Wednesday, January 21, 2026
18.1 C
Delhi

भारत के लोक नृत्य: उत्सव, परंपरा और कला का संगम

भारत की संस्कृति और परंपराओं में लोक नृत्य (Folk Dance) का अहम स्थान है। यह नृत्य सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं, उत्सवों और कहानियों को व्यक्त करने का एक ज़रीया भी हैं। हर राज्य, हर क्षेत्र का अपना एक अनोखा लोक नृत्य होता है, जो वहां की परंपराओं और जीवनशैली को दर्शाता है। 

लोक नृत्य का महत्व  

लोक नृत्य सिर्फ़ एक कला नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह नृत्य लोगों को एकजुट करते हैं और समाज में खुशी, उल्लास और भाईचारे की भावना को मज़बूत करते हैं। लोक नृत्य हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़े होते हैं, चाहे वह धार्मिक अनुष्ठान हों, फसल कटाई के त्योहार हों, शादी-ब्याह हो या कोई अन्य खुशी का मौक़ा।    

समाज, धर्म और त्योहारों में लोक नृत्य की भूमिका 

भारतीय समाज में लोक नृत्य विभिन्न मौक़ों पर किए जाते हैं।

1. धार्मिक अवसरों पर – देवी-देवताओं की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में लोक नृत्य एक अहम भूमिका निभाते हैं, जैसे गरबा और घूमर। 

गरबा: यह शक्ति की पूजा से जुड़ा है और नवरात्रि व विवाह के दौरान आयोजित किया जाता है, जहां लोग ढोल की लय पर ताली बजाते हुए केंद्र के चारों ओर नृत्य करते हैं।

घूमर: राजस्थान का एक पारंपरिक लोक नृत्य है. यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाएं करती हैं। घूमर नृत्य की ख़ासियत ये है कि इसमें कलाकार घाघरा पहनकर गोल-गोल घूमते हैं।

2. मौसमी त्योहारों पर – फसल कटाई के त्योहारों जैसे बिहू, बैसाखी और पोंगल में लोक नृत्य खुशी का इज़हार करते हैं।  

बिहू नृत्य, भारत के असम राज्य का लोक नृत्य है। यह खुशी का नृत्य है और बिहू त्योहार के अवसर पर किया जाता है। यह असमिया संस्कृति का अहम हिस्सा है।

बैसाखी के त्योहार पर भांगड़ा और गिद्दा जैसे लोक नृत्य किए जाते हैं। भांगड़ा पुरुषों का नृत्य है, वहीं गिद्दा महिलाओं का। बैसाखी को फसल का त्योहार भी कहा जाता है।  ये त्योहार मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। 

पोंगल त्योहार के दौरान नृत्य नहीं किया जाता, लेकिन इस त्योहार से जुड़े कई रीति-रिवाज़ और अनुष्ठान होते हैं। पोंगल एक तमिल त्योहार है, जो चार दिनों तक मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान पोंगल नाम का व्यंजन भी बनाया जाता है। 

3. सामाजिक उत्सवों में – शादियों, जन्मदिन और अन्य समारोहों में लोक नृत्य आनंद और उल्लास को बढ़ाते हैं।    

भारत के विभिन्न राज्यों के लोक नृत्य  

भारत में हर राज्य के अपने विशेष लोक नृत्य होते हैं, जो वहां की परंपराओं और संस्कृति को दर्शाते हैं:  

भांगड़ा पंजाब का सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यह ऊर्जा और उत्साह से भरपूर नृत्य है, जो बैसाखी के त्योहार के दौरान विशेष रूप से किया जाता है। ढोल की थाप पर पुरुष रंगीन कपड़े पहनकर नाचते हैं।

गरबा गुजरात का लोकप्रिय नृत्य है, जो नवरात्रि के दौरान किया जाता है। महिलाएं और पुरुष घेरा बनाकर तालियों और डांडिया की मदद से नृत्य करते हैं।

घूमर राजस्थान का पारंपरिक नृत्य है, जो महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह नृत्य विशेष अवसरों, जैसे विवाह और त्योहारों पर किया जाता है।

लावणी महाराष्ट्र का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह नृत्य श्रृंगार और प्रेम से भरपूर होता है।

बिहू असम का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो बिहू त्योहार के दौरान किया जाता है। यह नृत्य युवा पुरुषों और महिलाओं द्वारा किया जाता है।

 छाऊ पश्चिम बंगाल का मुखौटा नृत्य है, जो महाभारत और रामायण की कहानियों को दर्शाता है।

करगट्टम तमिलनाडु का एक प्राचीन लोक नृत्य है, जिसमें नर्तक अपने सिर पर पानी से भरा बर्तन रखकर नृत्य करते हैं।

झोड़ा उत्तराखंड का एक सामूहिक नृत्य है, जो त्योहारों और विशेष पर किया जाता है। 

रउफ कश्मीर का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो महिलाएं करती हैं। यह नृत्य ईद और अन्य त्योहारों के दौरान किया जाता है।

लोक नृत्य शुरुआत से ही भावनाओं को व्यक्त करने का एक तरीका रहा है। आदिकाल में लोग खुशी, दुःख, प्रेम, युद्ध और प्रकृति से जुड़ी घटनाओं को नृत्य के माध्यम से प्रकट करते थे।

फसल कटाई के समय – किसानों की मेहनत और खुशी को दर्शाने के लिए भंगड़ा और बिहू नृत्य होते हैं।  

देवी-देवताओं की आराधना के लिए – गरबा, घूमर और करगट्टम नृत्य किए जाते हैं।  

वीरता की कहानियां सुनाने के लिए – कालबेलिया, चौ और बाउल नृत्य लोकगाथाओं को प्रस्तुत करते हैं।  

लोक नृत्य और उनमें दर्शाई जाने वाली कहानियां

लोक नृत्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें गहरी सांस्कृतिक कहानियां भी छिपी होती हैं। बिहू और करगट्टम नृत्य में बारिश और फसल के मौसम को दर्शाया जाता है।  कथकली और गरबा में देवी-देवताओं की कहानियां प्रस्तुत की जाती हैं।  गिद्धा और कोली नृत्य में ग्रामीण जीवन के संघर्ष और खुशियों को दिखाया जाता है।  

लोक नृत्यों की पारंपरिक पोशाकें

हर लोक नृत्य की अपनी खास वेशभूषा होती है, जो उस क्षेत्र की संस्कृति को दर्शाती है।  

भंगड़ा और गिद्धा – पुरुष कुर्ता और चूड़ीदार पहनते हैं, महिलाएं सलवार-कुर्ता और दुपट्टा पहनती हैं।  

गरबा और डांडिया– महिलाएं घाघरा-चोली और पुरुष केडिया पहनते हैं।  

लावणी – महिलाएं नौवारी साड़ी और भारी आभूषण पहनती हैं।  

चौ नृत्य– योद्धाओं की पोशाक और मुखौटे पहने जाते हैं। 

भारत के लोक नृत्यों की यही ख़ासियत उन्हें अनमोल बनाती है। यह सिर्फ़ नृत्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की धड़कन हैं, जो संगीत, भावनाओं और रंगों के संगम से जीवंत होती हैं।

ये भी पढ़ें: मधुबनी पेंटिंग: इतिहास, अहमियत और बनाने का तरीका

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।











  


















LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

जम्मू और कश्मीर-नशीले पदार्थों का ख़तरा

जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir) में हाल के वर्षों में ड्रग्स (Narco-Terrorism) के इस्तेमाल में तेज़ी से इज़ाफा देखा गया है। साल 2026 के पहले हफ्ते के दौरान, केंद्र शासित प्रदेश (UT) में नशीले पदार्थों से संबंधित कई गिरफ्तारियां और बरामदगी दर्ज की गईं

Sunil Jaglan: एक पिता ने बदल दी सोच: Selfie with Daughter से गालीबंद घर तक की Journey

हरियाणा जैसे राज्य में जहां खाप पंचायतों (Khap Panchayats) में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी, सुनील जी ने बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने ‘लाडो पंचायत’ (Lado Panchayat) की शुरुआत की, जहां लड़कियां खुद अपने हकों की बात करती हैं।

Viksit Bharat: पंचर की दुकान से भारत मंडपम तक – झारखंड के चंदन का सफ़र

एक आम परिवार से निकलकर देश के सबसे बड़े...

Topics

जम्मू और कश्मीर-नशीले पदार्थों का ख़तरा

जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir) में हाल के वर्षों में ड्रग्स (Narco-Terrorism) के इस्तेमाल में तेज़ी से इज़ाफा देखा गया है। साल 2026 के पहले हफ्ते के दौरान, केंद्र शासित प्रदेश (UT) में नशीले पदार्थों से संबंधित कई गिरफ्तारियां और बरामदगी दर्ज की गईं

Sunil Jaglan: एक पिता ने बदल दी सोच: Selfie with Daughter से गालीबंद घर तक की Journey

हरियाणा जैसे राज्य में जहां खाप पंचायतों (Khap Panchayats) में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी, सुनील जी ने बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने ‘लाडो पंचायत’ (Lado Panchayat) की शुरुआत की, जहां लड़कियां खुद अपने हकों की बात करती हैं।

Related Articles

Popular Categories