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लखनऊ का क़दीमी उर्दू कुतुबखाना ‘दानिश महल’, जहां आते थे जोश मलीहाबादी से लेकर फ़िराक़ गोरखपुरी तक 

उर्दू एक ऐसी ज़बान है जिसका हर लफ़्ज़ खुशबू से महकता है, जो बात करने की तहज़ीब सिखाती है उर्दू पर मशहूर शायर बशीर बद्र ने लिखा है-

”वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का

रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुश्बू”

उर्दू और लखनऊ का शहर का रिश्ता काफी गहरा है। शहर-ए-अदब जहां पर चलने वाली हवाएं भी तारीख़ों पर बातें करती हैं। जो एक शानदार नगीना है जिसने अपनी जमक से उर्दू ज़बान को रोशन किया है। लखनऊ शहर के सबसे पुराने बाज़ार अमीनाबाद में जहां नवाब और उनकी बेगमें भी आया करती थीं एक कदीमी कुतुबखाना है जहां पर उर्दू के मशहूर शायर आकर बैठा करते थे। दानिश महल  जो उर्दू ज़बान और लिटरेचर की एक पनाहगाह है जहां उर्दू इठलाती है। हिंदुस्तान की आज़ादी से लेकर आज के नये भारत  तक में दानिश महल अपना सिर उठाए खड़ा है। दानिश महल उर्दू ज़बान की  एक जिंदा विरासत है। ऐसा कुतुबख़ाना जो अनकहे किस्सों और खजानों का घर है। किताबों का लाइट हाउस है जो उर्दू अदबी दिल में बरसों से धड़कता आ रहा है। 

दानिश महल उर्दू किताबों की लखनऊ की सबसे पुरानी दुकान है, जो सन 1939 में बनी थी। लेकिन अभी भी शाम-ए-अवध में अपने हिस्से की खुशबू को समेटे हुए है। दानिश महल का मतलब ‘Palace of Wisdom’ है। जब इसकी शुरूआत हुई थी तब ये एक फेमस उर्दू किताबों का पब्लिशिंग हाउस का  आउटलेट था। एक वक्त ऐसा था जब यहां पर शहर के अदबी दिग्गज, शायरों, इतिहासकार आया करते थे और अलग-अलग मौज़ू पर बातें करते थे। 

नईम अहमद जो इस वक्त ‘दानिश महल’ के मालिक हैं, बताते हैं कि इस कुतुबखाने को नसीम अहमद साहब ने शुरू किया था। मौलाना हक़ साहब ने इस बुक स्टोर का नाम दानिश महल रखा था। तब से लेकर आजतक ये इदारा चलता चला आ रहा है। वो बताते हैं कि उस दौर में लोग उर्दू से बहुत मोहब्बत करते थे उनको उर्दू में पढ़ने का शौक था। लेकिन वो दौर अलग था और अब का दौर काफी अलग हो चुका है। उर्दू पढ़ने वाले लोग हैं लेकिन पढ़ने वालों में काफी कमी आई है।

नईम अहमद उर्दू और दानिश महल के रिश्ते को लेकर कहते हैं कि इनका रिश्ता मां और बेटे के रिश्ते के जैसा है। जैसे एक मां अपने बेटे को बेइंतिहा चाहती है उसी तरह दानिश महल भी उर्दू से मोहब्बत करता है। उर्दू से चाहत की वजह से ही आज भी ये दानिश महल कायम है। उर्दू के अंदर वो मिठास है जो बाकी ज़बान में नहीं नज़र आती है। इसलिए हम सिर्फ उर्दू पर ही पूरा फोकस रखते आ रहे हैं। 

यहां आला और हर दिल अज़ीज़ मशहूर शायर जोश मलीहाबादी से लेकर फिराक गोरखपुरी भी आते थे। राम लाल, अब्दुल माजिद दरयाबादी, आले अहमद सुरूर, अब्दुल हक कुछ ऐसे उर्दू दानिशवर नाम हैं जो स्टोर के शुरुआती दिनों में अक्सर दुकान में आते थे।

फ़रासत हुसैन जो दानिश महल में काफी ज़माने से आया करते हैं और बैठा करते हैं और लखनऊ के लिटरेचर और उर्दू के जानकार हैं, बताते हैं कि आज़ादी के बाद उर्दू के पढ़ने वाले कम होते गये क्यों उससे पहले उर्दू हर कॉलेज और स्कूल में कंपल्सरी होती थी। वो कहते हैं कि वहीं ज़बान तरक्की करती है जो नौकरी से जुड़ी हो। उर्दू का ताल्लुक हर कम्युनिटी से था। चाहे वो हिंदू हो या सिख या फिर मुसलमान सभी उर्दू पढ़ते थे।  उर्दू की जगह पर हिंदी और अंग्रेज़ी जुबान आ गई तो उसके पढ़ने वाले भी कम होते गये। 

फ़रासत हुसैन बताते हैं कि लखनऊ से उर्दू के सबसे बेहतरीन अख़बार निकलते थे। लखनऊ तो उर्दू का गढ़ था। देश में उर्दू के तीन गढ़ दिल्ली, हैदराबाद और लखनऊ माने जाते थे।  लेकिन लखनऊ स्कूल की उर्दू सबसे आला है। वो कहते हैं कि फिल्मों ने उर्दू को जिंदा रखा हुआ है। जो आज़ादी से लेकर अब तक जितने भी शानदार नगमें लिखे गये हैं वो उसमें उर्दू ही छाई हुई होती है। वो कहते हैं कि दानिश महल आज के वक्त में उर्दू की ख़िदमत में लगा हुआ है।   

दानिश महल में मीर तक़ी मीर, हसरत मोहानी, सर सैयद अहमद ख़ान, मीर अनीस जैसे इल्मी रूहों वाले दबीरों की तस्वीरें लगी हैं.. जो यहां की कहानी ख़ुद ब ख़ुद बयां कर देती है।  

तो फिर आइए, इस जादुई जगह पर आएं.. जहां हवा भी फुसफुसाती हुई शायरी और नज़्मों से गूंजती है।

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