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मधुबनी पेंटिंग: इतिहास, अहमियत और बनाने का तरीका

मधुबनी पेंटिंग (Madhubani Painting) भारत की प्राचीन लोक कला में से एक है, जिसकी शुरुआत बिहार के मिथिला इलाके से हुई। यह कला अपनी जटिल रेखाओं, प्राकृतिक रंगों और सांस्कृतिक कथाओं के लिए मशहूर है। इस कला में प्रकृति, धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को बेहद ख़ूबसूरती से दर्शाया जाता है।

मधुबनी पेंटिंग का इतिहास

मधुबनी पेंटिंग का इतिहास हज़ारों साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि इस कला की उत्पत्ति तब हुई जब राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता जी के विवाह के मौक़े पर अपने महल की दीवारों को सजाने का आदेश दिया। तब से यह रिवायत मिथिला क्षेत्र में घरों की दीवारों पर चित्र बनाने के रूप में विकसित हुई। पहले यह पेंटिंग सिर्फ़ स्त्रियों द्वारा बनाई जाती थी, लेकिन समय के साथ यह पुरुषों के लिए भी एक कला रूप बन गई।

आज के दौर में अहमियत

आज मधुबनी पेंटिंग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति हासिल कर चुकी है। यह सिर्फ़ दीवारों और कागज़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब इसे कपड़ों, साड़ियों, बैग, होम डेकोर और यहां तक कि डिजिटल आर्ट में भी देखा जा सकता है।

भारत सरकार और कई एनजीओ इस कला को संरक्षित (preserve) करने और कलाकारों को प्रोत्साहन देने का काम कर रहे हैं।

इस पेंटिंग को बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें

मधुबनी पेंटिंग बनाने में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो फूलों, पत्तियों, पेड़ों की छाल और मिट्टी से बनाए जाते हैं। ये रंग न सिर्फ़ इको-फ्रेंडली होते हैं, बल्कि वर्षों तक टिके भी रहते हैं।

काला – चारकोल और गाय के गोबर से
 लाल – कुसुम फूल और सिंदूर से
 हरा – बेल-पत्तों से
 पीला – हल्दी से
 नीला – इंडिगो पौधे से
 सफेद – चावल के घोल से
 ब्रश की जगह बांस की कलम (Nib) और कपास के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है।

मधुबनी पेंटिंग की ख़ास बातें

थीम – यह पेंटिंग अधिकतर रामायण, महाभारत, प्रकृति, शादी-ब्याह और देवी-देवताओं से प्रेरित होती है।

रेखाएं और पैटर्न – इन चित्रों में रेखाओं और पैटर्न (Patterns) का बहुत ज़्यादा उपयोग किया जाता है।

भराव (फिलिंग) – मधुबनी पेंटिंग में खाली स्थान (Negative Space) नहीं छोड़ा जाता। हर हिस्से में कुछ न कुछ डिज़ाइन होती है।

कोई बाहरी सीमाएं नहीं – ज़्यादातर चित्रों में कोई सीमा रेखा (Border Line) नहीं होती, बल्कि सीधी आकृतियों से चित्रों को दर्शाया जाता है।

फ्री हैंड ड्राइंग – इसे बिना स्केचिंग किए सीधे चित्रित किया जाता है।

इको-फ्रेंडली और नैचुरल आर्ट – आधुनिक युग में, जब प्लास्टिक और केमिकल से बनी चीज़ें हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं, मधुबनी पेंटिंग पर्यावरण के अनुकूल है।

मधुबनी पेंटिंग सिर्फ़ एक कला रूप (Art Form) नहीं, बल्कि बिहार और भारत की संस्कृति (Culture) और धरोहर (Heritage) का एक अहम हिस्सा है। आज यह कला सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि रोज़गार का एक बड़ा साधन भी बन गई है। मधुबनी के कलाकार अपनी कला को कैनवास, कपड़े, दीवारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 

ये भी पढ़ें: कश्मीर की पहचान: Nooraari Crafts से महिलाओं की नई उड़ान

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