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पंजाब के युवाओं को बंदूकों का लालच कौन दे रहा है,गैंग-वॉर में हुई हत्याओं की एक अंदरूनी कहानी

हम अक्सर पंजाब में गैंगस्टरों (Gangsters) और बंदूक संस्कृति (gun culture) के बारे में सुनते और देखते हैं। इसकी झलक हमेशा गानों, म्यूज़िक और सिनेमा में दिखाई देती है। सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ तस्वीरें पोस्ट करने और शादियों में लाइसेंसी हथियार लहराने के मामले भी सामने आए हैं। अतीत में शादियों में गोलीबारी के कारण हुई मौतों के मामले भी सुर्ख़ियों में रहे हैं। हालांकि, सरकार अब इसे सख्ती से खत्म करने का दावा कर रही है। इसी तरह, गैंग से जुड़ी घटनाओं ने भी पंजाब में एक हिंसक माहौल पैदा कर दिया है। इसकी जड़ें कहां हैं?

पंजाब में गैंग-वॉर (Gang war) की घटनाएं अतीत में भी होती रही हैं। गैंगस्टर संस्कृति, पंजाब के पुराने ‘बदमाश’ या ‘लंपन’ (गुंडों) की ही एक आधुनिक शक्ल है। इन्हें राजनीतिक दलों और नेताओं का पूरा समर्थन मिलता रहा है। गुंडों-राजनेताओं-पुलिस का यह गठजोड़ इतना मज़बूत है कि जेल में बैठे गैंगस्टर भी वहीं से अपने गैंग चलाते हैं।


पंजाब के लोगों में ये आम धारणा है कि प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने-अपने गुंडों के गैंग पाल रखे हैं, जो युवाओं का इस्तेमाल अपने निजी स्वार्थों के लिए करते हैं, और जब उनका काम निकल जाता है, तो ऐसे युवाओं को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, या फिर उनकी हत्या भी कर दी जाती है। पूर्व गैंगस्टर लक्खा सिधाना (Former gangster Lakkha Sidhana) अक्सर अपने भाषणों और इंटरव्यू में कहते हैं कि उन्होंने कई बड़े नेताओं के लिए काम किया है, और जब उन नेताओं का काम पूरा हो गया, तो उन्होंने लक्खा को छोड़ दिया। आरोप है कि राजनीतिक नेता इन गैंगों की सेवाओं का इस्तेमाल अवैध धंधे चलाने, रंगदारी वसूलने, नशीले पदार्थों का व्यापार करने, अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने, सामाजिक कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और जन-आंदोलनों को दबाने के लिए करते हैं।

2002 से 2007 तक कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान, ये आम चर्चा थी कि कुछ कांग्रेस नेताओं ने अपनी अवैध गतिविधियों के लिए गैंगस्टरों को पाल रखा था। 2007 से 2017 तक अकाली-भाजपा शासन के दौरान भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी, क्योंकि गैंगों की संख्या लगातार बढ़ती रही। ये बात किसी से छिपी नहीं थी कि अकाली दल का कौन सा नेता अपने अवैध काम करवाने के लिए गैंगस्टरों का इस्तेमाल करता है। यहां तक कि 2017 से 2022 तक कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी गैंगस्टरों की गतिविधियां नहीं रुकीं। मौजूदा AAP सरकार के कार्यकाल में भी गैंग से जुड़ी घटनाएं हो रही हैं। हालांकि पंजाब सरकार ने गैंगों के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की है, लेकिन उसने इस समस्या की मूल वजह (जड़) तक पहुंचने की कोशिश नहीं की है। इस तरह, पुलिस पर गैर-कानूनी मुठभेड़ों के आरोप लगते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन फ़र्ज़ी मुठभेड़ें लोकतंत्र-विरोधी हैं।

दिवंगत पंजाबी विद्वान और लेखक प्रिंसिपल संत सिंह सेखों अपनी कई भाषणों में अक्सर ये बात कहते थे, ‘जो लोग शिक्षण संस्थानों में वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं से लड़ते हैं, वे ही आगे चलकर पंजाब पर राज करते हैं।’ प्रमुख पार्टियों के छात्र और युवा संगठन भी अब गैंगस्टर गिरोहों की भर्ती के लिए कोचिंग सेंटर बन गए हैं। पंजाब में ‘गन कल्चर’ (बंदूक संस्कृति) पर बात करते हुए, जाने-माने समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर बावा सिंह कहते हैं, ‘सामंती व्यवस्था और समाज एक तरह का ‘गैंगस्टर समाज’ ही था, जिसे सामंत लोग अपनी बाहरी धार्मिकता और कमोबेश दयालुता का दिखावा करते हुए, खुद को ‘इज्ज़तदार’ बताकर बनाए रखते थे। सामंती व्यवस्था के ढहने के बाद, ऐसे गिरोह बनने लगे जिन्होंने अपराध की दुनिया के ज़रिए ताकत और दौलत हासिल की। ​​पंजाब के मौजूदा गिरोह, पुराने डाकुओं और फिरौती मांगने वाले गिरोहों का ही एक बदला हुआ रूप हैं। पंजाब में इनका आगमन, उत्तर प्रदेश के फिरौती मांगने वाले गिरोहों के ज़रिए हुआ।’

बावा सिंह आगे कहते हैं, ‘पंजाब में गिरोहों का आगमन 2004-05 के आसपास शुरू हुआ और 2010 तक यह अपने चरम पर पहुंच गया।’ इस घटनाक्रम को समझाते हुए बावा कहते हैं कि एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी का छात्र संगठन ही इन गिरोहों की भर्ती का मुख्य अड्डा बन गया। वह आगे बताते हैं कि इसी छात्र संगठन से कई गिरोह उभरे, जिनमें से कई आज भी पंजाब में सक्रिय हैं। ‘जब इन गिरोहों ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अपना काम शुरू किया, तो बड़े नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें छपने लगीं, और पुलिस थानों में भी उनसे पूछताछ होने लगी। ठीक उसी समय, ये गिरोह और उनके सरगना, कॉलेजों में पढ़ने वाले 18-19 साल के युवाओं की नज़रों में एक तरह के ‘सेलिब्रिटी’ बन गए। किसी वजह से, जो युवा ‘हीन भावना’ (inferiority complex) के शिकार थे, उन्हें भी यह लगने लगा कि इससे समाज में उनकी ‘धूम’ मचेगी और लड़कियाँ उनकी तरफ़ आकर्षित होंगी,’ बावा इन गिरोहों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी की वजह समझाते हुए कहते हैं।

बावा कहते हैं, ‘शुरुआत में, पंजाब यूनिवर्सिटी (चंडीगढ़) और चंडीगढ़ के अन्य कॉलेज ही इन गिरोहों का मुख्य अड्डा बन गए थे। फिर, उस संबंधित छात्र संगठन ने पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनावों के ज़रिए अपनी पकड़ और भी मज़बूत कर ली।’ बावा आगे कहते हैं कि यह वह समय था जब जिस पार्टी से यह छात्र संगठन जुड़ा हुआ था, वह सत्ता में थी और उसने अपनी छात्र शाखा को पूरा समर्थन दिया, साथ ही, एक शीर्ष नेता अक्सर इन शिक्षण संस्थानों का दौरा करते थे और संगठन की बैठकों को संबोधित करते थे। ‘पंजाब के बाकी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कई वर्षों से छात्र चुनाव नहीं हुए हैं, और उस समय की सत्ताधारी पार्टी द्वारा समर्थित गिरोहों ने खुद ही कॉलेज अध्यक्ष बनाना शुरू कर दिया। इस बात ने पंजाब के ग्रामीण युवाओं के एक वर्ग को इन गिरोहों की ओर आकर्षित किया है। पंजाब की विरासत में, हथियारों को वीरता का प्रतीक माना जाता रहा है।”

इसका एक कारण पंजाब का भौगोलिक वातावरण भी है। यही वजह है कि हथियार पंजाब के युवाओं को ज़्यादा आकर्षित करते हैं। मेरा अपना मानना ​​है कि चाहे संत भिंडरावाले पंजाब के युवाओं के हाथों में हथियार थमाएँ, या नक्सली या गैंगस्टर उन्हें हथियार दें, युवा उनकी तरफ खिंचे चले जाते हैं। मौजूदा हालात के अपने विश्लेषण में बावा कहते हैं, “पूंजीवादी दौर का मानसिक तनाव, बेरोज़गारी और व्यवस्था के प्रति उदासीनता भी युवाओं को इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करती है।”

गैंग आपस में लड़ते रहते हैं, एक-दूसरे को धमकियाँ देते हैं और यहाँ तक कि एक-दूसरे की जान भी ले लेते हैं। हाल के सालों में, ज़्यादातर गैंगस्टरों की हत्याएँ आपसी दुश्मनी या गुटों की लड़ाई की वजह से हुई हैं। पंजाबी संगीत और फ़िल्म इंडस्ट्री भी गैंग के शिकंजे से अछूती नहीं रही है। 1990 के दशक और 21वीं सदी की शुरुआत में, पंजाबी गानों के अंदाज़ और तकनीक में कई बदलाव आए, लेकिन उनका मूल आधार वही रहा, जैसे सामंती संस्कृति, सामंती मूल्यों के प्रति लगाव, हथियार, औरतों के प्रति नकारात्मक सोच, अपनी दौलत का दिखावा, हिंसा वगैरह।

21वीं सदी में, पंजाबी गानों में हथियारों को इस तरह दिखाया जाने लगा कि वे लड़कियों को अपनी तरफ खींचने का ज़रिया बन गए; हिंसा और गैंगस्टर संस्कृति को इस तरह पेश किया गया कि लड़की खुद अपने प्रेमी से ‘वैली’ (गैंगस्टर) बनने को कहती है। मिस पूजा और प्रीत बराड़ का ऐसा ही एक गाना है-

“हुण तक नीवे रह-रह के असीं, घुट सब्र दे भर लए

बारी करा लूँ तैनू आपे, वेच के पंज-सत्त मरले

वैली बन मित्रा, बड़े डरावे जर लए”

ऐसे कुछ गानों के उदाहरण देखें:

“वैली दी अख अज लाल ए

कोई बंदा-बुंदा मारना तां दस” (गायक बाली रियाड़)

“कढ़ के दे दे राइफ़ल दो-नाली

नाल पेटी रौंदां वाली,

लहू जिन्हां ने पीता साडा, बिना सोधियां नहीं सरदा साडा।

नी अज बंदा मारन नूँ जी करदा” (हरजीत हरमन)

1980 के दशक में आतंकवाद का दौर चला, जब पुलिस और आतंकवादी,दोनों ने ही पंजाब के गांवों पर हमले किए, जिससे पंजाब को भारी नुकसान पहुंचा। उस दौर के बाद पैदा हुई युवाओं की एक बड़ी आबादी राजनीतिक चेतना से वंचित है। 1990 के दशक के आखिर और 21वीं सदी में पैदा हुई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा पंजाब के प्राचीन इतिहास, सिख इतिहास, गुरबानी, सूफी परंपरा, प्राचीन महान साहित्य, आज़ादी की लड़ाई, भगत सिंह, करतार सिंह सराभा, ग़दर आंदोलन, पगड़ी की शान, जट्टा आंदोलन, कूका आंदोलन, बब्बर अकाली आंदोलन, बँटवारे, और आज़ादी के बाद पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हालत के बारे में या तो कुछ नहीं जानता, या अगर जानता भी है, तो वह सुनी-सुनाई बातों और अधूरी जानकारियों पर आधारित है। इस युवा पीढ़ी के लिए, जो पंजाब की विरासत और असलियत से कटी हुई है, भगत सिंह भी एक हीरो हैं, और भिंडरावाले भी। वे केजरीवाल की झाड़ू भी थाम लेते हैं, उन्हें भगवंत मान की बातें भी पसंद आती हैं, और वे दीप सिद्धू और सिद्धू मूसेवाला में भी ‘देश के रत्न’ देखते हैं।

पंजाब के युवाओं के इस संकट के बारे में पंजाबी नाटककार डॉ. साहिब सिंह कहते हैं, “पंजाब का युवा इस समय एक बड़े खालीपन में भटक रहा है। अपनी जड़ों और इतिहास से कटा हुआ यह युवा, जिस भी विचार में उसे जोश नज़र आता है, उसी के पीछे भागने लगता है। बाद में, जब उन्हें उस विचार की असलियत पता चलती है, तो वे निराशा में डूब जाते हैं।’

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं। ये विचार DNN24 या उससे जुड़ी किसी भी संस्था के विचार या राय को ज़रूरी नहीं दर्शाते।

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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