे जारी है रक़्स मिट्टी का
अभी कुम्हार की निय्यत बदल भी सकती है”
ज़िंदगी की बेयक़ीनी और इंसानी हालात को बेहद ख़ूबसूरती से बयान करता है। इस शेर में उम्मीद भी है और एक गहरी फ़लसफ़ियाना सोच भी। यही अंदाज़ अलीना इतरत को दूसरी शायराओं से अलग बनाता है।
उनकी शायरी में औरत के जज़्बात, तन्हाई, मोहब्बत, याद और उम्मीद का रंग बहुत नर्मी से दिखाई देता है।
“उदासी शाम तन्हाई कसक यादों की बेचैनी
मुझे सब सौंप कर सूरज उतर जाता है पानी में”
इस शेर में शाम की उदासी और यादों की बेचैनी को जिस तरह पेश किया गया है, वह सीधे दिल पर असर छोड़ता है।
अलीना इतरत का काव्य संग्रह “सूरज तुम जाओ” अदबी हलकों में बेहद पसंद किया गया। इस किताब को दिल्ली उर्दू अकादमी और बिहार उर्दू अकादमी की तरफ़ से साल 2015 और 2016 में इनामों से नवाज़ा गया। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान हासिल हुए। उनकी ग़ज़लें, नज़्में और अफ़साने देश-विदेश की मशहूर पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं।
मुशायरों की दुनिया में भी अलीना इतरत एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनका तरन्नुम, आवाज़ की मिठास और शायरी का मयार सुनने वालों को देर तक याद रहता है। यही वजह है कि उन्हें देश और विदेश के बड़े मुशायरों में ख़ास तौर पर बुलाया जाता है।
उनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि एहसास की एक ख़ूबसूरत दुनिया है। वह अपने अशआर में मोहब्बत, उम्मीद और इंसानी जज़्बात को इतने सलीके से पिरोती हैं कि हर शेर दिल का हिस्सा बन जाता है।
“अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह
हम तिरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं”
ऐसे अशआर यह साबित करते हैं कि अलीना इतरत सिर्फ़ शायरा नहीं, बल्कि एहसासों को लफ़्ज़ों में ढालने वाली एक संजीदा फ़नकार हैं, जिनकी शायरी अदब के आईने पर हमेशा अपना अक्स छोड़ती रहेगी।
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