अक्सर जब इंसान की उम्र 80 साल के करीब पहुंचती है, तो वो सुकून और आराम भरी ज़िंदगी गुज़ारना चाहता है। लेकिन गुवाहाटी की रहने वाली 89 वर्षीय Ranjana Sarma ने इस उम्र में एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो हर किसी के दिल को छू जाती है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी के तजुर्बों, यादों और गुज़रे हुए दौर की झलकियों को एक किताब में समेट दिया है। उनकी किताब का नाम है “मेरे जीवन के 70 वर्षों के मीठे पल”। ये किताब सिर्फ अल्फ़ाज़ का मजमुआ नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर की दास्तान है जिसमें रिश्तों की गर्माहट, सादगी और मोहब्बत की ख़ुशबू बसती थी।
दो साल की मेहनत से तैयार हुई यादों की किताब
Ranjana Sarma कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ अक्सर लोगों की यादें धुंधली होने लगती हैं, लेकिन उनके दिल और ज़हन में बचपन से लेकर आज तक की कई यादें आज भी बिल्कुल साफ़ हैं। इन्हीं यादों को उन्होंने दो साल की मेहनत और लगन से एक किताब की शक्ल दी। 27 फरवरी को गुवाहाटी प्रेस क्लब में उनकी इस किताब का इजरा हुआ। इस मौक़े पर मौजूद लोगों ने उनके हौसले और जज़्बे की दिल से तारीफ़ की। सबसे ख़ास बात ये है कि इस किताब की तहरीर खुद रंजना शर्मा की है। उन्होंने अपने अनुभवों को अपने ही हाथों से लिखकर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ख़ूबसूरत विरासत बना दी है।
जब आज़ादी की रात जश्न में डूब गया शहर
अपनी किताब में Ranjana Sarma ने आज़ादी के दौर की यादों को भी बड़े जज़्बात के साथ बयान किया है। वो बताती हैं कि उन्हें वो ऐतिहासिक रात आज भी साफ़-साफ़ याद है, जब हिंदुस्तान आज़ाद होने वाला था। उस रात पूरे शहर में एक अलग ही माहौल था। कोई सो नहीं रहा था, हर कोई उस पल का इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही रात के 12 बजे आज़ादी का ऐलान हुआ, लोग घरों से बाहर निकल आए और सड़कों पर जश्न मनाने लगे।

चारों तरफ ख़ुशी, नारों और गीतों की गूंज थी। अगले दिन स्कूल में बच्चों को सफेद कपड़े पहनकर आने के लिए कहा गया और वहां से एक जुलूस निकाला गया। उस जुलूस में सबकी ज़ुबान पर एक ही लाइन थी “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा…” रंजना शर्मा बताती हैं कि जब भी वो उस लम्हे को याद करती हैं, तो उनकी आंखों में चमक आ जाती है और वो आज भी वही गीत गुनगुनाने लगती हैं।
जब बुखार में टीचर में बने सहारा
Ranjana Sarma की किताब उस दौर की इंसानियत और रिश्तों की गर्माहट को भी महसूस कराती है। वो अपने स्कूल के दिनों की एक घटना याद करते हुए बताती हैं कि जब Ranjana Sarma तीसरी कक्षा में पढ़ रही थी, तब एग्ज़ाम के समय उन्हें तेज़ बुखार हो गया था। उनकी हालत इतनी ख़राब थी कि वो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उनकी मां बहुत परेशान थी। तभी स्कूल के हेडमास्टर खुद उनके घर पहुंचे।
उन्होंने साइकिल पर तकिया रखकर बड़ी एहतियात से उन्हें बैठाया और एग्ज़ाम दिलाने के लिए स्कूल ले गए। इतना ही नहीं, टिफिन के समय वो खुद दूध लेकर आए और उन्हें पिलाया ताकि उन्हें कमजोरी महसूस न हो। Ranjana Sarma कहती हैं कि उस दौर के टीचर सिर्फ़ पढ़ाने वाले नहीं होते थे, बल्कि बच्चों के लिए एक सच्चे रहनुमा और पैरेंट्स की तरह होते थे।
जब पूरे गांव ने मनाया उनकी कामयाबी का जश्न
Ranjana Sarma को वो दिन भी बड़ी मोहब्बत से याद है जब उन्होंने पूरे ज़िले में पहला स्थान हासिल किया था। जैसे ही ये ख़बर गांव में फैली, हर तरफ खुशी की लहर दौड़ गई। लोग उन्हें मुबारकबाद देने उनके घर पहुंचने लगे। कोई नारियल लेकर आया,तो कोई मिठाई। कई लोगों ने उन्हें अपने घर खाने पर बुलाया। वो दौर ऐसा था जब किसी एक की कामयाबी पूरे गांव की खुशी बन जाती थी। लोगों के दिलों में सच्चा अपनापन था और हर खुशी को मिलकर मनाने की ख़ूबसूरत रिवायत थी।
ख़ूबसूरत लिखावट बनी उनकी पहचान
Ranjana Sarma का पढ़ने और लिखने से रिश्ता बचपन से ही गहरा रहा है। उन्हें लिखने का बेहद शौक़ था। स्कूल में जब हाथ से लिखी जाने वाली मैगज़ीन निकलती थी, तो उनकी खूबसूरत लिखावट की वजह से उन्हें उसे लिखने की ज़िम्मेदारी दी जाती थी। यही ख़ूबसूरत लिखावट उनके बच्चों के भी काम आई। उनके बेटे बताते हैं कि जब वो हाई सेकेंडरी में पढ़ते थे।

और केमिस्ट्री की प्रैक्टिकल कॉपी बनानी होती थी, तो वो अपनी मां से ही लिखवाते थे। उनकी लिखावट इतनी साफ़ थी कि कई बार कॉलेज के टीचर भी हैरान हो जाते थे और पूछते थे कि इतनी अच्छी हैंडराइटिंग कहां से आई। तब वो मुस्कुराकर कहते थे “ये मेरी मां की लिखावट है।”
नई पीढ़ी के लिए एक रोशन मिसाल
किताब के इजरा समारोह में मौजूद लोगों का कहना था कि Ranjana Sarma की ये किताब सिर्फ़ उनकी ज़िंदगी की कहानी नहीं है, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तजुर्बों और यादों को जोड़ने वाला एक ख़ूबसूरत पुल भी है। इसमें पुराने दौर की सादगी, रिश्तों की गर्माहट और बदलते समाज की तस्वीर साफ दिखाई देती है। उनके परिवार का कहना है कि Ranjana Sarma को हमेशा से पढ़ने-लिखने का शौक था और यही शौक उन्हें इस उम्र में भी कुछ नया करने के लिए मोटिवेट करता रहा।
हौसले के आगे उम्र छोटी पड़ जाती है
Ranjana Sarma की कहानी हमें ये एहसास कराती है कि उम्र सिर्फ एक नंबर है। अगर दिल में जुनून हो और कुछ करने की सच्ची चाहत हो, तो कोई भी उम्र इंसान के कदमों को नहीं रोक सकती। 89 साल की उम्र में किताब लिखकर Ranjana Sarma ने ये साबित कर दिया है कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती। अगर इरादा मज़बूत हो और दिल में हौसला हो, तो ज़िंदगी का हर पड़ाव एक नई शुरुआत बन सकता है। उनकी ये किताब सिर्फ यादों की दास्तान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रोशन मिसाल है।
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