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शायर-ए-इन्क़िलाब मख़दूम मोहिउद्दीन: उर्दू अदब का वह शायर जिसने नई राह दिखाई

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होती, बल्कि एक दौर की आवाज़ बन जाती है। मख़दूम मोहिउद्दीन भी ऐसे ही शायर थे, जिनकी शायरी में इन्क़िलाब की गर्मी भी थी और मोहब्बत की नरमी भी। उन्होंने अपने कलाम से दिल और दिमाग़ दोनों को छुआ।

‘हयात ले के चलो काएनात ले के चलो
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो’

यह शेर मख़दूम की सोच और उनके इन्सानी नज़रिये को बख़ूबी बयान करता है।

हैदराबाद की ज़मीन से उठी एक आवाज़

मख़दूम मोहिउद्दीन का असल नाम अबू सईद मोहम्मद मख़दूम मोहिउद्दीन हज़री था। उनकी पैदाइश 4 फ़रवरी 1908 को हैदराबाद रियासत के मेदक ज़िले के अंदोल गांव में हुई। उनका परिवार मज़हबी माहौल से जुड़ा हुआ था, इसलिए बचपन से ही उन्हें दीन और इल्म दोनों की तालीम मिली।

उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई अपने गांव में पूरी की। इसके बाद बेहतर तालीम के लिए हैदराबाद शहर का रुख़ किया। उस दौर में हैदराबाद इल्म और तहज़ीब का अहम मरकज़ माना जाता था। यहीं से उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा हासिल की और आगे चलकर उस्मानिया यूनिवर्सिटी से मास्टर की डिग्री हासिल की।

उस्मानिया यूनिवर्सिटी और तालीमी सफ़र

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मख़दूम मोहिउद्दीन ने सिटी कॉलेज, हैदराबाद में उर्दू के लेक्चरर के तौर पर काम शुरू किया। वह सिर्फ़ एक अच्छे शिक्षक ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे शख़्स थे जो अपने छात्रों में सोचने और सवाल करने की हिम्मत पैदा करते थे।

उनका अंदाज़-ए-बयान बहुत दिलकश था। यही वजह थी कि छात्र उन्हें बहुत पसंद करते थे। लेकिन उनकी ज़िंदगी सिर्फ़ तालीम तक महदूद नहीं रही। उनके दिल में समाज को बदलने और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने का जज़्बा भी था।

मख़दूम मोहिउद्दीन का नाम प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के अहम शायरों में लिया जाता है। यह वह दौर था जब हिंदुस्तान में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी और साहित्यकार अपनी क़लम से समाज में बदलाव की आवाज़ उठा रहे थे।

मख़दूम ने भी अपनी शायरी के ज़रिये मज़दूरों, ग़रीबों और आम लोगों के दर्द को बयान किया। उनकी शायरी में इन्क़िलाब की चिंगारी साफ़ दिखाई देती है। इसी वजह से उन्हें “शायर-ए-इन्क़िलाब” भी कहा जाता है।

उन्होंने हैदराबाद में प्रोग्रेसिव राइटर्स यूनियन की स्थापना की और बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से भी जुड़े।

नौकरी छोड़नी पड़ी, जेल भी जाना पड़ा

कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने और सामाजिक आंदोलन में सक्रिय होने की वजह से उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनकी राजनीतिक गतिविधियों के वजह से उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी।

इतना ही नहीं, अपने विचारों और आंदोलनों के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। लेकिन इन मुश्किलों ने उनके हौसले को कम नहीं किया। बल्कि उनकी शायरी और भी ज़्यादा मज़बूत और असरदार होती चली गई।

शायरी में इश्क़ और इन्क़िलाब का संगम

मख़दूम मोहिउद्दीन की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उसमें इश्क़ और इन्क़िलाब दोनों का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है।

आप की याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर

फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की

इन ग़ज़लों में मोहब्बत की नरमी और जज़्बात की गहराई साफ़ महसूस होती है।

मशहूर किताबें और अदबी काम

मख़दूम मोहिउद्दीन की शायरी कई मशहूर किताबों में प्रकाशित हुई। उनके दो प्रमुख संग्रह हैं—

  • सुर्ख सवेरा (1944)
  • गुल-ए-तर (1961)

बाद में इन दोनों संग्रहों को मिलाकर “बिसात-ए-रक्स” नाम से उनका पूरा काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ। यह किताब उनकी शायरी की सबसे अहम पहचान मानी जाती है। इसी किताब के लिए उन्हें 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

फ़िल्मों में भी गूंजी मख़दूम की शायरी

मख़दूम मोहिउद्दीन की शायरी सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रही। उनके कई मशहूर गीत और ग़ज़लें हिंदी फ़िल्मों में भी इस्तेमाल की गईं। उनकी मशहूर रचनाओं में शामिल हैं—

  • एक चमेली के मंडवे तले
  • आप की याद आती रही रात भर
  • फिर छिड़ी रात बात फूलों की
  • ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए

इन गीतों ने उन्हें आम लोगों के बीच भी बेहद मक़बूल बना दिया।

विदेश यात्राएं और यूरी गगारिन से मुलाक़ात

मख़दूम मोहिउद्दीन को कई देशों की यात्रा करने का मौक़ा भी मिला। उन्होंने सोवियत संघ और यूरोप के कई देशों का दौरा किया। जब वह मॉस्को गए तो उनकी मुलाक़ात दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन से भी हुई। इस मुलाक़ात से प्रभावित होकर उन्होंने उन पर एक कविता भी लिखी।

आख़िरी सफ़र और यादगार विरासत

मख़दूम मोहिउद्दीन का इंतक़ाल 25 अगस्त 1969 को हुआ। लेकिन उनकी शायरी और उनकी सोच आज भी ज़िंदा है। उन्हें सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया जाता है जिसने अपनी क़लम से इंसाफ़, मोहब्बत और बराबरी की बात की।

उनकी याद में 2008 में हैदराबाद में उनके जन्म शताब्दी समारोह भी आयोजित किए गए, जिसमें कई बड़े साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए।

मख़दूम की शायरी की अहमियत

मख़दूम मोहिउद्दीन की शायरी आज भी इसलिए ज़िंदा है क्योंकि उसमें इंसानियत की आवाज़ है। उनकी कविता सिर्फ़ मोहब्बत की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज को बदलने का सपना भी दिखाती है।

हयात ले के चलो काएनात ले के चलो
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो

यही मख़दूम की असल पहचान है एक ऐसा शायर जिसने अपने अल्फ़ाज़ से मोहब्बत भी दी और इंक़लाब की राह भी दिखाई।

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

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